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(विशेष टिप्पणी) अंजाम यह तो आगाज क्या होगा, शहर का विकास क्या होगा (लेखक - सुनील साहू/ईएमएस)

06/08/2022

संदर्भ- नगर सत्ता के दोहरे शपथ ग्रहण के मायने
नगर निगम जबलपुर के नवनिर्वाचित महापौर एवं पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह के लिए सियासत तेज हो गई है। महापौर के शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के शामिल होने से भाजपा ने दूरी बना ली है। यही वजह है कि महापौर का शपथ ग्रहण समारोह जहाँ ७ अगस्त को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की मौजूदगी में विटरनरी कॉलेज ग्राउंड में आयोजित किया जाएगा वहीं भाजपा के ४४ पार्षदों का शपथ ग्रहण समारोह नगर निगम परिसर में ठीक उसके अगले दिन आयोजित किया जाएगा जिसमें जिले के प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि शामिल होंगे। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या राजनीतिक प्रतिद्वंदिता या विद्वेष की वजह से जनता के धन की होली खेली जा सकती है। नगर निगम की माली हालत किसी से छिपी नहीं है। अब दो-दो समारोहों की तैयारियों में नगर निगम के खजाने से जो रुपया खर्च होगा वो कहीं न कहीं करदाताओं द्वारा प्रदत्त राशि यहाँ तक की मेहनतकश दिहाड़ी रेहड़ी लगाने वाले छोटे-छोटे व्यापारियों की दैनिक बैठकी वसूली से आने वाला धन होगा। अलग-अलग शपथ ग्रहण करने की नई परंपरा की शरुआत बेहद दुर्भाग्यजनक है। सियासतदार भले ही इसकी संवैधानिक व्यवस्था की अपने बयानों में छीछालैदर करें ये उनका अधिकार है उस विवाद में हम नहीं जाना चाहते। राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा और भाजपा नगर अध्यक्ष जी एस ठाकुर द्वारा किया गया पलटवार सियासत की दृष्टि से तो ठीक है लेकिन इसे लोकतंत्र की स्वस्थ्य परंपरा नहीं कहा जा सकता। ये भी सही है कि इंदौर में कांग्रेस के पार्षदों ने अलग शपथ लेने का फैसला लेकर इसकी शुरुआत की है लेकिन सियासतदार शायद इस बात को भूल गए कि नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधि शपथ किसी राजनीतिक दल की नहीं लेते बल्कि जिस संस्था के लिए निर्वाचित होते हैं उस संस्था के प्रति समर्पित और निष्ठावान रहकर बिना किसी रागद्वेष के जनसेवा करने की शपथ लेते हैं। देश के संविधान में चार सरकारों की व्यवस्था है लोकसभा, विधानसभा, नगर सत्ता और जिला पंचायत (ग्रामीण सरकार) सत्ता की व्यवस्था है। अभी तक यही होता आया है कि शपथ ग्रहण समारोह में सभी दलों के नेता और निर्वाचित प्रतिनिधि एक साथ एक दिन शपथ लेते थे, जो किसी कारण से चूक जाते हैं उन्हें बाद में सदन के भीतर शपथ दिलाई जाती है। अब यहाँ भाजपा को यह आपत्ति है कि कमलनाथ आ रहे हैंं, कमलनाथ कांग्रेस के नेता हो सकते हैं लेकिन वे किसी राजनीतिक पद पर नहीं हैं। भाजपा के मुताबिक वे कांग्रेस के एक विधायक मात्र हैं। भाजपा के नगर अध्यक्ष यह भी कह रहे हैं कि संवैधानिक व्यवस्था की पटरी से पहले कांग्रेस इंदौर में उतरी तब जाकर के भाजपा को भी यह कदम उठाना पड़ा लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह भी है कि इंदौर में शहर विकास के लिए सभी दलों के नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े भी हो जाते हैं। यही वजह है कि आज भी इंदौर के मुकाबले जबलपुर कहीं नहीं है। इस मामले को लेकर कांग्रेस की ओर से राज्य सभा सदस्य विवेक कृष्ण तन्खा की भी प्रतिक्रिया आई है कि भाजपा संवैधानिक व्यवस्था का पालन नहीं कर रही है। दो-दो शपथ ग्रहण संविधान के विपरीत हैं तो भाजपा भला कहां चुप रहने वाली है। भाजपा के नगर अध्यक्ष जीएस ठाकुर ने श्री तन्खा को नसीहत दे डाली कि खुद केंद्र सरकार की तिरंगा यात्रा का बहिष्कार करके श्री तन्खा अगर संविधान की बात करते हैं तो उन्हें शोभा नहीं देता है और संवैधानिक व्यवस्था की सीख किसी को देनी है तो वे अपने इंदौर के पार्षदों को दें, जिन्होंने यह विवाद खड़ा किया है। इस तरह का दोहरा चरित्र कांग्रेस के नेताओं का ही हो सकता है। इसी बीच जनता दल यू के प्रदेश अध्यक्ष सूरज जायसवाल की भी प्रतिक्रिया आई। उनका कहना है कि निर्वाचन के बाद दलगत भावना खत्म होना चाहिए क्योंकि शपथ किसी दल की नहीं ली जाती बल्कि शपथ उस संस्था के प्रति सच्ची निष्ठा और ईमानदारी की शपथ ली जाती है। इससे साफ संदेश जाएगा कि जबलपुर में दलगत भावना से ऊपर उठकर कोई काम नहीं होंगे। शपथ ग्रहण समारोह में सभी दलों के नेता आते हैं यह स्वस्थ्य परंपरा रही है। अच्छा यह होता कि कांग्रेस और भाजपा के नेता बैठकर एक रूपरेखा बनाते और उसमें दोनों दलों के वरिष्ठ नेता शामिल होते, शपथ ग्रहण के लिए भी व्यवस्था निर्धारित होती। विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष विधायकों को, लोकसभा में लोक सभा अध्यक्ष सांसदों को और राज्य सभा में राज्य सभा के सभापति नवनिर्वाचित राज्य सभा सदस्यों को शपथ ग्रहण कराते हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्रपति एवं मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट को राज्यपाल शपथ दिलाते हैं यह संविधान में व्यवस्था है। इसी तरह नगर सत्ता में कलेक्टर महापौर और पार्षदों को शपथ ग्रहण कराते हैं। ऐसी स्थिति में कांगे्रस और भाजपा दोनों को खुले मन से समाधान का रास्ता निकालना था कि दोनों दलों के बड़े नेताओं की मौजूदगी में एक साथ शपथग्रहण समारोह आयोजित करने के निर्णय लिए जाने थे। तब यह संदेश जाता कि चुनाव के बाद दलगत राजनीति से परे होकर हमारे जनप्रतिनिधि शहर के विकास में जुटेंगे लेकिन यहाँ तो टकराव के साथ ही शुरुआत हो रही है आगाज यह है तो अंजाम क्या होगा। अब यहाँ सवाल उठने लगे हैं कि कांग्रेस के महापौर निर्वाचित होने पर जाहिर है कि एमआईसी भी उन्हीं की बनेगी और नगर सत्ता भी उन्हीं की कहलाएगी भले ही ४४ पार्षद भाजपा के जीते हों। शुरुआती कड़वाहट देखकर आम जनता में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं है। आम लोगों का मानना है कि आज जब शपथ ग्रहण में एक नहीं हैं तो कल शहर विकास के किसी मुद्दे पर कैसे एक होंगे। नगर निगम में केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार पोषित अनेक योजनाएं चल रही हैं क्या उनमें भी दलगत राजनीति आड़े आएगी और यदि आएगी तो यह न सिर्फ जनादेश का अपमान होगा बल्कि शहर विकास में पिछड़ भी जाएगा। आज भाजपा जिस जोश से सियासत और बयान बाजी कर रही है अगर नगर निगम के चुनाव में बयानबाजी करने वाले लोग मैदान में सक्रिय होते तो भाजपा को नगर सत्ता से हाथ नहीं धोना पड़ता। यहाँ यह भी कहना उचित होगा कि इस तरह की दलगत राजनीति और एकला चलो रे की रणनीति कांग्रेस पर दबाव बनाने की हो सकती है लेकिन भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि केंद्र और प्रदेश में उसकी ही सरकार है। नगर सत्ता को अगर दलगत भावना से परेशान किया गया तो इसका दोष सरकारों के सर मढऩे पर कांग्रेस कहीं पीछे नहीं रहेगी। बहरहाल अब देखना यह होगा कि यह टकराहट सियासी मिठास में बदलती है या नहीं क्योंकि महापौर हों या पार्षद शपथ तो ले लेंगे और सबका राजनीतिक कद और पद वैधानिक हो जाएगा लेकिन शहर किस तरह की राजनीति विकास के पंख लगाकर उड़ेगा इस पर अभी संशय की स्थिति बन गई है। ४४ पार्षद जीतने के बाद भाजपा महापौर के चुनाव में संगठनात्मक कमजोरियों पर कहीं पर्दा डालने की कोशिश में तो यह सियासी ड्रामा नहीं कर रही यह भी सच है कि शहर का विकास सियासी ड्रामेबाजी से नहीं बल्कि सदन के अंदर और सदन के बाहर शहर हित में दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करने से ही संभव होगा, वरना जिस तरह की राजनीति के संकेत मिल रहे हैं उससे तो लग रहा है कि जबलपुर का जिस तरह के नतीजे सामने आए हैं उससे शहर का विकास भगवान भरोसे ही होगा।
.../ 6 अगस्त 2022