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श्रीमद् भगवत गीता ... मनन ,चिंतन, अनुकरण हेतु एक दिग्दर्शक विश्व ग्रंथ (लेखक...प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" / ईएमएस)

08/04/2021

सृष्टि का विस्तार हम अपने चारों को दूर-दूर तक देखते हैं . इसके सृजन का एक नियमित विधान है . संसार की उत्पत्ति व निरंतरता के तीन तत्व परिलक्षित होते हैं . माता-पिता जो हमारे शरीर को जन्म देते हैं , दूसरा प्रकृति जो शरीर का पोषण करती है व प्राणियों के स्वभाव का निर्माण करती है और तीसरा चेतना या प्राण जिसे वह परमपिता प्रदान करता है जो स्वयं अदृश्य है .
आध्यात्मिक चिंतन से अनुमान कर अज्ञात परमात्मा पर विश्वास किया गया है . संसार श्रद्धा भाव से परमात्मा के द्वारा संपादित कार्यों को जानकर उसकी पूजा करता है और उससे विश्व के कल्याण की कामना करता है . महात्मा तुलसीदास ने रामचरितमानस में परमात्मा के क्रियाकलाप में मनुष्य या देव द्वारा कोई हस्तक्षेप न कर पाने के भाव को इन पंक्तियों में लिखा है "हुई है वही जो राम रचि राखा को करि तर्क बढ़ावहि शाखा " अर्थात होगा तो वही जो राम ने अर्थात परमात्मा ने करने का विधान तय कर रखा है , वह अपरिवर्तनीय है .
अतः अपने मन में तर्क वितर्क कर , चिंता करने से क्या होगा ? ईश्वर जो चाहता है वैसे ही मन में विचार उत्पन्न हो जाते हैं और निर्धारित कार्य संपादित होता है . यही ईश्वरीय विधान या व्यवस्था सुनिश्चित है . इसी विचारधारा की पुष्टि गीता में भी होती है . भगवान ने अर्जुन को जनहित में दुष्टों के विरुद्ध , युद्ध करने में समर्थ होते हुए कुछ अन्य विचार मन में ना लाने का उपदेश देते हुए कहा है कि
" ईश्वरः सर्व भूतानाम् , हृदयेशे अर्जुन तिष्ठति , भ्राम्यनं सर्व भूतानि यंत्र रूढ़ानी मायया "
इससे स्पष्ट होता है कि परम पिता ईश्वर जैसी इच्छा करते हैं वह वे संसार में व्यक्तियों से करवा लेते हैं . मनुष्य ईश्वर इच्छा रूपी यंत्र पर आरूढ़ , जैसा परवश प्राणीमात्र है . ईश्वर जिससे जो चाहता है उसकी चेतना या मन को वैसा प्रेरित कर वैसा करवा लेते हैं .
आध्यात्मिक चिंतन करते हुए इस संसार में तीन तत्व प्रधान माने गये हैं . जीव , माया और सर्वशक्तिमान परमेश्वर . ईश्वर जीव को माया के आकर्षण में रखकर अपना विधान पूरा करवा लेते हैं , शरीर कार्य करने का साधन है . माया मन को मोहित करती रहती है . परमात्मा प्रत्येक प्राणी की चेतना या हृदय में सदैव निवास करता है . वे अपनी इच्छा से जीव को प्रेरित कर , प्राणी से समयानुसार जो भवितव्य निर्धारित है उसको पूरा करने के लिए आवश्यक कार्य करवा लेते हैं . दरअसल प्राणी स्वतंत्र नहीं है वह माया में बंधा हुआ रहता है. माया हर प्राणी से ईश्वरेच्छा को पूर्ण करवा लेती है . इसी भावना को प्रधान रूप से सामान्य तरीके से समझाते हुये ईश्वर को सर्वशक्तिमान , सर्व कर्मों का नियंता माना गया है . इस संबंध में गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया है , वह मात्र अर्जुन के लिए ही नहीं संपूर्ण मानव जाति के लिए ईश्वर का अनुपम उपदेश है . यह उपदेश सबके लिए परम कल्याणकारी है . इसको समझने के लिए गीता का अंतिम अध्याय क्रमांक 18 अर्थात " सन्यास योग " अत्यंत महत्वपूर्ण है . इस अध्याय के दूसरे श्लोक में भगवान कृष्ण , अर्जुन को समझाते हैं ..
" काम्यानां कर्मणां न्यासम्, सन्यांसम् कवयो विधुः , सर्व फल त्यागम् प्राहुः त्यागम् विचक्षणः "
अर्थात ज्ञानी लोग सभी काम्य कर्मों को छोड़ देने को सन्यास कहते हैं . और काम्य कर्मों के फल अर्थात परिणाम के परित्याग को त्याग कहते हैं . इसका अर्थ है मनुष्य को कर्म करने का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि यह जीवन से पलायन वाद है . कर्म करते हुए जीवन जीना ही सही है . कर्म के फल प्राप्ति की इच्छा को त्यागना ही मानसिक सुख शांति के लिए उचित है . यह त्याग ही जीवन जीने का सही मार्ग है . कर्म करना तो आवश्यक है . कर्म में सबका हित सन्निहित होता है . कर्म स्वभावज है . कर्म से सिद्धि मिलती है .
इस विषय में गहराई से समझने के लिए , श्रीमद्भगवत गीता के अंतिम अध्याय के अंतिम श्लोको को हर व्यक्ति को समझना , उनका चिंतन मनन अनुकरण करना चाहिये . सिद्धि प्राप्ति के विषय में श्लोक 51 से 56 में , संकटों से दूर हो सकने के उपाय के लिए श्लोक 57 व 58 में , प्रकृति का वेग समझने के लिए श्लोक 59 एवं 60 , ईश्वर शरणागति से सुख प्राप्ति हेतु श्लोक 61 से 63 , ईश्वर का विशेष ग्रह्य उपदेश समझने के लिए श्लोक 64 से 66 , तत्वज्ञान समझने के लिए श्लोक 67 से 69 और गहन चिंतन मनन के लिए श्लोक क्रमांक ७० से ७१ को पढ़ना ,समझकर मनन करना , सभी के लिए उचित है .
ॐ श्री कृष्णाय नमः
08अप्रैल/ ईएमएस