लेख

आखिर सरकार चाहती क्या है.....? (लेखक-ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस )

10/06/2021

...और अब अभिव्यक्ति की आजादी खतरें में...?
क्या अब आजाद भारत में ’अभिव्यक्ति की आजादी‘ पर भी खतरा मंडरा रहा है? यह एक अहम्् सवाल है, जो देश के हर बुद्धिजीवी के दिल-दिमाग में हलचल मचा रहा है। हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा उठाए गए कुछ कदमों ने इस गंभीर आशंका को जन्म दिया है। इसके पीछे कोरोना वॉयरस जैसा ही खतरनाक एक ’टूलकिट‘ नामक वॉयरस पैदा हुआ है, जिसने इस आशंका को जन्म दिया, इसके बाद सरकार द्वारा अपने पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों पर लगाए गए उस सख्त प्रतिबंध ने इस आशंका को पुख्ता कर दिया, जिसमें पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों पर अपने सरकारी अनुभव लिखने और उन्हें प्रकाशित करवाने को अपराध की श्रेणी प्रदान कर दी गई है, कहा गया है कि जो मौजूदा व पूर्व नौकरशाह ऐसा अपराध करेंगे उन पर सख्त कार्यवाही के साथ उन्हें आर्थिक रूप से दण्डित किया जाएगा।
पिछले दिनों एक ’टूलकिट‘ का मामला राजनीतिक रूप से काफी गर्माया था, जिसमें आरोप था कि प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम कर उनकी लोकप्रियता कम करने के प्रयास किये जा रहे है, इस मामले पर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सम्बित पात्रा विशेष रूप से प्रकाश में आए थे, पात्रा के साथ ही भाजपा के ग्यारह वरिष्ठ नेताओं ने भी अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की थी। पात्रा सहित इन सभी प्रतिक्रियाओं को ट्वीटर ने ”मैनीपुलेटेड मीडिया“ बताया था, ट्वीटर की इस टिप्पणी के बाद केन्द्र सरकार ने ट्वीटर के साथ ’व्हॉट्सअप‘ व फैसबुक आदि सोशल मीडियाओं के लिए नए सख्त नियम लागू कर दिये, जिस पर इन सभी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर केन्द्र के नियम मानने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। इस पर सरकार भी सख्त हो गई और यह विवाद अभी भी जारी है।
इसके बाद सरकार ने सिविल सेवकों के लिए पूर्व से चले आ रहे पेंशन व वेतन नियमों में अचानक संशोधन करते हुए नया कानून जोड़ दिया कि केन्द्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम-1972 में संशोधन कर डीओपीटी में एक क्लॉज जोड़ा गया जिसमें सेवा निवृत्ति पर आरटीआई अधिनियम की दूसरी अनुसूची में शामिल संगठनों के अधीन काम करने वालों को संगठन प्रमुख की पूर्व मंजूरी के बिना सरकार या संगठन के डोमन से सम्बंधित कुछ भी प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह नियम केन्द्र के ईटेलिजेंस ब्यूरों, रिसर्च एण्ड एनेलेसिस विंग (रॉ) राजस्व खूफिया निदेशालय, सेंट्रल इकॉनामिक्स इंटीलीजेंस ब्यूरों, पूवर्तन निदेशालय, नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरों आदि के साथ दो दर्जन केन्द्र के संगठन व कार्यालय है, जिनके नौकरशाहों पर यह नियम लागू किया गया है, कहा गया है कि इन संगठनों के सेवानिवृत्त नौकरशाहों को भी कुछ भी लिखने और प्रकाशित करवाने के पहले सरकार से अनुमति लेना होगी, वर्ना इनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी तथा आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया जाएगा।
यहाँ यह भी उल्लेखानीय है कि अब तक कई पूर्व नौकरशाहों की किताबों पर राजनीतिक विवाद पैदा हो चुका है। इन पुस्तकों में प्रधानमंत्री से लेकर अन्य बड़े राजनेताओं के कामकाज तथा उनकी कार्य प्रणाली पर तीखी टिप्पणियां की गई। सबसे अधिक चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ”एक्सीडेंटल प्राईम मिनिस्टर“ पर हुई, जिसने देश के राजनीतिक क्षेत्र में तुफान खड़ा कर दिया था और जिस पर एक फिल्म भी बन गई थी। भाजपा के केन्द्रीय मंत्रियों व दिग्गज नेताओं को भी यह आंशका हो गई थी कि केन्द्र के अहम्् पदों पर काम कर चुके तथा मौजूदा उच्च नौकरशाह भी अपनी सेवानिवृत्ति के बाद चर्चित किताबें लिखकर इस कार्य को अपनी आमदनी का प्रमुख स्त्रोत बनाना चाहते है, इसी आशंका के चलते सरकार ने ये सख्त निर्देश जारी किये है। अब पता चला है कि कुछ पूर्व नौकरशाह सरकार द्वारा लागू किए गए इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे है। वहीं, सोशल मीडिया की साईट्स ट्वीटर, व्हॉट्सअप तथा फैसबुक आदि ने भी सरकार द्वारा जारी प्रतिबंधात्मक आदेश मानने से इंकार कर दिया है। अभी अभी गूगल ने तो साफ कर दिया है कि सरकार आईटी कानून गूगल सर्च इंजन पर लागू नहीं होते, अन्य मीडिया संगठनों ने भी इस मामले में सख्त रूख अपना लिया है।
जहाँ तक इस मामले में न्यायपालिका के रूख का सवाल है वह तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले दिनों दिये गए उस फैसले से स्पष्ट हो जाता है, जिसमें माननीय न्यायालय ने कहा था कि ”मीडिया की ओर से की गई सरकार की आलोचना देशद्रोह की सीमा में नही आती“। अब यदि नौकरशाहों की अभिव्यक्ति पर लगाए गए इन प्रतिबंधें को लेकर नौकरशाह न्यायालय की शरण में जाते है तो न्यायालय का रूख क्या होगा यह स्पष्ट है?
इन दिनों मीडिया के विभिन्न स्त्रोतों द्वारा केन्द्र सरकार की कि जा रही तीखी आलोचना व प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को लेकर उठाए जा रहे सवालों से परेशान होकर सरकार छटपटा रही है।
10जून/ ईएमएस