लेख

श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र अहार जी (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

16/05/2019

एक समय जैन धर्म एक राष्ट्रीय धर्म रहा हैं ,क्योकि कोई भी धर्म ,भाषा जाती संस्कृति बिना राज्याश्रय के पनप और फल फूल नहीं सकती .अनेकों राजा महाराजा जैन धर्म के अनुन्यायी रहें और आज भी कहीं पर आप खुदाई करेंगे जैन मूर्तियां अवश्य प्राप्त करेंगे
रेत के टीले से निकला था जैन तीर्थक्षेत्र अहार जी का विशाल भव्य शांतिनाथ जिनालय
आज से लगभग 133 वर्ष पूर्व सन 1884 (वि.सं. 1941) तक अहार जी क्षेत्र एक विशाल रेत के टीले में तब्दील था। टीकमगढ़ जिले के नारायणपुर ग्राम के एक जैन व्यापारी श्री सबदल बजाज जी का घोड़ा खो गया था,जिसे खोजते हुये बे उस टीले पर पहुंचे। टीले पर खड़े होकर घो‌ड़े के लिये चारों ओर नजर दौड़ाई, तभी बहां उन्होने कुछ बच्चों को खेलते हुये देखा। उन से घोड़े के बारे में पूंछा। वहां टीले पर बच्चे रेत का खेल खेल रहे थे। बहां पर कुछ छेद (छिद्र)बने हुये थे, जिनमें बच्चे आवाज लगाते और उन्हें बदले में प्रतिध्वनि सुनाई देती। श्री बजाज जी ने भी ऐसा करके देखा और उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि इसके नीचे कुछ विशेष रचना मंदिर या मठ आदि हो सकता है। बे पास के ग्राम पठा गये और वहां पर जैन विद्वान पं. भगवानदास जी वैद्य से इस बारे में चर्चा की। कुछ समय बाद दौनों लोग पुन: टीले पर आये और स्थिति का जायजा लिया।
दोनों महानुभावों ने मजदूरों को लेकर खुदाई प्रारम्भ कराईतो कुछ ही दूरी पर मंदिर का दरवाजा मिल गया। भीतर जाकर देखा तो भगवान शांतिनाथ एवं भगवान श्री कुंथुनाथ जी की दो खड़्गाीसन खण्डित प्रतिमायें खड़ी थीं।
श्री बजाज जी ने पत्र लिखकर समाज के लोगों को इसकी जानकारी दी तथा एक निर्धारित तिथि पर समीपवर्ती ग्राम मबई, बड़माडई, बैसा, लड़वारी, नारायणपुर, पठा आदि की जैन समाज को बुलाया और चन्दा एकत्र करसभी के सहयोग से आगे की योजना बनायी। पुन: खुदाई प्रारम्भ हुई और एक विशाल मंदिर जो कि रेत के टीले में दबा हुआ था, धीरे धीरे प्रकट हो गया। क्षेत्र के दक्षिण दिशा में स्थित पर्वत पर सैकड़ों मूर्तियां खण्डित अवस्था में पड़ी हुई थींजिन्हें एकत्रित करके संग्रहालय में लाया गया। अहार क्षेत्र के इस संग्रहालय में ग्यारहवीं शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक की सैकड़ों मूर्तियां विद्यमान हैं। यह संग्रहालय श्री बनारसीदास जी चतुर्वेदी (तत्कालीन सांसद) तथा श्री यशपाल जी जैन (दिल्ली) के प्रयत्नों एवं सह्योग से निर्मित हुआ। सन्‍ 1958 के गजरथ के समय ही इन्ही मनीषियों के द्वारा इसका उदघाटन हुआ था। वर्तमान में नया भव्य संग्रहालय निर्माणाधीन है।
सांसद बनने से पूर्व श्री बनारसीदास चतुर्वेदी जी पहले कुण्डेश्वर (टीकमगढ़) में रहते थे। उनसे मिलने राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त तथा उपन्यास सम्राट वृंदावन लाल वर्मा आये। चतुर्वेदी जी उन सभी को लेकर टीकमगढ़ से पैदल बारह मील के कच्चे मार्ग से अहार जी आये[यह एक सीधा संक्षिप्त मार्ग था, जिसका अभी हाल ही में पक्का निर्माण हो पाया है क्योंकि दूसरा मार्ग लम्बा घुमावदार है।.
अहार जी क्षेत्र के समीप ही लगभग 4 किलोमीटर लम्बा ‘मदन सागर’ नामक तालाब है। यहां से प्राप्त अनेक मूर्तियों पर इस क्षेत्र का नाम ‘मदनेश सागर पुरे’ अंकित है। क्षेत्र के समीप जो ग्राम है उसका नाम ढ़ड़कना है और तालाब के बांध पर जो ग्राम है उसका नाम ‘अहार’ है। यहाँ पर खंडित मूर्तियां तथा खण्डहर अभी तक विद्यमान हैं। मंदिरों के कलात्मक सभी पत्थर ओरछा (टीकमगढ़) राज्य के राजा ने सुधासागर तालाब के निर्माण में पहाड़ पर से ढुलवाकर लगवा दिये हैं।
सर्व प्रथम अहार क्षेत्र के सभापति श्री सबदल बजाज जी (नारायणपुर) और मंत्री श्री भगवानदास जी वैद्य (पठा) को बनाया गया। इसके पश्चात उनके ही सुपुत्र श्री बदली प्रसाद जी (नारायणपुर) को सभापति और श्री बारेलाल जी वैद्य (पठा) को मंत्री मनोनीत किया गया। इन लोगों ने क्षेत्र की प्रगति के लिये तन-मन-धन से कार्य किया। श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन विद्यालय की स्थापना की गयी जिसमें जैन धर्म की शिक्षा दी जाने लगी। यह विद्यालय तथा छात्रावास नियमित सुचारू रूप से चल रहा है। यहां वार्षिक मेला भी लगता है। यहां पर यात्रियों के ठहरने के लिये अनेक कमरों का निर्माण कार्य किया गया। क्षेत्र के विकास में निरंतर प्रगति होती गयी। सन्‍ 1958 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव हुआ। जिसमें श्री शांतिनाथ भगवान के बगल में श्री अरहनाथ भगवान् की मूर्ति स्थापित की गयी एवं अनेक जिनबिम्बों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई है।
इस भव्य शांतिनाथ जिनालय का वर्तमान स्वरूप निम्न प्रकार है। मूल मंदिर जी में भगवान्‍ श्री शांतिनाथ जी की मूर्ति की लम्बाई 18 फीट तथा मय पाषाण शिलालेख के 21 फीट है। भगवान कुंथुनाथ की लम्बाई 11 फीट है तथा अरहनाथ की नवीन मूर्ति जो 1958 के गजरथ में स्थापित की गयी थी बह भी 11 फीट (सफेद संगमरमर) की है। शांतिनाथ तथा कुंथुनाथ की प्रतिमाओंपर रत्नों की पालिश है।
बुंदेली जैन तीर्थ स्थल श्री अहार जी पर कवि श्री बाबूलाल जैन सुधेश की रचना में लिखा है कि-
जो आते हैं अहार, शान्ति प्रभु को निहार,
उनको नत बार बार, अपार सुख पाते हैं।
पाणा से सेठ यार, पापट से शिल्पकार,
देख कर चतुराई अति चकित रह जाते हैं।।
कैसी है मूर्ति भव्य, आते हैं मनुज सभ्य,
लेकर के अष्ट द्रव्य चरणों चढ़ाते हैं।
करते हैं अनेक नृत्य, होते हैं भाव शुद्ध,
शान्ति प्रभु के महत्त्व को गाते जाते हैं ।।
अहार जी क्षेत्र पर त्रैकालिक चौबीसी (भूत, वर्तमान एवं भविष्य काल) एवं विद्यमान बीस तीर्थंकर की स्थापना हेतु शांतिनाथ मंदिर के चारों ओर विशाल बेदियों का निर्माण किया गया है। इसी क्रम में भगवान श्री बाहुबली स्वामी के मंदिर का निर्माण, पंचपहाड़ी पर्वत पर चरण पादुकाओं सहित मंदिरों आदि के निर्माण कार्य कराये गये हैं।
इन दोनों महानुभावों के पश्चात् श्री फूलचंद्र जी बजाज सभापति एवं डा. कपूर चंद जी पठा मंत्री बने। समय के परिवर्तन के साथ अब चुनाव के द्वारा समाज द्वारा चयनित कार्यकारिणी समिति कार्य कर रही है और क्षेत्र का निरंतर विकास जारी है।
अहार जी क्षेत्र पर एक संग्रहालय है जिसमें अनेक खण्डित मूर्तियां तथा निकटवर्ती क्षेत्र से प्राप्त पुरातत्व सामग्री संग्रहीत है। यहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है। यात्रियों के रुकने के लिये जैन धर्मशाला भी है। छात्रों के अध्ययन हेतु पाठशाला भी चलती है। अहार जी क्षेत्र पर आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज का ससंघ चौमासा सन 1985 में हुआ था। इसके बाद भी अनेक साधुओं के चौमासा इस क्षेत्र पर हो रहे हैं।
बुंदेली जैन तीर्थ आहार जी पर खण्डित मूर्तियों को देखकर कवि श्री बाबूलाल जैन के उद्गार इस प्रकार हैं जो किकविता संग्रह स्वतंत्र रचनावली (2004) में प्रकाशित है।
मैं रोऊं या हंसू समझ नहिं आता है, पर भग्न मूर्तियाँ देख रूदन ही आता है।।
यह ललित हरित वन थली प्रकृति का राज यहाँ, सरवर सरिता निर्झर प्रवाह का राग यहाँ।
गिरिवर गरिमा को लिए गगन को धाते हैं, मानों क्षिति का इतिहास सुनाने जाते ह जो छिपा पड़ा है उनके अन्दर मूलों में, अरू निकल रही है सुरभि उन्हीं तरू फूलों में।।
वह भी तो जग में कीर्ति-गान फैलाती है,सुनने बाले सुनते पर वह बढ़ जाती है।।
यह प्रकृति अनूपमदृश्य हृदय बहलाता है,पर भग्न मूर्तियाँ देख रूदन ही आता है।।
श्री शान्तिनाथ भगवान उन्हीं का आकर्षण, हम आते हैं निर्भीक भले मग में हो रण।।
दर्शन करते आनन्द हृदय भर आता है, आत्मा पवित्र होती पाप धुल जाता है।।
पर कला देखते हैं शिल्पी की जब हम, कुछ क्षण रहते हैं मौन नहीं रहता गम।।
उस पापी को धिक्कार आत्मा उठती मम, जिसको करते ए भग्न नहीं आई थी शरम।।
तभी हृदय में ज्वार उबल सा आता है, पर भग्न मूर्तियाँ देख रूदन ही आता है।।
थोड़े से यह शिखर और इतना सुन्दर, कई सौ थे जब शिखर रहा कितना सुन्दर ?
उनके अगणित चिन्ह आज भी याद लिये, पड़े हुए हैं शान्त अचल विश्राम किये।।
प्रकृति वधू तो उन्ही मन्दिरों में सोती है, गा‌-गाकर मधु गीत चरण उनके धोती है।।
कहती है इतिहास युगों का रखे सुरक्षित, रोयेगा दिन-रात सुने जो जाकर शिक्षित।।
उस तीर्थराज को वन्दनार्थ मम शीष झुका जाता है, पर भग्न मूर्तियाँ देख रूदन ही आता है॥
अतिशय क्षेत्र : अहार जी भगवान शांतिनाथ के दर्शन के परिणाम स्वरुप सेठ पाणा शाह के रांगा से भ्ररे बोरे चांदी में परिवर्तित हो गये थे। यह भी कहा जाता है कि एक मासोपवासी मुनि को कई महींनों से अहार में अंतराय हो रहा था लेकिन इस स्थली पर निर्विघ्न आहार हुआ। इस घटना की स्मृति में इस नगर का नाम ‘आहार’रखा गया जो कालांतर में ‘अहार’हो गया.
सिद्ध क्षेत्र : प्राकृत चौबीस कामदेव पुराण के आधार पर पं. धर्मदास के हिंदी ग्रंथ ‘चौबीस कामदेव पुराण’के अनुसार अहार जी क्षेत्र से केवली मदन कुमार तथा केवली श्री विष्कम्बल का यहां से निर्वाण हुआ। इसे आधार मानकर समाज ने तथा बाद में भारत वर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी ने अहार जी को सिद्ध क्षेत्र घोषित किया। (कस्तूर चंद सुमन, अहार क्षेत्र के अभिलेख
निष्कर्ष : बुंदेलखण्ड जैन तीर्थ यात्रा का अभिन्न अंग श्री अहार जी क्षेत्र अतिशयकारी, सिद्धक्षेत्र है। वर्तमान में आने जाने की सुविधा के साथ साथ क्षेत्र पर रूकने की भी पर्याप्त व्यवस्था है। भगवान शांतिनाथ की विशाल मूर्ति सभी को आकर्षित करती है। यहां प्रतिवर्ष वार्षिक मेला का आयोजन होता है जो कि मार्ग़शीर्ष शुक्ला चतुर्दशी एवं पूर्णिमासी को होता है। इसके अलावा अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक आयोजनों से क्षेत्र पर हमेशा चहल पहल बनी रहती है। यहां साधुओं का भी आगमन एवं चैमासा होता रहता है। यहां पर सी.बी.एस.ई. से मान्यता प्राप्त विद्यालय चल रहा है तथा सैकड़ों जैन छात्र छात्रावास में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सभी धर्मावलम्बियों से अनुरोध है कि क्षेत्र पर दर्शन हेतु अवश्य पधारें तथा क्षेत्र के विकास में तन मन धन से सहयोग करें।
इस क्षेत्र में ज्ञान शिक्षा और ध्यान की उत्तम व्यवस्था हैं .
16मई/ईएमएस