लेख

(विचार-मंथन) राजनीति अर्थात् बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

14/05/2019

लोकसभा चुनाव 2019 के छठवें चरण का मतदान संपन्न होने के साथ ही कुल 482 सीटों पर उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला भी ईवीएम में बंद हो चुका है। इस बीच जहां प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं, वहीं कद्दावर नेता और स्टार प्रचारकों ने पूर्व की गलतियों को भुलाने और बेहतर कुछ करने का मंत्र गुनते और आत्मसात करते हुए अंतिम चरण में अपनी पूरी ताकत झोंकने की खातिर कमर कसने के साथ ही लोकतांत्रिक समर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का काम जारी रखा है। इसी के चलते यहां रविवार को 6वें चरण में सात राज्यों की 59 सीटों पर मतदान हुआ वहां आखिरी चरण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ताबड़तोड़ रैलियों का आगाज कर चुनावी माहौल को गर्माने का काम कर दिखाया। वहीं मीडिया में सुर्खियां इस बात को लेकर बनीं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हैलिकॉप्टर की लैंडिंग को इजाजत नहीं दी गई, इस कारण शाह ने अपनी शैली में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ललकारते हुए कहा कि 'कोलकाता आ रहा हूं, हिम्मत हो तो गिरफ्तार कर लेना।' गौरतलब है कि सोमवार को पश्चिम बंगाल में शाह की तीन रैलियां आयोजित होनी थीं, इनमें जाधवपुर में हेलिकॉप्टर उतारने की इजाजत नहीं मिलने की वजह से सभा को रद्द करना पड़ गया, जिसकी खीझ शाह के बयानों में साफ झलकती है। इस पर शाह कहते दिखे कि जाधवपुर ममता के भतीजे की सीट है, इसलिए वो डर गईं कि कहीं तख्त पलट न जाए, इसलिए यह सब किया गया है। बहरहाल शाह ने पश्चिम बंगाल के जॉय नगर में जनसभा को संबोधित करते हुए कह गए कि 'ममता दीदी कहती हैं कि बंगाल में जय श्रीराम नहीं बोल सकते हैं। मैं इस मंच से जय श्रीराम बोल रहा हूं और यहां से कोलकाता जाने वाला हूं। अब ममता दीदी में हिम्मत हो तो गिरफ्तार कर लें।' इस प्रकार पश्चिम बंगाल के साथ ही साथ देश के आम चुनाव को एक बार फिर धर्म के नाम पर मथने का काम बखूबी किया गया और बताया गया कि किस तरह से गैर भाजपा वाली राज्य सरकारें धर्म का पालन करने वालों को अपने राज्यों में कदम रखने से भी रोक रही हैं। बहरहाल ममता बनर्जी ही नहीं बल्कि अनेक विरोधी नेताओं ने तो पहले ही भाजपा के इन नेताद्वय से सवाल किया कि उनसे यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि इस मोदी कार्यकाल में उन्होंने कितने राम मंदिरों का निर्माण देश के अंदर करवा दिया, जो इस तरह से राम के नाम पर राजनीति करते चले जा रहे हैं। एक प्रकार से जनता की भावनाओं से खेलने का काम भी खूब हो रहा है, जिसे सभी समझ रहे हैं, इसलिए इस बार मतदाता भी खामोश है, ठीक वैसे ही जैसे कि यूपीए के समय में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौन साधे रहते थे, लेकिन काम ऐसा करते थे कि दुनिया आज भी उनका नाम लेते हुए कहती है कि प्रधानमंत्री हो तो मनमोहन जैसा हो, जो विश्व मंदी के दौर में भी देशवासियों पर उसकी आंच आने नहीं दिया। यह उनकी काबिलीयत और सरकार की नीतियों की सफलता का पैमाना रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के सफल कार्यकाल को किस तरह से परिभाषित किया जाना चाहिए अभी तक लोगों के समझ में नहीं आया है। फिर भी यह समय करो या मरो वाला है, अत: भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस, महागठबंधन, सपा-बसपा गठबंधन समेत हर छोटे बड़े दल जनसभाओं और जनसंपर्क में व्यस्त नजर आ रहे हैं। इसी बीच नजर बंगाल से निकलकर उत्तर प्रदेश में जा टिकती है जहां बसपा सुप्रीमों और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहती दिखती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी दलितों पर नकली प्रेम दिखा रहे हैं। मायावती की इस बात का सुबूत भी प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य से ही मिलता है। दरअसल गुजरात से खबर आ रही है कि उच्च जाति के दबंगों ने दलित दूल्हे को बारात निकालने नहीं दिया। पथराव और हिंसा होने के बाद पुलिस को भी लाठीचार्ज करने की नौबत आ गई। इस तरह की हफ्तेभर में यह चौथी घटना थी। यह घटना गुजरात के अरावली जिले की बताई जाती है, जहां रविवार को एक दलित दूल्हे की बारात पर पथराव किया गया था। अब चूंकि गुजरात प्रधानमंत्री मोदी का गृहराज्य है और पहले वो यहां के मुख्यमंत्री भी रहे हैं अत: सबसे ज्यादा दायित्व तो उनका ही बनता है कि इस तरह की घटनाओं को जड़ से खत्म करें। दलितों को समाज में बराबरी का दर्जा दिलवाने के लिए वाकई यदि काम हुआ होता तो ये दिन देखने को नहीं मिलते। यह सरकार की कथनी और करनी के बीच की खाई को ही प्रदर्शित करता है और इसलिए मायावती जो कहती हैं कि यह प्रधानमंत्री मोदी का दलितों के प्रति झूठा प्रेम है तो वह भी सही ही साबित होता हुआ दिखता है। हद यह है कि आमचुनाव सालों से धर्म और जाति के नाम के साथ ही साथ झूठ और फरेब वाले जुमलों के दम पर लड़े जा रहे हैं, लेकिन तब भी कहा यही जा रहा है कि यदि देश की भलाई होगी तो इन्हीं से होगी। ऐसे समय में जबकि चुनाव अपने अंतिम चरण पर पहुंच गया है इन नेताओं और राजनीतिक पार्टियों से सवाल जरुर किया जाना चाहिए कि जिनके एजेंडे में देश के विकास का लेखा-जोखा या प्रारुप ही नहीं है वो आखिर किस मुंह से आमजन की भलाई करने की बात कर रहे हैं? जनता को यह सब जानने का अधिकार भी है कि जिसे वो अपना प्रतिनिधि चुनने जा रही है और जिसके हाथों सत्ता की कमान वह सौंपना चाहती है उसके पास देश के विकास का एजेंडा है भी या नहीं। वैसे भी जिस जनता को सियासी तौर पर भुलक्कड़ कह दिया जाता है दरअसल वह सब याद रखती है, बस फर्क यह है कि उसने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने की खातिर 'बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय।' वाली नीति अपना रखी है। वर्ना राजनीति के नाम पर किए जाने वाले अनेक घिनौने कृत्य तो माफी के लायक भी नहीं होते हैं।
14मई/ईएमएस