लेख

(15 अगस्त पर विशेष) यही है हमारी स्वाधीनता? (लेखक-वेणीशंकर उपाध्याय)

14/08/2019


स्वाधीनता अपने आप में स्वतंत्रता है और स्वतंत्रता यानि स्वाधीनता के मर्म को वही समझ सकता है जो पराधीनता भोग चुका हो। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा भी है कि ‘‘पराधीन सपने सुख नाहीं’’ अर्थात सपने में भी पराधीन होना दुखद एहसास होता है। अंग्रेजों की दो सौ से अधिक कालों की पराधीनता से मुक्ति के लिए हमारे स्वनामधन्य देश प्रेमियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की आहूतियां दीं और ज्ञात-अज्ञात हजारों लोगों के त्याग, बलिदान और देश प्रेम के बलिदानी त्याग से हमें आजादी तो मिल गई। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। गणतंत्र की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हो गई । इसलिए भारतीय लोकतंत्र के इन दोनों अवसरों को राष्ट्रीय त्यौहार मानकर हम प्रमश: गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस के रूप में विगत 63 वर्षों से मनाते आ रहे हैं। गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति भवन के विजय चौक पर दिल्ली में राष्ट्रपति झंडारोहण करते हैं और स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में लाल किले की प्रचीर से प्रधानमंत्री देश के अवाम को प्रतिवर्ष संबोधित करते हैं। प्रत्येक प्रदेश की राजधानियों में मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रीगण ध्वजारोहण कर स्वाधीनता का पुण्य स्मरण करते हैं। बड़े महानगरों, नगरों तथा कस्बों से लेकर गांव-गांव तक स्कूली छात्र -छात्राएं अपने-अपने रंग-बिरंगे गणवेश में तिरंगा लेकर रैलियां निकालते हैं और किसी एक सार्वजनिक स्थान पर आयोजन संपन्न होता है।
मनुष्य एक विवेक और बुद्धि वाला प्राणी है। अत: स्वतंत्रता और स्वाधीनता का मर्म और मन्तव्य वह भलीभांति जानता है परन्तु पशु-पक्षी जानवर भी स्वाधीनता को जानते मानते तथा चाहते हैं। पालतु जानवरों और स्वाधीन जानवरों में अंतर साफ देखा जा सकता है। चिड़िया घर के जानवर और जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले जानवरों पशु -पक्षियों में यह अंतर साफ देखा जा सकता है। जब ढोर और पक्षी तक आजादी के पक्षधर हों तो भला इंसान इससे अलग कैसे हो सकता है। जानवरों की आजादी और इंसानों की आजादी में बुनियादी फर्प होता है। जंगल में जंगलराज होता है जिसे जंगल कानून कहा जाता है। इस कानून में जो सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। वह कुछ भी कर सकता है और वही राजा कहलाता है। ताकतवर कमजोर पर शासन करता है। जंगल के सबसे ताकतवर हिंसक पशु को शेर कहा जाता है।
लोकतंत्र में कानून का राज चलता है यहां ताकत से शासन नहीं अपितु लोकमत के आधार पर सरकारों का अस्तित्व बनता- बिगड़ता है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनकर राज्यों में विधानसभाओं तथा देश में लोकसभा के सदस्यों का चुनाव करती है। फिर चुनकर हमारे प्रतिनिधि गण बहुमत के आधार पर सत्ता और विपक्ष का निर्धारण करते हैं। लोकतंत्र न्याय सिद्धांत पर काम करता है। उसने जन प्रतिनिधियों को लोकसेवक माना जाता है। जनता के द्वारा चुनकर जनप्रतिनिधि गण सरकार के माध्यम से लोकहित और लोक कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से जन कल्याणकारी योजनाएं बनाते हैं और कार्यपालिका के माध्यम से इनका प्रियान्वयन किया जाता है। विपक्ष का काम सरकार की कमियों को उजागर करना होता है। संचार माध्यमों का काम विधायिका, कार्यपालिका को आइना दिखाने का काम करती है। न्याय पालिका का काम होता है देश प्रदेश में कानून का राज्य स्थापित रहे। उपरोव्त तथा आदर्श व्याख्या होती है। लोकतंत्र की परन्तु आज भारत के लोकतंत्र में जो कुछ भी हो रहा है वह इतना भयावह और शर्मनाक है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।
नेता, अफसर और अपराधी मिलकर इस व्यवस्था को घुन की तरह खोखला कर चुके हैं। केंद्र की सरकार राज्यों को और राज्यों की सरकार केंद्रीय सरकार को दोषी मानने के भ्रमजाल में उलझी हुई है। आम आदमी की बुनियादी जरुरतों पर किसी का ध्यान नहीं है। घोटालों पर घोटाले और घपले हो रहे हैं। संसद में रोज जांच कमेटियों का गठन हो रहा है परन्तु समझ ज्यों की त्यों है। चुने हुए हमारे नेता कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता का मत अब सर्वोपरि होता है। जब जनता हमें चुन लेती है तब हमें साफ- पाक माने जाना चाहिए। कोई यह नहीं कहता कि जनता को बेवकूफ बनाने को आप अपनी होशियारी क्यों मान रहे हैं। सौ से दो सौ करोड़ जो चुनाव में खर्च करेगा आखिर वह मूलधन को कम से कम वापस चाहेगा ही। देश के शीर्ष में बैठे हमारे हुक्मरानों के जानबूझकर ऐसी वाड़ लगा दी है, कि साधारण या बुद्धिमान कभी भी इन सदनों में पहुंच ही नहीं सकता।
देश की आजादी की लड़ाई रही हो या फिर स्व. जयप्रकाश नारायण की समग्र प्रांति सभी में हमारी नौजवान पीढ़ी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर मिशाल कायम की है। आज लोकतंत्र जिस ऊंची सुरंग में जा चुका है वहां से ज्यों का त्यों बाहर आना तो बमुश्किल-सा प्रतीत होता है। धन बली, बाहुबली तथा सफेदपोशों ने पूरे लोकतंत्र को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है। कानून मजाक बन गया है। व्यवस्था पंगु हो गई है लाचार और कमजोर और अधिक कमजोर होता जा रहा है परन्तु जिन्हें लोकतंत्र की नव्ज पकड़ ली वह दिन दूना रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। ऐसे में भला कौन रोकेगा। इन लोगों को। दस सालों के लिए हरिजन आदिवासियों के आरक्षण को 63 साल हो चुके हैं और यह लगातार बढ़ता ही जा रही है। अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण को जोड़ दें तो पचहत्तर फीसदी नौकरियों में आरक्षण हो चुका है। हर वर्ग अपनी जाति के आधार पर प्रमाण पत्र तो बनवाने में हिचकता नहीं है परन्तु नेताओं को जातिगत जनगणना में घोर आपत्ति है। जब तक अपनी बाकायदा गिनती नहीं होगी। आपको आरक्षण किस आधार पर दिया जाएगा। आप सुविधाओं आरक्षण के आधार पर चाहते हैं तो जातिवाद गिनती के भला क्यों परहेज कर रहे हैं। जनगणना से लेकर जनभावना सभी दूषित हो चुकी है। देश और राष्ट्रीयता की किसी को चिंता नहीं है चिंता है तो केवल स्वयं के आर्थिक साम्राज्य की ओर सभी इसी प्रम में लगे हुए हैं। प्रदेश राज्यों में तो लोकायुव्तों की स्थापना कर चुकी है परन्तु 63 वर्षों में हम आज तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर सके हैं। भारत में उच्च सदन राज्यसभा में जिस तरह पूंजीपति और धन्नासेठ धनबल से चुनकर आने लगे हैं। लोकसभा में जिस तरह आधे से अधिक सांसद को तो इन सदनों को सफल आफ लार्ड्स घोषित कर देना चाहिए। पूंजीपतियों, पूर्व नौकरशाहों तथा बहुबलियों पर सरकारें हमेशा मेहरबान रहती हैं। क्या यही आम आदमी की सरकारें है।
चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल आदि शहीदों की आत्मायें यदि कहीं होंगी तो रो रही होंगी। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा तो मिला हमारे रिजर्व बैंक के नोटों को उनकी छवि भी अंकित हुई, परन्तु अब महात्मा गांधी वाले वोट देश में भ्रष्टाचार में इस्तेमाल हो रहे हैं। न्याय पालिका कार्यपालिका और विधायिका तीनों महात्मा गांधी के तीन बंदर समान आचरण कर रहे हैं कि वे आम आदमी को न तो सुनेंगे न देखेंगे न ही उनके हितों के लिए कुछ बोलेंगे। महाभारत में धृतराष्ट्र की पत्नि गंधारी समान हमारी सरकारों ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है। जनता का दु:शासन चीरहरण कर रहा है। और सत्ता पक्ष में बैठे लोग चीरहरण देखकर खुश हो रहे हैं विपक्ष भी द्रोणाचार्य की तरह मौन है। अब जनता को एक ही भरोसा है कि कोई देवलोक से आएगा और उनका उद्धार करेगा।
आजादी की लड़ाई से लेकर 1977 के समग्र प्रांति को आंदोलनों में हमारी तरुणाई ने ही बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और आंदोलनों को सफल बनाया। आज की युवा पीढ़ी अराजकता, दु:शासन तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कसने तभी कुछ हो सकता। आज की हमारी नई पीढ़ी नक्सलवाद, माओवाद, अलगाववाद तथा आतंकवाद के खिलाफ भी जब आंदोलन और जागरुकता लाने आंदोलन का श्रीगणेश कर सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इस देश की अस्मिता और लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगने वाला है इसे कोई रोक नहीं सकता।
ईएमएस फीचर 14 अगस्त