लेख

(विचार-मंथन) लॉकडाउन से परहेज (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

16/07/2020


कोरोना वायरस के लगातार सामने आते मामलों को लेकर देश में एक बार फिर लॉकडाउन लगने की अटकलों को सरकार ने विराम लगा दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय कने फिर से लॉकडाउन का ताला नहीं लगने की पुष्टि की है। अब राज्यों के साथ कंटेनमेंट जोन पर फोकस बढ़ाने का काम किया जा रहा है। वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय के ही अन्य अधिकारियों ने बताया कि कोरोना वायरस के बढ़ते मामले को लेकर माइक्रो लॉकडाउन का अधिकार राज्यों के पास है। अगर किसी राज्य के किसी एक निश्चित इलाके, गांव या शहर में केस तेजी से बढ़ते हैं तो वे उक्त इलाके में कुछ दिन का लॉकडाउन लगा सकते हैं। जैसे मध्यप्रदेश ने हर रविवार, उत्तर प्रदेश में शनिवार और रविवार की नीति पर काम शुरू किया है। महाराष्ट्र के पुणे में लॉकडाउन शुरू हुआ है। इसे माइक्रो लॉकडाउन का नाम दिया गया है। हालांकि लॉकडाउन के दुष्प्रभावों और पहले हुई गलतियों से सीख लेते हुए सख्ती से पालन भी जरूरी है। दरअसल, कोरोना वायरस को लेकर बीते 24 मार्च को जनता कफ्र्यू और उसी रात 12 बजे से 31 मई तक लॉकडाउन के अलग-अलग चरण देखने के बाद एक जून से देश अनलॉक की स्थिति में है। प्रवासी मजदूरों का पलायन, मास्क या शारीरिक दूरी पर ध्यान न देने की वजह से देश के कई हिस्सों में वायरस का फैलाव देखने को मिल चुका है। इसलिए अब केंद्र सरकार नीतिबद्ध तरीके से राज्यों पर निगाह रख रही है। ऐसे में देश को फिर से लॉक करने का कदम बेहद खतरनाक हो सकता है।
हालांकि, लॉकडाउन के बावजूद कोरोना संक्रमण को रोकने संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। बल्कि बढ़ी ही हैं। हर रोज संक्रमितों की संख्या बढ़ी हुई दर्ज हो रही है। हालांकि स्वस्थ होने वालों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है, पर संक्रमण की गति को रोक पाना फिलहाल कठिन जान पड़ता है। चूंकि इससे पार पाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकारों पर है, इसलिए जहां संक्रमण रुक नहीं पा रहा, वे स्वाभाविक ही बंदी को हटाने के पक्ष में नहीं थीं। अब भी कई शहरों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। हालांकि, लॉकडाउन पहले चरण की समाप्ति के बाद से ही दबाव बनने शुरू हो गए थे कि कड़ी शर्तों के साथ कल-कारखानों, व्यावसायिक गतिविधियों को खोलने की इजाजत मिलनी चाहिए, नहीं तो अर्थव्यवस्था बिल्कुल ध्वस्त हो जाएगी। लिहाज, तीसरे चरण में कुछ गतिविधियों को खोल दिया गया। चौथे चरण में ज्यादातर कारोबार को इजाजत दी गई, लेकिन लोग लापरवाही की पराकाष्ठा को पार कर कर रहे हैं। जैसे-जैसे गतिविधियां बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। यह ठीक है कि आर्थिक गतिविधियों को लंबे समय तक रोक कर नहीं रखा जा सकता। उन्हें खोलने की मांग स्वाभाविक थी और अब ऐसा हो भी रहा है, पर तमाम विशेषज्ञ जिस तरह दुनिया के कई दूसरे देशों का उदाहरण देते हुए कहते रहे हैं कि बगैर लॉकडाउन लागू किए भी कोरोना संक्रमण को रोकने के प्रयास किए जा सकते हैं, उसके भारत जैसे देश में कितना सफल हो सकने की उम्मीद की जा सकती है। जिन देशों ने लॉकडाउन का रास्ता नहीं अपनाया या बहुत कम समय के लिए लागू किया वहां की आबादी और स्वास्थ्य सुविधाओं से भारत की तुलना नहीं की जा सकती। फिर इसमें जनजागरूकता भी एक बड़ा पहलू है।
हमारे यहां मामूली छूट मिलते ही लोग जिस तरह सुरक्षित दूरी तक के नियमों को धता बताने से बाज नहीं आ रहे, वहां कड़े नियम-कायदों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। इस चुनौतीपूर्ण समय में सरकारों की जिम्मेदारियां पहले से कुछ बढ़ गई हैं। एक तरफ संक्रमितों की पहचान, जांच और समुचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का दबाव है, तो दूसरी तरफ नियम-कायदों का पालन कराने का। अभी तक जांच और इलाज आदि को लेकर शिकायतें दूर नहीं हो पाई हैं। बढ़ते मामलों के मद्देनजर इन सुविधाओं में बढ़ोतरी का भी भारी दबाव है।
16जुलाई/ईएमएस