लेख

(व्यंग्य) गोबर है या हलवा....... (लेखक- ज़हीर अंसारी / ईएमएस)

13/04/2019

न्यूज़ चैनल का स्टूडियो एकदम भरा हुआ था। स्टूडियो का इंटीरियर बता रहा था कि लाटरी में मिली रक़म का कुछ हिस्सा यहाँ पूरी ईमानदारी से ख़र्च किया गया, और हो भी क्यों न आख़िर यह उनका स्टूडियो था।
स्टूडियो के बीच में रखी राउंड टेबल पर तीन भोंदू से दिखने वाले चतुर नर बैठे थे, सामने वाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र-छात्राएँ बैठीं थी। इनकी शक्ल-सूरत बता रही थी कि यह माँ-बाप के पैसों की होली खेलकर यहाँ पहुँचे हैं, वो भी सिर्फ़ तालियाँ पीटने।
स्टूडियो हाल में चारों तरफ़ एचडी कैमरे और माईक ऐसे लगे हुए थे कि वहाँ मौजूद कोई भी यदि नाक-कान में खुजली करे तो उसका एंगल क्लीयर रहे और वायु प्रदूषण की दशा में ध्वनि रिकार्ड हो सके।
बीच में चैनल की अधेड़ उम्र की छरहरे बदन एंकर खड़ी थी। काले घने बाल, उम्दा मेकओवर और महँगे वस्त्र धारण किए कार्यक्रम शुरू करने को तैयार। कैमरामैन के ओके करते ही एंकर ने शुरू की एंकरिंग।
इसके पहले यह समझना आवश्यक है तीनों भोंदू टाइप दिखने वाले तीनों चतुर कौन-कौन हैं। देखने से लग रहा था कि एक सत्ता पक्ष, दूसरा विपक्ष का और तीसरा चिंतक या विचारक, क्योंकि इसके हाथ में कुछ पेपर्स थे। पक्ष-विपक्ष को किसी पेपर्स या डेटा की ज़रूरत नहीं पड़ती, इनके मुँह से निकलने वाला एक-एक शब्द प्रामाणिक और सत्य होता है।
अब एंकर ने कोने में जाकर स्वयं को आइने में देखा और लौटकर आते ही कार्यक्रम की शुरुआत कर दी। फ़िल्मी हीरोईन की तरह हाव-भाव लाते हुए ऊँची आवाज़ में एंकरिंग शुरू की।
ये है ज्ञात-अज्ञात ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ चैनल और मैं हूँ हिरणी कश। आज के इस कार्यक्रम ‘बकरबाज़ी’ में आपका स्वागत है। आज की बकरबाज़ी कार्यक्रम में हम ‘नेताजी की भैंस के गोबर’ पर बहस करेंगे। बहस शुरू करने से पहले यह जानना ज़रूरी है हम जिस ’नेताजी की भैंस के गोबर’ पर चर्चा करने जा रहे हैं, उन्होंने कड़ी तप-तपस्या के बाद भैंस प्राप्त की है। औलाद की तरह पालापोसा है। भैंस से इनका लगाव जगज़ाहिर है।
एंकर- नेताजी की भैंस के गोबर को लेकर विपक्ष हमलावर है। गोबर में ऐसा क्या है कि विपक्षी दलों की नाक में दम हो रहा है।
पक्ष- देखिए, विपक्ष की नाक सड़ चुकी है। उन्हें तो हर ख़ुशबूदार चीज़ों में बदबू सुँघाई देती है।
विपक्ष- नाक हमारी नहीं आपकी सड़ चुकी है गंदगी सूँघते-सूँघते। अब आपको बदबू भी ख़ुश्बू लगने लगी है।
एंकर- आप बताए कि नेताजी के भैंस का गोबर आपको कैसा लगता है।
चिंतक- हाथ में लिए पन्ने को पलटते हुए, सवाल का जवाब जानने के पहले हमें यह जानना ज़रूरी है कि भैंस की जात कौन सी है, उसकी नस्ल क्या है।
पक्ष- इसमें भैंस की जात और नस्ल का प्रश्न खड़ा नहीं होता। आपको मानना होगा कि भैंस नेताजी की है तो उसका गोबर सौ प्रतिशत सुगंधित होगा।
विपक्ष- अरे वाह, आपको नेताजी पर इतना भरोसा है कि उनकी भैंस सुगंधित गोबर ही करेगी।
पक्ष- देखिए, आप हमारे नेताजी पर ऊँगली उठा रहे हैं। मैं नेताजी और उनकी भैंस को कई दशकों से जानता हूँ और कई बार मैंने गोबर भी उठाए हैं।
विपक्ष- अब समझ आया कि आपका गोबर प्रेम पुराना है।
पक्ष- देखिए, ज़ुबान सँभालिये। आपकी पीढ़ियाँ निकल गई अपने आकाओं के आँगन में सड़े गोबर लीपते-लीपते।
विपक्ष- मेरे आकाओं तक मत जाइए। आप गोबर पर बात करिए।
एंकर- आप बताइए क्या गोबर की ख़ुश्बू अलग-अलग होती है।
चिंतक-पहले तो यह समझना होगा कि गोबर देने वाली भैंस कहाँ की है। विदेशी है, मुर्रा है या फिर देशी। जब तक यह भेद न समझेंगे तब तक गोबर की ख़ुश्बू-बदबू में अंतर न हो पाएगा।
एंकर- आप बहस की दिशा बदल रहे हैं। मैं अच्छे से जानती हूँ कि नेताजी विदेशियों से बहुत चिढ़ते हैं। वो कभी विदेशी भैंस को ख़रीद ही नहीं सकते। उनकी भैंस तो देशी ही है।
विपक्ष- आप तो ऐसे बता रही हैं जैसे नेताजी आपसे पूछकर ही भैंस ख़रीदी थी।
पक्ष- नेताजी का चरित्र समूचा ब्रह्माण्ड जानता है। वो तो विदेशी आइटम को निगाह भर देखते तक नहीं, ख़रीदने की बात तो दूर की।
चिंतक- यहाँ मसला विदेशी आइटम का नहीं है। गोबर की स्मेल का है। जिस क्षेत्र की भैंस होगी वैसा उसका गोबर होगा, वैसी उसकी स्मेल होगी।
पक्ष- मैंने बताया न, नेताजी की भैंस शुद्ध देशी भैंस है इसलिए उसका गोबर सुगंधित है।
विपक्ष- कैसे मान लिया जाए आप सही बोल रहे हैं। पिछली बार नेताजी ने जर्सी भैंस ख़रीदने की बात कही थी। अब आप देशी भैंस की बात उठा रहे हैं।
पक्ष- आप विपक्षियों की आदत सी पड़ गई है। छोटी-छोटी बात पर नेताजी की आलोचना करने की। हमारे नेताजी सर्वश्रेष्ठ हैं और उनकी भैंस भी।
विपक्ष- दूध की एक बूँद भी न मिली होगी फिर भी नेताजी की बढ़ाई पहलवानों की तरह कर रहे, वाह भाई वाह।
एंकर- बात दूध और पहलवान की नहीं हैं। बात गोबर की है। इस पर जवाब दीजिए। आपको इस गोबर में बदबू क्यों आती है ?
विपक्ष- नेताजी के शासन में सब कुछ मिलावटी और महँगा मिल रहा है। भैंस को असली और भरपूर खुराक नहीं मिल रही। आँकड़े बताते हैं कि भैंसे भूखों मर रही हैं, गोबर कम दे रही हैं और यहाँ गोबर के गंध पूछी जा रही हैं।
चिंतक- पिछले पाँच सालों के आँकड़े बताते हैं कि हज़ारों भैंसे कुपोषण का शिकार हुई हैं। इनमें से कई बेमौत मर गई हैं।
पक्ष- ये आँकड़ों की बाज़ीगिरी छोड़िए। ज़रा हमारे नेताजी की योजनाओं को देखिए। इतने लाख भैंसों को नेताजी ने भोजन कराया है, उतने लाख भैंसों को सुगंधित गोबर करवाने का प्रयास किया है।
विपक्ष- तो क्या मान लिया जाना चाहिए कि नेताजी की भैंस का गोबर न होकर हलवा हो गया।
पक्ष- बिलकुल हलवा ही है।
एंकर- अब जब अधिसंख्य लोग नेताजी की भैंस के गोबर को हलवा मान रहे हैं आपको यह मानने में एतराज़ क्यों है ?
विपक्ष- ऐसे लोगों की नाक में नशमँजन डाल दी गई है। इसलिए उन्हें ठीक से सुँघाई नहीं दे रहा है। लगता है कि आप लोगों ने सूंघकर नहीं चटकर तय किया है कि गोबर है या हलवा।
वाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के बच्चे एकदम से ठहाके मारने लगे। कुछ गोबर-गोबर तो कुछ हलवा-हलवा चिल्लाने लगे।
विपक्ष की बात सुनकर एंकर की नाक फ़ूल गई। भौहें चढ़ाते ही कुछ बोल पाती कि इस बीच उनके मोबाईल पर एसएमएस आ गए। इसमें लिखा था कि डील फ़ायनल, गोबर हलवा है। यह पढ़ते ही एंकर को जोश आ गया। बोली- आज की यह बहस यहीं ख़त्म करनी पड़ेगी। सर्वे रिपोर्ट और पब्लिक ओपिनियन के आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि नेताजी की भैंस देशी है और इसका दूध और गोबर प्रगति के लिए ज़रूरी है। विपक्ष अब इसे जिस नज़रिए से लेना चाहे, ले सकता है मगर नेताजी की भैंस का गोबर हलवा ही माना जाएगा।
स्टूडेंट्स के झुंड से एक कंपकंपाती सी आवाज़ आई। कोई बुज़ुर्ग महिला स्टूडेंट्स के पीछे बैठी थी। बुज़ुर्ग ने कहा कि बेशक अपने-अपने लीडर से मोहब्बत करो लेकिन इसकी भैंस के गोबर को हलवा साबित करने की कोशिश न करो। बुज़ुर्ग की बात से पूरा स्टूडियो सन्न रह गया। बुज़ुर्ग महिला ने स्टूडेंट्स को हिदायत दी कि ये चैनल्स छोड़ो, ये वही सिखाएँगे-पढ़ाएँगे जिसके लिए इन्हें रुपया मिलता है। बच्चों आप सब लाइब्रेरी में बैठो और अच्छी-उम्दा किताबें पढ़ो, बुद्धि-समझ तभी विकसित होगी।
13अप्रैल/ईएमएस