लेख

३ दिसंबर (१८८४) जन्म दिन पर विशेष : भारत के पहले राष्ट्रपति अद्भुत अजातशत्रु डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (लेखक- बलदेवराज गुप्त / ईएमएस)

02/12/2018

अजातशत्रु, राजनेता, प्रखर वकील, गंभीर प्रोफेसर एवं बेबाक पत्रकार एक जिम्मेदार नागरिक, धार्मिक, दक्षिण पंथी विश्वसनीय देशप्रेमी के विशेषणों से युक्त भारत रत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति बनाए गये। आज ही के दिन 3 दिसंबर 1884 को कांग्रेस पार्टी के जन्म से एक वर्ष पूर्व वर्तमान बिहार के जीरादेई गांव, जिला सारन (छपरा) के मध्यम वर्गीय जमींदार कायस्थ परिवार में आपका जन्म हुआ था।
संस्कृत विद्वान महादेवसहाय और माता कमलेश्वरी की वह पांचवी संतान थे। उनसे बड़े एक भाई व तीन बहने थीं। उस समय के चलन के अनुसार गांव के मौलवी से फारसी पढ़ने के लिए राजेन्द्र को मदरसे भेजा गया। घर में हिन्दी व गणित की पढ़ाई होती थी। जल्द ही उन्हें जिला छपरा के स्कूल भेज दिया गया। 12 वर्ष की आयु में ही जून 1896 में राजवंशी देवी से आपका विवाह कर दिया गया। आज के हिसाब से वह एक बाल-विवाह था। मां मर चुकी थी। राजेन्द्र को बड़ी बहन ने पाला।
राजेन्द्र बाबू मेधावी थे। अंग्रेजी व गणित की पढ़ाई बड़े भाई के सानिध्य में पटना में हुई। कलकत्ता यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में अव्वल आने पर 30 रू. की छात्रवृत्ति मिली तो कलकत्ता में पढ़ना आसान हो गया। प्रेसीडेंसी कालेज से स्नातक किया। साइंस व गणित उनके प्रिय विषय थे।
जहां के परीक्षकों ने लिखा- परीक्षार्थी का ज्ञान परीक्षक से बेहतर है। (एक्जामिनी नोज बैटर देन एक्जामिनर) राजेन्द्र की रुचि समाज के गरीब तबके की ओर गई तो उन्होंने 1907 में एम.ए. कलकत्ता विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में किया। मेडल तो उन्हें हर परीक्षा में मिलता ही था। 1906 में ईडन हिन्दू होस्टल में रहते हुए बिहारी स्टुडेन्ट्स कांफ्रेंस बनाई। कलकत्ता लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। 1917 में पटना हाईकोर्ट आए। भागलपुर में प्रैक्टिस करने लगे। "बिहार लॉ वीकली" निकाला, हिन्दी में "देश" का प्रकाशन भी करते थे। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में वह प्रतिबद्ध थे।
राजेन्द्र प्रसाद "सर्चलाइट डेली में अंग्रेजी में अपने लेख विस्तार से लिखते रहते थे। देश, साप्ताहिक उनके चिन्तन के सोच का प्रतिफल था। कांग्रेस तो उन्होंने 1911 में अपना ली थी। 1912 में जब बिहार-उड़ीसा वजूद में आए तो राजेन्द्र प्रसाद को उन क्षेत्रों का नेतृत्व मिला।
महात्मा गांधी से पहली मुलाकात में आप प्रभावित हो गए। किसानों की मदद की आज की अनेक राजनीतिक पार्टियां उनसे प्ररेणा ले सकती है। गांधी के अहवान पर चम्पारण में नील की खेती में फंसे किसानों की दुर्दशा सुधारने के लिए राजेन्द्र बाबू ने हजारों रूपये की वकालत छोड़कर गांधी के स्वयं सेवक बन गए। 1990 में असहयोग का आन्दोलन में गांधी के साथ खड़े हो गए।
राजेन्द्र प्रसाद मेधावी थे। वकील के अलावा, वह पत्रकार व शिक्षक भी थे। कलकत्ता सिटी कॉलेज में इकनोमिक्स के प्रोफेसर भी रहे। इतना ही नहीं उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में अग्रेजी के प्रोफेसर के साथ-साथ प्रिंसिपल का भी दायित्व निभाया।
सर्वगुण सम्पन्न राजेन्द्र बाबू, जब सक्रिय राजनीति में उतरे, तो जेल जाना उनकी नियती थी। 1914 में पहला विश्वयुध्द शुरू हो गया। बंगाल बाढ़ से त्रस्त था, मदद के लिए चन्दा इकट्ठा करने लगे। 1934 में बिहार में भूकम्प आया, तो अंग्रेजों ने राजेन्द्र बाबू, जो जेल में थे, उन्हें 17 जनवरी को छोड़ दिया। जनता की मदद के लिए कूद पड़े। राजेन्द्र बाबू के अनेक प्रयासों से प्राकृतिक-आपदा से निपटा गया। 1935 में स्वेटा (पाकिस्तान) में भारी भूकम्प आया, तो राजेन्द्र बाबू की सेवाओं का वहां भी भरपूर उपयोग हुआ।
राजेन्द्र प्रसाद सहज थे। उन्हें गरम दल, नरम दल, समाजवादी सभी चाहते थे। जब सुभाषचन्द्र बोस ने अथवा जे.बी. कृपलानी ने कांग्रेस प्रेसीडेंट का पद छोड़ा, तो जिम्मेदारी सर्वसम्मित से राजेन्द्र प्रसाद को दी गई। 1934, 1939, एवं 1947 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। स्वतन्त्रता आन्दोलन में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का अप्रितम योगदान रहा। 1934 में पहली बार वह बम्बई-अधिवेशन में कांग्रेस के प्रेसीडेन्ट चुने गए थे। राजनीति के सिवाय अगर वह कुछ करते थे, तो वह कानून व गणित की समस्याएं और उनका हल। यही वजह है कि इन सब आन्दोलनों और घर परिवार के लिए उनका विद्यार्थी जीवन चलता रहता। 1937 को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उन्होंने लॉ में डाक्टरेट किया।
1939 में नेताजी ने कांग्रेस व उसका अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध् शुरु हो गया था। कठिन दौर में कांग्रेस की कमान राजेन्द्र बाबू ही संभाल सकते थे। 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने क्विट-इंडिया (भारत छोड़ो) आन्दोलन का प्रस्ताव पारित कर दिया। देश के नेताओं की धरपकड़ शुरु हो गई थी। राजेन्द्र प्रसाद को पटना के "सदाकत-आश्रम" से गिरफ्तार कर बांदीपुर सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया। 15 जून 1945 को उन्हें छोड़ा गया।
अंग्रेज हिल चुके थे। मजबूरन उन्होंने जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में 2 सितम्बर 1946 को अन्तरिम सरकार का गठन करने की इजाजत दी। जिसे हम राष्ट्रीय सरकार भी कहते हैं। इसमें 12 मंत्री नामजद किए गये थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद को भारत का पहला खाद्य व कृषि मंत्री बनाया गया। 11दिसम्बर 1946 को ही राजेन्द्र बाबू को संविधान सभा का अध्यक्ष चुन लिया गया। उनकी देख-रेख में ही 1949 में भारत के संविधान का स्वरुप तय हुआ।
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जे.बी.कृपलानी 1947 में कांग्रेस से अलग हो गए। 17 नवम्बर 1947 को तीसरी बार कांग्रेस की बागडोर जितेन्द्र प्रसाद जैसे अजातशत्रु के हाथों सौंप दी गई। 15 अगस्त को भारत आजाद हो गया। संविधान निर्माण जारी था। 26 जनवरी 1950 को स्वतन्त्र भारत का अपना संविधान (शासन पद्ध्ति) लागू हुई। डा. राजेन्द्र प्रसाद सर्व सम्मति से भारत के राष्ट्रपति चुने गए। राजेन्द्र बाबू ने राष्ट्रपति बनते ही पद की मर्यादा भव्यता के चलते कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। और नई गाइडलाइन प्रस्तुत की। उन्होंने देश के प्रथम गणतंत्र दिवस के परेड की सलामी ली। सैनिकों के उत्साह को बढ़ाया। देश के जनसैलाब के साथ तिरंगे को प्रणाम किया। पहले गणतंत्र दिवस का सब काम विधिवत हुआ। राष्ट्रपति ने गणतंत्र दिवस पर जिस उत्साह और सक्रियता से राष्ट्रीय पर्व को मनाया वह सराहनीय था। पर कहीं कुछ था - जिसकी भनक बाद में लगी - वह भी उनके अत्यंत निकट के राजनेताओं को - गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या अर्थात 25 जनवरी 1950 की रात्रि में उनकी मां समान बड़ी बहन भगवती देवी का निधन हो चुका था। मृत देह घर पर रखी थी। भारत के प्रथम गणतंत्र दिवस समारोह की सम्पन्न्ता के पश्चात् ही उन्होंने अपनी बहन का अंतिम दाह संस्कार किया।
कर्तव्यनिष्ठ राजेन्द्र बाबू सनातनी विचारों के थे। पर कानून को सर्वोपरि मानते थे। 1952 और 1957 में वे पुन: राष्ट्रपति चुने गए। राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डन के दरवाजे उन्होंने ही पहली बार आम जनता के लिए खोले थे। जो आज तक जारी है। मई 1962 में उन्होंने अवकाश ग्रहण करके पटना (बिहार विद्यापीठ परिसर) में रहना पसंद किया जहां 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हुआ। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। अनेक पुस्तकों के लेखक डा. राजेन्द्र बाबू सादगी और ईमानदारी के प्रतीक थे। जिन्हें अपनी जनता और देश से प्रेम था। भिन्न विचारों के बावजूद उनका कोई विरोधी नहीं था। वह सच्चे गांधीवादी थे।
02दिसम्बर/ईएमएस