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भगीरथ का भागीरथ प्रयास और गंगादशहरा (लेखिका- श्रीमती डा. शारदा नरेन्द्र मेहता / ईएमएस)

11/06/2019


दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठमासे बुधेड हनि।
अवतीर्णा यत: स्वर्गाद्धस्तर्क्षे च सरिद्धरा ।।
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। इस तिथि को यदि बुधवार हो और हस्त नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन गंगा नदी का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था। यह तिथि सब पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।
गंगा अवतरण कथा- इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर की दो रानियाँ थी। कश्यप पुत्री सुमति तथा विदर्भ राज की पुत्री केशिनी। केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक बालक का जन्म हुआ था सुमति ने साठ हजार पुत्रों को जन्म दिया था। असमंजस के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप तथा पौत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने अपने साठ हजार पूर्वजों के उद्धार करने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि गंगा नदी को संभालने में पृथ्वी पर अवतरित करें। ब्रह्मा जी का कथन था कि गंगाजी के प्रबल वेग को संभालने में शकंर जी के सिवाय कोई समर्थ नहीं है। अत: भगीरथ ने शकंर जी को प्रार्थना की और उन्होंने जटा में गंगा जी को धारण कर लिया। मार्ग में जह्नु नामक ऋषि ने गंगा जल का पान कर लिया। भगीरथ ने ऋषि की सेवा प्रार्थना की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। गंगा जी जह्नु ऋषि की जाँघ से बाहर आई। तभी से गंगा का नाम जाह्नवी हुआ। गंगा नदी के कई पर्यायवाची नाम हैं यथा- अलकनन्दा, विष्णु पदी, मन्दाकिनी, हरिप्रिया, त्रिपथगा, सुरसरि, स्वर्गङ्गा, पाताल गंगा, पद्मा, मेघना, हुगली, भागीरथी, जाह्नवी आदि।
स्नान विधि- इस दिन गंगा स्नान का विशेषमहत्व है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से तीनों प्रकार के पापों का नाश होता हैं। ये तीन पाप हैं- कायिक पाप- १. दूसरे की वस्तु का हरण करना है। २. शास्त्र वर्जित हिंसा करना ३. परस्त्री गमन।
वाचिक पाप - ४ कटु बोलना, ५ झूठ बोलना, ६ परोक्ष में किसी का दोष कहना, ७ प्रयोजनहीन बातें करना।
मानसिक- ८ दूसरे के द्रव्य हड़पने का विचार मन में लाना, ९. मन में अनिष्ठ चिन्तन तथा १०. नास्तिक बुद्धि। ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन गंगा स्नान करने से ये दस प्रकार के पापों का शमन होता है। इसलिए इस दिन को गंगा दशहरा कहते हैं।
पूजन विधि- इस दिन की पूजन साम्रगी में दस दीपक, दस ताम्बूल, दस फल, दस प्रकार के सुगन्धित पुष्प, दस धूपबत्ती, तथा दस प्रकार के नैवेद्य का विधान है। आम, सत्तू, पंखा तथा पानी से भरा मटका भी दान देने की परम्परा है। दस ब्राह्मण भी दक्षिणा के अधिकारी हैं। ऐसा कथन है कि सोलह सोलह मुठ्ठी जौ और तिल भी दान दिये जाते हैं। गंगा- स्त्रोत का पाठ, विष्णुसहस्त्र नाम तथा गंगावतरण की कथा सुनने की परम्परा हैं।
यदि कोई भक्त नदी पर जाने में असमर्थ है या उस क्षेत्र में नदी नहीं है तो अपने निवास पर पाटला रख कर उस पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर जल भरा कलश रख कर गंगा पूजन कर सकता है और निम्राकित श्लोक का पाठ करें-
सरस्वती रजोरुपा तमोरुपा कलिन्द जा।
सत्वरुपा च गंगाऽत्र जयन्ती ब्रह्म निर्गुणम्।।
पद्मपुराण सृष्टि खंड में कहा गया है कि गंगा ही एकमात्र ऐसी नदी है जो किसी भी प्रकार से पापग्रस्त पतित का उद्धार कर देती है।
गंगा नदी का आर्थिक महत्व- गंगाजी का धार्मिक भौगोलिक तथा साहित्यिक महत्व तो है ही परन्तु इसका आर्थिक महत्व सर्वोपरि है। गंगा-सिन्धु का विशाल उपजाऊ मैदान अपनी उपजाऊ मिट्टी के लिये प्रसिद्ध है। यहाँ की प्रसिद्ध फसलें गन्ना, धान, दलहन, तिलहन, गेहूँ तथा आलू आदि हैं।
पर्यटन का महत्व- पर्यटन की दृष्टि से भी गंगा नदी के किनारे बसे हुए ऐतिहासिक तथा धार्मिक स्थल पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। यहाँ बड़ी मात्रा में विदेशी पर्यटकों का आगमन होता रहता है जो आर्थिक उपार्जन में सहायक है। इलाहाबाद, हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी आदि महत्वपूर्ण स्थल गंगा किनारे बसे हुए हैं। देश-विदेेश से गंगा दशहरे के दिन गंगा स्नान के लिए भक्तगण आते हैं और गंगा-आरती में उपस्थित होकर पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं। विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा सुन्दरबन भी गंगा के किनारे है। जूट तथा चावल का उत्पादन भी यहाँ होता है। गंगा के ऊपर प्रसिद्ध विशाल बाँध बने हुए हैं। इनसे सिंचाई, विद्युत उत्पादन तथा मछली उत्पादन विपुल मात्रा में होता है।
प्रदूषण के कारण - गंगा के किनारे बसे शहरों की मलमूत्र विसर्जन, चमड़े के कारखानों का दूषित पानी, रासायनिक तथा कीटनाशक का प्रयोग, अधजली लाशें, किनारें पर छोड़ गये कपड़े, प्लास्टिक सामग्री आदि ने गंगा जैसी पवित्र नदी को प्रदूषित कर दिया है। राजा भगीरथ के भगीरथ प्रयास से लाई गई इस सुरसरि को हमें प्रदूषण से बचाना होगा, तभी भारत की यह जीवनधारा सुरक्षित रह सकेगी।
हमारे प्रधानमंत्री की नमामि गंगे योजना के अन्तर्गत गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक विशाल धन राशि स्वीकृत की है। अब शासन और जनता के सहयोग से ही हमारी पवित्र नदी अपने प्राचीन स्वरूप को धारण कर लेगी और हमारा गंगा दशहरा पर्व सच्चे अर्थों में सार्थक सिद्ध होगा।
एक गुजराती तथा राजस्थानी लोकगीत में कहा गया है-
''मनरवा अवतार पायो नहीं नाह्यों जीवड़ा,
व्यर्थ बिताया अवतार थारो,
चेतीजा चेतीजा तु हाड़का भीजड़ जीवड़ा,
थने चेतवे पवितर गंगा माय जी।
मनुष्य देह पाने पर भी तूने अभी तक गंगा स्नान नहीं किया है। तेरा अवतार व्यर्थ गया। अब भी चेत जीते जी अपनी हड्डियों को उस पवित्र गंगा में डुबकी कर भीग जा।
इस प्रकार भारत के जन-जन के मानस में बसी गंगा नदी में एक बार भी मानस में बसी गंगा नदी में एक बार भी स्नान करने पर, उसमें डुबकी लगाने पर ही हमारा मानव जीवन सार्थक सिद्ध होगा। यही हर भारतवासी की हार्दिक भावना रही है और यदि वह दिन गंगा-दशहरे का हो तो फिर सोने में सुहागा होगा।
11जून/ईएमएस