लेख

(व्यंग्य) क्या भोपाल की सड़कें पांचाली(द्रौपदी ) हैं ? (डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

08/10/2019

जैसे आप किसी सेठ के पास उधारी का पैसा जमा करने जाओ तो उनकी दुकान का कोई भी कर्मचारी पैसा जमा कर लेता हैं और यदि कोई व्यक्ति उसी दूकान पर चंदा दान लेने जाए तो उसको बहुत परेशानी उठानी पड़ती हैं। अभी बड़े मालिक नहीं आये ,अभी बड़े भैय्या नहीं आये ,अभी जो इस काम को देखते हैं वो नहीं आएं। इस प्रकार दान देने या पैसा देने में सब आनाकानी करते हैं और यह स्वाभाविक हैं।
इसी प्रकार भोपाल शहर और जिले की सडकों का मालिक अच्छा हुआ कौरव नहीं रहे ,पांडव हैं जिनका पूरा अधिकार द्रोपदी पर हैं अन्यथा कौरवों के पास होता तो आदेश पारित कराने में सौवें नंबर पर द्रोपदी फुर्सत होती। यहाँ तो द्रोपदी पाण्ड़वों के साथ हैं तो वह जल्दी पांडवों से निपट लेती थी कारण उनमे भाई चारा था पर यहाँ की सडकों पर सबका अधिकार तो हैं पर कोई पक्का मालिक नहीं हैं जैसे कौरव।
कोई कहता नगर निगम ,कोई लोक निर्माण विभाग ,कोई सी पी ए कोई बी डी ए कोई केंद्रीय लोक निर्माण विभाग। इनके चककरों ये बेचारी सड़करुपी द्रोपदी का कोई निपटारा नहीं हो पा रहा हैं। और न हो सकता। यहाँ एक नारी ब्रह्मचारी होना चाहिए पर यहाँ पर सब चीरहरण करने में लगे हुए हैं। भोग के लिए द्रोपदी हैं पर उनकी सुरक्षा, संरक्षण के लिए सब अपने हाथ खींच लेते हैं की मेरी नहीं हैं नहीं हैं। जब गर्भवती हुई तब उनका डी एन ए टेस्ट में सबकी भागीदारी मिलती हैं। कारण निर्माण माल वही उपयोग होता हैं ,फिर कौन किसको पकड़ सकता हैं।
कुछ ऐसी व्यवस्था हो जैसे कृष्ण अकेले थे तो पूरी व्यवस्था पर उनका नियंत्रण रहता था पर पांडवों का चौदह वर्ष के अज्ञातवास पर सबने खूब हस्तिनापुर को लूटा और आनंद लिया.इस समय पांडवों के विभागों को द्रोपदी की चिंता नहीं हैं द्रोपदी के संरक्षण और सुरक्षा के लिए बजट आवंटन की चिंता हैं। एक सड़क पर कितने और कौन कौन प्रयोग करेगा ,बेचारे नकुल और सहदेव को तो कुछ सुख नहीं मिला कारण भीम और अर्जुन ही द्रोपदी का शोषण करते हैं। और युधिष्ठिर तो बस धर्मराज हैं उनको सब चारों भाई द्रोपदी से फुर्सत होते ,तो द्रोपदी को भेज देते थे.
सड़क निर्माण एक ऐसा विभाग हैं जिसमे आवर्ती खरच होगा ही हैं। कोई भी आजाये उसका स्थायी इलाज़ नहीं हो सकता हैं। आप कितनी भी ईमानदारी से काम करो बेईमानी तो मिल जाएँगी। कारण इसमें गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक सबको डुबकी लगाना हैं। इसलिए इस वैतरणी में सबको नहाना हैं। यानी सुविधा शुल्क का बटवारा करना होता हैं।
चलो बरसात ख़तम होने को हैं और सड़क निर्माण में अब धनवर्षा का पुण्य पर्व आने वाला हैं। अब कम से द्रोपदी को पूर्ण वस्त्र मिल जायेंगे।
सरकार के कुछ ऐसे पुत्र होते हैं जो खर्च करते हैं जैसे स्वास्थ्य.शिक्षा, सड़क ,पुलिस आदि और कुछ कमाऊ पूत होते हैं जैसे वाणिज्य कर ,आबकारी ,आदि। सरकार दोनों औलादों से परेशान रहती हैं। क्या करे सरकार भी इन विभागों से ही चलती हैं। जैसे कलेक्टर यानी वह जिले के सब विभागों से संग्रह करता हैं ,डायरेक्टरेट में सब काम डायरेक्ट होता हैं और मंत्रालय यानि सेक्रेटियेट में सब काम सेक्रेट होता हैं। इसीलिए इस जमाने में अब की काम गुप्त नहीं हैं। जो गुप्त होते हैं वे नौ माह के बाद उजागर हो जाता हैं.
वर्तमान में सड़क सरक गयी ,
और जहाँ देखो खुदा ही खुदा हैं
इधर भी खुदा हैं उधर भी खुदा हैं
इबादत के लिए खुदा जरूरी हैं।
08अक्टूबर/ईएमएस