लेख

(व्यंग्य) व्यंग्यापलेक्स ट्वेंटी (लेखक- विवेक रंजन श्रीवास्तव / ईएमएस)

21/06/2021

टीवी पर दवाओ , कारों मोबाईल आदि के विज्ञापन न चाहते हुये भी आपने भी जरूर देखे ही होंगे। आधे घंटे के एपीसोड में ही हर पांच सात मिनट में मुझे भी आपकी तरह ये विज्ञापन भुगतने पड़ते हैं। ओवर द काउंटर दवाओ का देश में बड़ा फैशन है। अपने यहां कोई भी छोटी बड़ी बीमारी हो , शुरू के कुछ दिन घरेलू नुस्खे फिर सेल्फ प्रिस्क्राइब्ड मेडिसिन और जब , तब भी रोग ठीक न हो तब कहीं पत्नी के मान मनौअल के बाद डाक्टर को दिखाने का नम्बर आता है।
एक मित्र को कोरोना का अंदेशा हुआ , उन्होंने व्हाट्सअप पर चल रहे नुस्खों को आजमाना चाहा , मुझे फोन कर सलाह मांगी की बंगलौर वाले मामा जी कोरोनिल लेने कह रहे हैं , जबकि दिल्ली से चाची जी डोलो , डाक्सी और टेबीफ्लू लेने कह रही हैं , क्या करूं। जब मैंने उन्हें सलाह दी कि डाक्टर से सही सलाह लीजीये , तो उन्हें मेरी यह सलाह जरा भी पसंद नही आई , उन्होने आश्चर्य से पूछा तो क्या डाक्टर को भी दिखाना पड़ेगा ? उन्होंने खांसते हुये कहा अरे मेरी आक्सीजन पूरी ९६ है। फिर डाक्टर को क्यों दिखाना भला ?
लगे हाथ उन्होने मेरा ज्ञान बढ़ाते हुये एक चुटकुला सुना दिया , "एक व्यक्ति प्रायः एक डाक्टर के पास जाता , बाकायदा फीस जमा कर। लाइन में लगकर उन्हें दिखाता , बाहर आता , सामने के मेडिकल स्टोर से दवायें खरीदता फिर उन्हें पास के कूड़ादान में फेंक चला जाता। जब उसे ऐसा करते बाजू वाले दूकानदार ने नोटिस किया तो उसने पूछा कि वे ऐसा क्यों करते हैं ? उत्तर मिला कि डाक्टर को तो इसलिये दिखाता हूं कि उन्हें भी जिंदा रहना है , दवा इसलिये खरीदता हूं क्योंकि दवा कंपनी , दूकानदार , एम आर सबके पेट पलते रहें। दवा कचरे में फेंक देता हूं क्योंकि मुझे भी जिंदा रहना है। मैं अनुलोम विलोम करता हूं , उसी से ठीक ठाक जिंदा हूं ही। वरना जितने टेस्ट हुये हैं मेरे खून , कफ , यूरिन वगैरह के उन पैरामीटर्स के अनुसार तो मुझे जिंदा रहने का कोई हक ही नही है। हम ठठा कर हंस पड़े।
तो हमारी इसी सेल्फ मेडिकेशन की कमजोरी को दवा कंपनियों ने पकड़ रखा है , कोरोना के लिये कोरोनिल , कब्जियत है तो पेट साफ करने के लिए "पेटसफा" दवा बाजार में है। यदि दस्त लग रहे हैं तो उसको रोकने के लिए ‘रोको’ नाम से दवा है। वह दौर गया, जब डाक्टर के पर्चे पर लिखे नुस्खे को उनके तकनीकी नामों के चलते केवल फार्मेसिस्ट ही समझ पाते थे। अब तो जापान के सूमो पहलवानों की कुश्ती से प्रेरित दर्द से लड़ने , सूमो नाम के टेबलेट , बाम , स्प्रे सब मेडिसिन स्टोर पर उपलब्ध है। खांसी के लिए साइलेंसर नाम की दवा है. ए टू जेड मल्टी विटामिन केप्सूल्स बाजार में है. एटीएम नाम से एंटीबायोटिक मिलती है. ताकत की दवा के नाम पर विज्ञापन के दम पर मीठी गोली बेबाक बिक जातीं है , और मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह होता है कि कईयों की रातें बड़ी शक्तिशाली बन भी जाती हैं।
दवायें ही क्यों अजब गजब नामों की कारें मसलन बेंटली बेंतायगा , स्कोडा लौरा , फरारी लाफरारी , किया सीड , दाइहात्सु नेकेड , हुण्डई लैंगडॉन्ग , रेनॉ ला , फोर्ड मस्टैंग वगैरह सड़को पर दौड़ती कारों के ही नाम हैं। प्रायः कार निर्माता विदेशी कंपनियां हैं शायद इसलिये इस तरह के टंग ट्विस्टर नाम समझे जा सकते हैं। कारो की सिरीज नम्बरो में होती है फरारी की हाइपरकारों में एफ ४०, एफ ५० , हुण्डई की आई १० , आई २० , वगैरह सीक्वल मजा देती हैं।
यही हाल मोबाईल के नामो का है। एप्पल सिरीज के फोन रखना स्टेटस है। नोकिया , सैमसंग , मोटोरोला , तोशिबा , जेलीबेरी वगैरह नामो के साथ भी कोई नम्बर , और अल्फाबेट जरूर जुड़ा मिलता है। मानो आर टी ओ का पंजियन हो। यदि यही फोन कोई भारतीय बना रहा होता तो संभवतः ऐसे संदर्भहीन नाम न होते। हम शायद "वार्ता" १०० सिरीज चलाते।
अजीब नामकरण के पीछे यह मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं कि ऐसे नाम लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं। तो मैं भी सोचता हूं कि अपने व्यंग्य लेखों के नाम व्यंग्यापलेक्स ट्वेंटी टाइप के रखूं। शायद जैसे वैभव लक्ष्मी माँ शीला से प्रसन्न हुई मुझसे भी संपादक जी और पाठक जी ही प्रसन्न हो जावें तो अपनी व्यंग्य की दूकान चल निकले।
21जून/ ईएमएस