लेख

(विचार-मंथन) मेरे मुल्क के असली मालिकों को ज्वलंत मुद्दों से भटकाने की कवायद (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

22/03/2019


लोकसभा चुनाव 2019 के चरणबद्ध मतदान की तारीखें जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं, देश का राजनीतिक माहौल गरमाता चला जा रहा है। एक तरफ कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां हैं जो मौजूदा मोदी सरकार के कामकाज का हिसाब लेने की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और उसके अनुवांशिक संगठन हैं जो लगातार कह रहे हैं कि मोदी सरकार से हिसाब लेने का अधिकार किसी को नहीं है। हद तो तब हो जाती है जबकि केंद्र सरकार और उनकी योजनाओं पर सवाल खड़े करने वाले लोगों को देशद्रोही ठहराते हुए भीड़ द्वारा निशाने पर ले लिया जाता है। ऐसे में किसी और के पास 56 इंच का सीना बचा नहीं रह जाता कि वह पिछले आम चुनाव में जनता से किए गए वादों, उनके पूरा होने या नहीं होने के बारे में भी बात कर सके। इसका एक कारण यह भी है कि सत्ता में आने से पहले जो वादे किए गए थे दरअसल उन्हें सत्ता के सिंहासन में बैठते ही चुनावी जुमले जो करार दिए गए। इसके बाद तो वाकई सवाल ही नहीं उठता कि चुनावी जुमलों को वादे करार दिए जाएं और याद दिलाए जाएं, क्योंकि विपक्ष तो यही कह रहा है कि अब तो मतदाताओं को खुद भी लगने लगा है कि इस सरकार ने कोई गलती नहीं की बल्कि सबसे बड़ी गलती तो उससे खुद ही इस सरकार को बनाने में हुई है। इसलिए मशहूर शायर मुज्जफर रज़्मी का यह शेर याद हो आता है कि 'ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।' यह इसलिए भी क्योंकि वादे तो पूरे हुए नहीं उल्टा आधार अनिवार्यता के साथ ही साथ आनन-फानन में नोटबंदी और बिना पूर्व तैयारी के जीएसटी भी लागू कर दी गई। इसने देश के तमाम लोगों की जिंदगी को हैरान-परेशान करने का काम किया। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने यह कहते हुए नोटबंदी की घोषणा की थी कि इससे कालाधन एकत्र करने वालों को जेल में भेजा जा सकेगा और यह नोटबंदी सीमापार से आतंकवादियों को की जाने वाली फंडिंग और आतंकियों की कमर तोड़कर रख देगी। अब जबकि देखने वालों ने देखा कि नोटबंदी से गरीब परेशान होता रहा, क्योंकि उनकी मेहनत की कमाई की बचत जो आड़े दिनों में काम आने वाली होती है को भी बैंकों में जमा करवा दिया गया और फिर उसकी वापसी के लिए बैंकों के बाहर कतारें लगवा दी गईं। इस बीच अनेक लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ गया। इस पर बेशर्मी के साथ यह भी कह दिया गया कि देश में कुछ अच्छा हो रहा है तो इस तरह का कष्ट तो जनता को उठाना ही पड़ता है। सवाल यही है कि क्या पूरा दु:ख-दर्द और कष्ट सहने की जिम्मेदारी महज जनता की होती है, क्या सरकारें मनमर्जी करते हुए विदेश-यात्राएं करने और मौज-मस्ती में मगन रहने के लिए ही होती हैं? सरकार ने तो दावा किया था कि आतंकवादियों की नोटबंदी से कमर टूट गई है, फिर जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने इस कदर आतंक क्योंकर बरपाया हुआ है? सैन्य कैंपों को निशाना बनाते आतंकी आखिर क्या संदेश देते हुए नजर आते हैं? आखिर हमारे देश के सुरक्षाकर्मी जो ड्यूटी से छुट्टी पर घाटी स्थित अपने घर को आते हैं उन्हें वहीं गोलियों से कैसे भून दिया जाता है? इससे भी इस सरकार की आंखें खुलती नहीं दिखाई देतीं, इसलिए आतंकी पुलवामा हमला करने में कामयाब हो जाते हैं, जिसमें हमारे जवान शहीद होते हैं और इसे लेकर भी राजनीति शुरु हो जाती है। आखिर हम राजनीति करने के चक्कर में और कितना गिरते जाएंगे? ये ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर विपक्ष को ही नहीं देश की समझदार और जिम्मेदार कही जाने वाली जनता को भी चाहिए, लेकिन क्या किया जाए क्योंकि भीड़ ने सभी के मुंह को बंद करने का जिम्मा जो ले रखा है। इसलिए यहां सवाल उठते हैं वहां भीड़ के हमले शुरु हो जाते हैं और इसी के साथ देश की समस्याओं से आमजन का ध्यान भटकाने का काम भी बदस्तूर शुरु हो जाता है। इसलिए इस चुनाव को भी मुद्दाविहीन करने के लिए भाजपा कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों और उनके नेताओं पर हमलावर होती दिखती है। ये दल सोशल मीडिया के सहारे एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए दांव-पेंच चले जा रहे हैं। राफेल सौदे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया तो उसके जवाब में भाजपा ने ‘मैं भी चौकीदार’ कैंपेन शुरू कर दिया। अब यदि दम है तो सभी को चोर बताकर बताओ, क्योंकि इसमें भी भाजपा ने सभी की बराबर की हिस्सेदारी तय करने जैसा काम कर दिखाया है। बहरहाल चोर न सही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के अनेक नेताओं ने अपने नाम के आगे 'चौकीदार' जोड़कर जतलाने की कोशिश तो की ही है कि झूठ को सच बनाने की मशीन उनसे बेहतर किसी और के पास हो ही नहीं सकती है। इसी के साथ उच्च शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाएं, कर्ज में डूबा किसान, अंतिम सांसें गिनते उद्योगधंधे और सिर उठाए आतंकवाद जैसी जटिल समस्याओं से मुल्क के असली मालिकों का ध्यान भटकाने की भी कवायद शुरु हो गई है। इससे सजग और सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि आमजन को मतदान के जरिए सिद्ध करना होगा कि वह रटंत तोता नहीं है, जिसे बहेलिया रुपी नेता आएगा, लच्छेदार बातों का जाल बिछाएगा और मतदाता को अपने जाल में बारंबार फांस कर अपना उल्लू सीधा कर लेगा। इसलिए देश के तमाम मतदाताओं को सजग रहने और किसी भी तरह के लोभ या लालच के साथ ही साथ डरकर फैसला करने की आवश्यकता नहीं है। मतदान अधिकार के साथ करें, ताकि देश को एक अच्छी सरकार मिल सके।
22 मार्च/ईएमएस