लेख

(विचार-मंथन) श्रीलंका में सांप्रदायिक हिंसा से सचेत और सजग रहने की आवश्यकता (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

15/05/2019

इन दिनों हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका सांप्रदायिक आग में झुलस रहा है। इस पर काबू पाने के लिए वर्तमान श्रीलंका सरकार तरह-तरह के प्रयोग करती दिख रही है, लेकिन दंगाई हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि सोमवार को एक बार फिर भड़की सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए संपूर्ण देश में 6 घंटे का कर्फ्यू लगा दिया गया। इसे देखते हुए सीमावर्ती इलाकों और खासतौर पर देश के संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाने और सतर्क रहने की आवश्यकता भी महसूस की जाने लगी है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा फैलने में कोई बड़ी वजह हो ऐसा हमेशा नहीं होता है। पुरानी आपसी रंजिश या फिर छोटी-छोटी बात का बतंगढ़ बनाकर भी हिंसा भड़काई जा सकती है और उसे सांप्रदायिकता का रंग देने में भी समय नहीं लगता है। इसलिए श्रीलंका में लगातार हो रही घटनाओं पर बारीक नजर रखने की आवश्यकता तो है ही साथ ही मीडिया पर आने वाले बयानों और प्रमुख क्रियाकलापों पर भी पैनी नजर रखनी होगी। गौरतलब है कि श्रीलंका में ईस्टर के दिन हुए आत्मघाती हमलों में करीब 250 से ज्यादा लोगों की जान गई थी, जबकि पांच सौ के करीब घायल हुए थे। इसके बाद श्रीलंका के कुछ क्षेत्रों में रह-रहकर सांप्रदायिक हिंसा भड़की और अब जबकि उस हिंसा ने बड़ा रुप ले लिया है, जिसकी चपेट में पूरा देश आता दिख रहा है, तो बड़े कदम उठाने की आवश्यकता महसूस हो रही है। यही वजह है कि रात 9 बजे से तड़के 4 बजे तक का कर्फ्यू लगाया गया और सेना प्रमुख महेश सेनानायक ने स्पष्ट कह दिया कि सैनिकों को कर्फ्यू का उल्लंघन करने वालों से कड़ाई से निपटने के सख्त निर्देश दिए जा चुके हैं। काई यदि कर्फ्यू का उल्लंघन करते देखा गया तो उसे सीधे गोली मारने के आदेश हैं। खबरों के मुताबिक कर्फ्यू लगाए जाने से पहले जब प्रशासन ने पहले दिन दो समुदायों के बीच हुई हिंसा के बाद उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के प्रमुख शहर कुलियापिटिया, बिंगिरिया, हेटिपोला और डूमलसूरिया से कर्फ्यू हटाया तो वहां एक बार फिर हिंसा भड़कने के आसार दिखे, जिसके बाद पुन: कर्फ्यू लगा दिया गया। देश के बिगड़ते हालात के बीच प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने देश के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। बताया जाता है कि श्रीलंका सरकार ने देश में अल्पसंख्यक मुसलमानों और बहुसंख्यक सिंहली समुदायों के बीच हिंसा की घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर भी पुन: प्रतिबंध लगाने के आदेश दे दिए हैं। इस प्रकार असामाजिक तत्व सूचना देने के इन माध्यमों का गलत इस्तेमाल करते हुए किसी प्रकार की कोई अफवाह न फैलाने पाएं इसके लिए भी इस तरह के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन समझना होगा कि ये तमाम कदम काफी नहीं होते हैं। दंगों और दंगाइयों को रोकने के लिए स्थानीय प्रभावी लोगों को भी आगे आना होगा। दरअसल यहां समझने वाली बात यह है कि शासन-प्रशासन जो करता है वह अपने स्तर पर करता है, जिसकी अपनी सीमाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। उसके लिए लीक से हटकर कार्य करना मुश्किल काम होता है, जबकि लोगों के बीच शांति और सद्भाव बनाने के लिए जरुरी होता है कि आमजन के बीच से ही अच्छी छवि वाले लोग आगे आएं और डरे-सहमें व किन्हीं कारणों से नाराज लोगों को समझाने का प्रयास करें। इसके लिए उनकी सहायता अपने स्तर पर शासन-प्रशासन कर सकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं व समाजसुधारकों का असर लोगों के बीच बहुत तेजी में देखने को मिलता है, क्योंकि जो बात अपने बीच में रहने वाला शख्स जितनी अच्छी तरह से समझा सकता है वैसा कोई और नहीं समझा सकता है। यह प्रभावी इसलिए भी होता है क्योंकि ये लोग आस-पास रहने वाले लोगों के बारे में बेहतर जानते हैं और उनके क्रिया-कलाप व कमजोरियों से लेकर उनकी ताकत के बारे में भी उन्हें गहरी मालूमात होती है। इसलिए भारत जैसे देश में जब-जब सांप्रदायिक हिंसा भड़की है, तब तक ऐसे ही विचारवान और प्रभावी कहे जाने वाले अच्छी छवि के लोगों की मदद ली गई है। इसके नतीजे भी सकारात्मक तौर पर सामने आए हैं। इस तरह के प्रयोग श्रीलंका में भी किए जाने चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि हिंसा की आगे अन्य क्षेत्रों में न फैलने पाए, क्योंकि यह वह आग है जो लगती तो चंद पलों में है, लेकिन इसे बुझाने में सालों लग जाते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि भौतिक तौर पर सामने दिखाई देने वाली आग को तो आसानी से बुझाया जा सकता है, लेकिन लोगों के दिलो-दिमाग में लगने वाली सांप्रदायिकता वाली आग को बुझाना कोई बच्चों का खेल नहीं होता है। यहां समझने और समझाने की आवश्यकता यह है कि आतंकवादी कभी किसी के सगे नहीं हो सकते हैं और जहां तक इन्हें किसी धर्म विशेष से जोड़कर देखने की बात है तो शुरु से यह कहा जाता रहा है कि धर्म, मजहब या जाति के नुमाइंदे आतंकवादी नहीं होते हैं, बल्कि सत्ता और शक्ति की चाहत में कुछ सिरफिरे इस तरह की हरकतें कर देते हैं, जिसका खामियाजा पूरे समाज को उठाना पड़ जाता है। आखिर यह कौन नहीं जानता कि जिस देश में आतंकवादी गतिविधियां फलती-फूलती हैं, वहां का विकास पूरी तरह ठहर जाता है, इसका जीता-जागता उदाहरण पाकिस्तान हमारे सम्मुख है। इसलिए श्रीलंका सरकार को चाहिए कि देश में सांप्रदायिक ताकतों को पैर जमाने का अवसर प्रदान न करें और कैसे भी हो लोगों के दिलों में एक-दूसरे के प्रति नफरत के बीच न बोने न दें। अंतत: मशहूर शायर कैफ भोपाली का यह शेर यहां मौजू है कि 'आग का क्या है पल दो पल में लगती है, बुझते बुझते एक जमाना लगता है।'
15मई/ईएमएस