लेख

(विचार-मंथन) नेताओं की कमजोरी से कमजोर होती कांग्रेस (लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

12/07/2019

इसमें शक नहीं कि कांग्रेस इस समय कठिन से कठिनतम दौर से गुजर रही है। लोकसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों के बाद तो संपूर्ण देश में कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ ही रही है, उस पर हद यह है कि जिन राज्यों में कांग्रेस कुछ करके दिखला सकती थी या दिखला सकती है वहां पर भी कांग्रेस के ही नेता बगावती स्वर साधते दिख रहे हैं, जिससे कहना पड़ता है कि ये नेता अपनी ही पार्टी के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं। दरअसल पद और झूठी प्रतिष्ठा की चाह इन पर इस कदर हावी हो चुकी है कि जनता के द्वारा सेवा के लिए चुने जाने के बावजूद पार्टी बदलने को आतुर ये कांग्रेसी नेता अपनी ही छवि के साथ खिलवाड़ करते दिखलाई दे रहे हैं। इस संबंध में कर्नाटक और गोवा के उदाहरण सामने रखे जा सकते हैं। कहने में हर्ज नहीं कि गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे कथित नेताओं को जांचों और कानूनी कार्रवाई से जरुर भय लगता होगा और इस कारण सत्ता पक्ष के साथ तालमेल बैठाने का वो उपक्रम भी कर सकते हैं, लेकिन जो नेता जनता और देश की सेवा के लिए आगे आते हैं आखिर उन्हें किसी चीज का ऐसा क्या भय हो सकता है कि अपने क्षेत्र के मतदाताओं को धोखा देकर बीच भंवर में पार्टी को छोड़ दूसरे पाले में चले जा रहे हैं। विचारणीय है कि आखिर ऐसी कैसी महत्वाकांछाएं हैं जो अपने सिवाय किसी और की परवाह करने का मौका ही इन्हें नहीं दे रही हैं। ऐसे तमाम नेताओं को सबक सिखाने की आवश्यकता है और वह सबक पार्टी या कानूनी कार्यवाही नहीं बल्कि खुद जनता दे सकती है। दरअसल जो जनप्रतिनिधि इस तरह से पाला बदलने का काम करते हैं उन्हें क्षेत्र के मतदाताओं को आने वाले चुनाव में वोट देना ही नहीं चाहिए, फिर चाहे वो मतदाता किसी पार्टी विशेष से ही क्यों न जुड़ा हो। दरअसल यह कैसे विश्वास किया जा सकता है कि आज जिसने कांग्रेस या अन्य किसी पार्टी को अपनी शर्तें मनवाने के लिए धोखा दिया वह कल सत्ता में दूसरी पार्टी के आ जाने से पुन: अपने दल को धोखा नहीं देगा। वैसे नेताओं को तो हार-जीत दोनों में ही अपनी क्षेत्र की जनता के प्रति ईमानदार होना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कि इस समय राहुल गांधी करते देखे जा रहे हैं। गौरतलब है कि अपने परिवार की परंपरागत अमेठी लोकसभा सीट हार जाने के बावजूद राहुल वहां पहुंचे और उन्होंने अमेठीवासियों को आश्वस्त किया कि दिन हो या रात जब भी अमेठी को उनकी जरूरत होगी वो मौजूद रहेंगे। इसके साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए राहुल कह जाते हैं कि हार से निराश होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने क्षेत्र में जाकर पार्टी को मजबूत करें। इससे पहले राहुल ने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार का जिम्मा लेते हुए खुद ही पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद जहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें मनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी तो वहीं विरोधियों ने कहना शुरु कर दिया था कि वो पलायन कर रहे हैं। बहरहाल यह सत्य है कि पार्टी के प्रमुख पद से इस्तीफा देना कोई मामूली बात नहीं होती है, जो जिम्मेदार हैं वो इस बात को बेहतर तरीके से जानते हैं, लेकिन कहने वाले तो यही कह रहे हैं कि इससे पार्टी मजबूत नहीं होगी, बल्कि एक बार फिर से अलग-अलग खेमों में बटती दिखेगी। कांग्रेस के पास एक गांधी परिवार ही है जिसके रहते हुए सभी एक जगह एकत्रित हो पार्टी को मजबूती प्रदान कर सकते हैं, वर्ना अन्य किसी को अध्यक्ष बनाए जाने के बाद क्या स्थिति होगी यह सभी जानते हैं। यदि इन सब बातों को दरकिनार कर दिया जाए और पू्र्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या किसी अन्य ऐसे ही सुलझे और मान्य नेता को पार्टी अध्यक्ष बनाकर आगे बढ़ाया जाए तो क्या पार्टी के तमाम तंबू उसी मजबूती से खड़े रहेंगे, जैसे कि पहले खड़े दिख रहे थे। इस बात में शंका है, इसलिए राहुल को लगातार मनाने की बातें की जा रही हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस में ही ऐसे नेता मौजूद हैं जो कहते हैं कि राहुल को मनाने में एक माह खराब कर दिया, इससे तो बेहतर होता कि कार्यकारी अध्यक्ष घोषित करके आगे बढ़ा जाता। जमीनी हकीकत यही है कि पद के लोभ और लालच में पड़ने की बजाय कांग्रेस नेताओं को चाहिए कि वो अपने-अपने क्षेत्रों में उपस्थिति दर्ज कराएं और आमजन के मसलों को उठाने और उनके समाधान के लिए उनकी आबाज बनें। इससे जहां संबंधित नेता की पकड़ क्षेत्र में मजबूत होगी वहीं जनता में संदेश जाएगा कि कांग्रेस अब अपनी पुरानी जनसेवा वाली शैली में लौट रही है, जो कि पार्टीहित वाली है। अंतत: कांग्रेसियों के लिए यह समय एसी अर्थात् एयरकूल्ड कमरों और कारों में बैठने और घूमने का नहीं है, बल्कि आमजन के बीच में जाने और मेहनत करते हुए पसीना बहाने का है।
12जुलाई/ईएमएस