लेख

(विचार-मंथन) नेपाल सही-गलत देखे (सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

25/09/2020


पिछले कुछ समय से नेपाल ने भारत के प्रति जो रुख अख्तियार किया हुआ है, वह हैरान करने वाला है। हाल में सीमा विवाद के मसले पर जो तनातनी चल रही थी, उसे हल करने व संबंधों को सहज बनाने की जरूरत थी। इसके उलट नेपाल की ओर से जैसी प्रतिक्रिया आ रही है, वह निराशाजनक है। दरअसल, नेपाल का यह रवैया भारत के साथ अब तक के उन पारंपरिक संबंधों और उसमें गाढ़ेपन के उलट है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच केवल सीमा का ही औपचारिक विभाजन देखा जाता रहा है। सांस्कृतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच सहज संबंध रहे हैं और भौगोलिक अवस्थिति की वजह से नेपाल कई मामलों में भारत पर निर्भर भी रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में जब से वहां चीन का दखल बढ़ा है, उसके बाद नेपाल के रुख में तेजी से बदलाव आया है। भारत की ओर से बिना किसी उकसावे के नेपाल ने जिस तरह के कदम उठाए हैं, वे आपसी रिश्तों में सुधार की ओर जाते नहीं दिख रहे। बल्कि हाल में देश के नक्शे को लेकर नेपाल की जिस तरह की हरकत सामने आई, वह सीधे-सीधे भारत के संप्रभु क्षेत्र में दखल की कोशिश है और संबंधों में सहजता की उम्मीद कम हो जाती है।
बावजूद इसके भारत ने ऐसी कोई असंयमित प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे स्थिति और बिगड़े। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि नेपाल आखिर किन वजहों से एक अघोषित जिद के तहत ऐसे कदम उठा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच दूरी बढऩे के आसार नजर आ रहे हैं। भारत और नेपाल के बीच सामरिक रिश्तों का बड़ा आधार दोनों देशों के बीच 1950 में हुई शांति-मैत्री संधि है, जिसके अनुसार तिब्बत, नेपाल और भूटान के मध्य दर्रों पर भारत-नेपाली सैनिक संयुक्त रूप से नियुक्त किए जाने की बात है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि इस संधि के अंतर्गत ही काठमांडू में एक भारतीय सैनिक मिशन स्थापित किया गया था, जिसका कार्य नेपाली सेना को प्रशिक्षण देना था। लेकिन अब नेपाली सेना भारत को चुनौती देने का साहस करती हुई दिखाई दे रही है। भारत के नेपाल के साथ विशिष्ट संबंध हैं और भारत की नीति उसे बरकरार रखने की है। तराई, जंगल, वन और नदियां भौगोलिक रूप से भारत और नेपाल को इस प्रकार जोड़ती हैं कि कई स्थानों पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि यह किस देश में है।
यही कारण है कि दोनों देशों के नागरिक बेरोकटोक एक दूसरे के यहां आते-जाते रहे हैं। रोटी-बेटी के संबंध हैं, दोनों देश एक दूसरे से सांस्कृतिक, भाषायी और आर्थिक संबंधों में गुंथे हुए हैं। भारत में बहने वाली अधिकांश नदियों का उदगम स्थल नेपाल में है, इसलिए नेपाल जल संसाधन व प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार भारत और नेपाल एक दूसरे पर निर्भर हैं। भारत लगातार नेपाल के विकास में अहम योगदान देता रहा है। कुछ साल पहले नेपाल में आए भूकंप के बाद उसके पुनर्निर्माण के लिए भारत ने बड़ी सहायता की थी, पर नेपाल की वामपंथी सरकार ने इसके विपरीत परिणाम दिए। फिर भारत द्वारा चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना-वन बेल्ट वन रोड का व्यापक विरोध नजरअंदाज करके नेपाल परियोजना में शामिल हो गया। अब नेपाल भारत पर से निर्भरता कम करना चाहता है और इसके पीछे उसकी स्पष्ट नीति रही कि चीन नेपाल में सड़कों, रेलमार्गों, बंदरगाहों और औद्योगिक क्षेत्रों के निर्माण में भारी निवेश करेगा। भारत ने नेपाल की बेहतरी के लिए दरवाजे खुले रखे हैं। अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसे भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से नेपाल में वामपंथी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रभाव बढऩे से असर रिश्तों पर पड़ा है।
25सितम्बर/ईएमएस