लेख

अपनी धरती को हम स्वर्ग बनायें (लेखक-प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘/ईएमएस)

14/01/2020

‘‘सुख तभी है कि जीवन में जब प्यार है। ‘‘

आदमी की बड़ाई सुनी गई बहुत, बुद्धि -बल का भी उसकी बड़ा शोर है
बातें करता है छूने को आकाश की, आचरण में मगर कमजोर है।

बुद्ध, ईसा ने, गांधी ने, आ वह किया देख जिसको कोई देखता सा बने
किन्तु संसार में आदमी के रहे हाथ फिर भी अभी खून से ही सने ।

आज दुनियाँ में विज्ञान, भौतिक प्रगति की चमक और चकाचैंध दिखती बड़ी
किन्तु मन की समझ सोच सुधरी है कम, द्वेश और जलन हैं राह रोके खड़ी।

एक तरफ बुद्धि तो छू रही गगन, आदमियत में मगर है अभी भी कमी
व्यर्थ की छोटी बातों का अभिमान हैं, क्रोध ह,ै प्रेम की नहीं दिखती नमी।

होशियारी बढ़ी है बहस की बड़ी, सुखद संवेदना तो गई खो कहीं
धन कमाने की है लालसा अनकही, मेल-ममता की पर भावना है नहीं ।

स्वार्थ की सिद्धि की कामना नित रही, किन्तु सहयोग का भाव गुम हो गया
औरों के परिश्रम की न परवाह कोई, सोच अपने ही सुख का सदा ही नया ।

बिना सहयोग और स्नेह के जिन्दगी लगती नीरस दुखी जैसे एक भार है
सरस लगता है घर बार, संसार सब, सुख तभी हैं कि जीवन में जब प्यार है।

14जनवरी/ईएमएस