लेख

क्या हम इंडियन होने से गर्व महसूस करते हैं या भारतीय ? (लेखक - डॉ अरविन्द जैन/ईएमएस)

14/03/2019

हमारे देश में जब शिशु जन्म लेता हैं तो उसका नाम उस समय के नक्षत्र के हिसाब से सार्थक नाम रखा जाता हैं। नाम अर्थ पूर्ण हो जो उस शिशु के गुणों के अनुरूप और अनुकूल हो। क्या हम दूसरे के द्वारा दिए गए नाम को स्वीकार करते हैं ?संभवतः नहीं। नाम एक व्यक्ति की पहचान होती हैं, हर व्यक्ति अपने नाम का भूखा होता हैं। उसके नाम का शब्द जैसे ही कानों में सुनाई देता है तो उसके कान खड़े हो जाते हैं, उसका नाम कही लिखा मिल जाता हैं तो सबसे पहले उसकी नज़र अपने नाम पर जाती उसका चाहे अखबार हो, पत्र हो और इसी प्रकार उसका चित्र समूह में हो तो सबसे पहले अपना चित्र खोजता हैं और उसके मुख पर मुस्कान आ जाती हैं।
क्या कोई अपना नाम रावण, कंस, दुर्योधन, शकुनि, हिडम्बा, त्रिजटा, सूर्पनखा, कैकयी रखना चाहती हैं या कोई किसी को ललिता पवार, कैकयी, श्यामा कह देने से वह नाराज़, कुपित और कभी कभी झगड़ने को तैयार हो जाती हैं। पर इंडियाका नाम ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष के अनुसार क्या हैं ? गरीब, कंगाल,पुरातनपंथी या पुराने ज़माने के अपराधी लोग किया गया हैं। इसका उल्लेख ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी १९०० सेन्टुअरी पेज नंबर ७८९। इस परिभाषा से क्या हम गौरवान्वित होंगे, क्या ये उपमा हमारे लिए उपयुक्त हैं ?
भारत, भारतवर्ष, हिंदुस्तान, आर्यावर्त ये कुछ शब्द भारत के लिए प्रचलन में हैं जिन्हे हम भूल गए। यदि हम इन गौरवशाली शब्दों का अर्थ समझले तो शायद हम इंडिया और इंडियन शब्द के उपयोग नहीं करेंगे।।
सामान्यतः भारत एक एशिया महाद्वीप के दक्षिण एशिया में स्थित बहुल आबादी वाला विश्व का दूसरे नंबर का देश हैं जो वर्ष १९४७ में ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ। भारत वर्ष विजयार्ध में समुद्र से उत्तर और गंगा -सिंधु नदियों के मध्य भाग में १२ योजन लम्बी और ९ योजन चौड़ी विनीता नाम की नगरी थी, उसमे भरत नाम का षट्खण्डाधिपति चक्रवर्ती हुआ था उसने सर्व प्रथम राज्य विभाग कर इस क्षेत्र का शासन किया था अतःइस क्षेत्र का भरत पड़ा, जैसे संसार अनादि हैं उसी तरह क्षेत्र आदि के नाम भी किसी कारण अनादि हैं। वर्तमान में जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान् आदिनाथ, ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम से भारत नाम प्रचलन में हैं। जिसकी पुष्टि वेद, पुराणों और इतिहासकारों द्वारा की गई हैं, चौबीस अवतारों में ऋषभनाथ, अजितनाथ और नमिनाथ का उल्लेख हैं।
भारत एक स्थान का नाम होने से उसे हम भारतवर्ष कहते हैं
हिंदुस्तान जहाँ पर हिन्दू, जैन बुद्ध और सिख धरम का उद्भव हुआ और जो इन धर्मों के मानने वाले धर्माबलम्बी रहते हैं उस स्थान या देश का नाम हिंदुस्तान हैं। सिंधु नदी का बिगड़ा रूप हिन्दू होने से भी हिंदुस्तान हो गया।
हिन्दुस्तान जिसकी उत्पत्ति फारसी भाषा से हुई है जिसका अर्थ हिन्द (हिन्दू) की भूमि होता है और यह नाम मुगल काल से प्रयोग होता है यद्यपि इसका समकालीन उपयोग कम और प्रायः उत्तरी भारत के लिए होता है।
और इसलिए जब ' भारत माता की जय ' का नारा लगाते हैं, तब आप अपनी और इस सारे हिंदुस्तान में बसने वाले हमारे भाइयों और बहनों की जय का नारा लगाते हैं।
आर्यावर्त भी एक नाम होने का कारण यहाँ बाह्य आक्रमण के कारण आर्य लोग भारत आये और उन्होंने आर्यावर्त नामकरण किया।
इस प्रकार क्या हम ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी द्वारा उदघाटित शब्द इंडिया का अर्थ जाहिल, असभ्य और अपराधी को अंगीकार करे। यदि हां तो हमें कोई जरुरत नहीं हैं की हम इंडिया का गुणगान भारत के समान कर अपने आपको गौरवान्वित करे या हम अपने संविधान से यह शब्द हटाए की भारत, इंडिया हैं। यह इंडिया शब्द हमारे लिए नासूर हैं और यह सब हमारे देश के पढ़े लिखे अंग्रेजपरस्त लोगों की देन हैं। क्या उस समय के तत्कालीन राजपुरुष नेता अभिनेता इस मायनों से अनभिज्ञ थे ?। मैं यह मानने से इंकार करता हूँ। आज भी इसी का परिणाम हैं की हमारे देश की राष्ट्रभाषा १०० वर्षों के बाद भी हिंदी नहीं हो पायी मात्र राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण।
हम आज भी जाहिल, असभ्य और अपराधी होने की पहचान अपनाने को तैयार हैं। भारतीय सभ्यता, संस्कृति किसी के प्रमाण पत्र की मुहताज नहीं हैं। क्या हमारी विरासत उन अंग्रेजो से प्राचीन नहीं हैं पर हम लोग पश्चिमी सभ्यता के इतनी पिछलग्गू हैं की उनका अन्धाधुकरण करने में नहीं हिचकचाते हैं। क्या आज भी ७० वर्ष से अधिक गुलामी से मुक्त होने के बाद इतनी प्रगति करने के बाद भी हम क्या अब भी जाहिल, असभ्य और अपराधी होने का लेबल लगवाना जरुरी हैं।
अब वक़्त आ गया हैं की हम पूरे देशवासी सब स्थानों से इंडिया शब्द को हटाने की मुहीम चलाये और हम सिर्फ भारत या भारतवर्ष को अपना देश का नाम अपनाएंगे।
इंडिया कह कर हम कितने गर्वित महसूस करेंगे ?
क्या हम भी जाहिल असभ्य और अपराधी हैं ?
क्या हमने विश्व को अनादि काल से अहिंसा, सत्य, सन्देश नहीं दिया ?
क्या हमने अपनी पुरातन संस्कृति का लोप इंडिया के सम्मुख कर दिया ?
अब नहीं चेतेंगे तो कब हम जागेंगे ?
क्या हमारी गरिमा पहचान ये ही मानी जाएगी ?
धिक्कार हैं अभी के राजनेताओं, विद्वानों और मूर्खों को
जो अभी तक ढोते जा रहे हैं इंडिया को
अब समय आ गया हैं बदलो नाम इंडिया का
अब जरुरत हैं हिंदी, भारत, भारतवर्ष , की
इंडिया के कलंक को मिटाना हैं, मिटाना हैं
14/03/2019