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(विचार-मंथन) आजादी के मायने समझें हम (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

14/08/2019

हम भारत की आजादी की 72वीं सालगिरह मना रहे हैं। इन वर्षों में देश ने कई ऐसे पड़ाव पार किए हैं, जब कभी तो गर्व की अनुभूति हुई, तो कभी हमने शर्मिंदगी महसूस की। खट्टे-मीठे अनुभव लिए आजादी साल दर साल सफर तय कर रही है। बहरहाल, इन 72 वर्षों में नए आयामों को छूते हुए भारत ने एक महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान कायम की है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इन वर्षों की यात्रा में हमारे देश ने बहुत कुछ पाया है। आर्थिक उन्नति से लेकर वैज्ञानिक तरक्की तक के जो आयाम हमने रचे हैं, वे पूरी दुनिया का ध्यान हमारे देश की तरफ खींचते हैं। विकास की इतनी तेज रफ्तार से उभरता हुआ भारत कई देशों की आंखों का कांटा बन चुका है। अंतरिक्ष से लेकर जमीन तक, हम कहीं किसी से पीछे नहीं हैं। अब कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां भारतीयों को दोयम समझा जाता हो। मगर फिर भी एक टीस तो बरकरार है ही। हम भारतीय भारतीयता के उस मायने को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, जिसमें हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने सौहार्द्र, बंधुत्व की भावना और एकजुटता की कामना की थी। भारत दुनिया के उन देशों में से है, जिसने लंबे समय तक गुलामी की मार सही है। कड़े संघर्ष के बाद गुलामी की जंजीरों को तोड़कर मिली आजादी के मायने अपने आप में बेहद खास हैं।
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। आज भी इस दिन की खुशी व मायने हर खुशी से बढ़कर है। 15 अगस्त को 32 करोड़ लोगों ने आजादी की सुबह देखी थी। आज 70 वर्षों बाद सवा अरब भारतीय खुशी का इजहार करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद से अब तक देश ने बहुत कुछ पाया है। आर्थिक उन्नति से लेकर वैज्ञानिक तरक्की तक के जो आयाम हमने रचे हैं, अब वे पूरी दुनिया का ध्यान हमारी तरफ खींचते हैं। इस स्वतंत्रता दिवस पर हमारे सामने बस एक ही प्रश्न होना चाहिए कि क्या हम उसे देखकर संतुष्ट हो जाएं, जो अब तक हमने पाया है या कोई असंतोष का भाव भी हमारे मन में हो, ताकि हम उसे पाने की कोशिश करते रहें, जो हमें मिला नहीं है? भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहां आध्यात्मिक ऊंचाइयां छूने पर जोर दिया गया है, जबकि भौतिकता को नकारा गया है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने संतोष को 'परमसुख' बताया है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि 'शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्।' अर्थात, अगर हमें आध्यात्मिक उन्नति करना है तो शरीर को सशक्त बनाना ही होगा। वैसे तो इस उक्ति का प्रयोग योग के संदर्भ में किया जाता है, लेकिन इसका आयाम सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। इसका विस्तार भौतिक सुखों के अर्जन तक जाता है। अत: अध्यात्म के साथ-साथ हमें भौतिक सुख अर्जन पर भी जोर देना होगा और जब हम इस तथ्य को अपना आधार बना लेते हैं, तो इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं लगती कि हमारे अंदर भौतिक विकास को लेकर असंतोष होना चाहिए, ताकि हम अप्राप्य को पा सकें।
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को ध्यान से सुना जाने लगा है। अंग्रेज हमें साधु-सपेरों का देश कहते थे, पर अब दुनियाभर में भारत की प्रतिभा का लोहा माना जा रहा है। भारत एवं भारतीयों के बारे में दुनिया को अपनी धारणा बदलनी पड़ी है। इसके बाद भी बहुत कुछ ऐसा है, जो हमारे पास होना चाहिए था, पर नहीं है। बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली के मोर्चे पर हमें जूझना पड़ रहा है। अपराधों में इजाफा भी चौंकाने वाला है। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में बढ़ोतरी भी अब आजादी के मायनों को पीछे छोड़ती जा रही है। इधर, समाज का बड़ा वर्ग अपनी वह संवेदना भी खोता जा रहा है, जो एक समय भारतीयता की सबसे बड़ी पहचान थी। इसीलिए महानगरों से इस तरह की खबरें भी आए दिन की बात हो गई हैं कि घायल सड़क पर तड़पता रहा और उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। हमारे कुछ चिकित्सक ऐसे कैसे हो सकते हैं कि वे मरीजों की किडनियां चुराकर बेच दें या उन पर प्रतिबंधित दवाओं का परीक्षण करें, मगर ऐसा होता है? इन सभी अनहोनियों को देखकर जब हमारे मन में असंतोष पैदा होगा, तब ही हम इन्हें बदल पाएंगे। उम्मीद है कि इस बार आजादी के पर्व पर हम देश में व्याप्त सभी बुराइयों को दूर करने का संकल्प लेंगे।
सिद्धार्थ शंकर/14अगस्त/ईएमएस