लेख

कहो तो कह दूँ । "फील्ड" की पोस्टिंग "दम" से नहीं बल्कि "जुगाड़" से मिलती हैं हुजूरे आला (लेखक - चैतन्य भट्ट/ईएमएस)

16/05/2022

ग्वालियर के पास गुना में काले हिरन के शिकारियों ने तीन पुलिस कर्मियों को गोली से भून दिया ,जाहिर है प्रदेश के मुखिया को गुस्सा आना था सुबह सुबह अफसरों की मीटिंग बुला ली, तमाम बड़े अफसर इकठ्ठे हो गए, मुख्यमंत्री ने साफ़ साफ़ कह दिया कि जिस अफसर में दम हो वो ही फील्ड पर तैनात रहे और जो दम दार नहीं है वो फील्ड छोड़ दे l मुख्यमंत्री जी बेहद गुस्से में थे, बोले भृष्टाचार के मामले में "जीरो टॉलरेंस" चाहिए जो अफसर काम नहीं करते उन्हें हटा दें और इसी चक्कर में ग्वालियर के आईजी "अनिल शर्मा" को मुख्यमंत्री ने नाप दिया l भले ही मुख्यमंत्री ये कह रहे हैं कि जिनमें दम और बहादुरी हो वे फील्ड पर तैनात हैं लेकिन क्या प्रदेश के "नवजात शिशु" से लेकर "अस्सी बरस के बुजुर्ग" को ये नहीं मालूम की फील्ड में पोस्टिंग कैसे होती है जिसके सर पर किसी नेता का हाथ होता है वो मलाईदार पोस्ट पर आ जाता है और जो बेचारा अपने काम के दम पर अपनी ड्यूटी बजाता है वो "लूपलाइन" में पड़े पड़े अपनी जूतियाँ घिसता घिसता रिटायर हो जाता है अब अपने आई जी ग्वालियर शर्मा जी को ही देख लो, उनके बदले किसी दूसरे अफसर की पोस्टिंग ग्वालियर आईजी पद पर हुई थी, भाई साहब चार्ज लेने भी चले गए थे लेकिन शर्मा जी का जुगाड़ कोई कमजोर तो था नहीं सो जिस अफसर को भेजा गया था उसे वापस बुलाकर शर्मा जी को वंहा बैठा दिया गया, अब जिसके ऊपर एक बड़े नेता का हाथ हो उसका कौन कुछ बिगाड़ सकता है सो वे भी मजे से नौकरी कर रहे थे, सुबह छह बजे पुलिस कर्मियों की मौत की सूचना हुजूर को मिल गयी थी लेकिन वे घटना स्थल पर पंहुचे एक बजे, अब मुख्यमंत्री को गुस्सा आना स्वाभविक है सो तत्काल उन्हें हटा दिया गया l मुख्यमंत्री भी जानते होंगे की फील्ड में पोस्टिंग कैसे होती है जो नेता जिस अफसर को चाहता है उसे पोस्ट करवा लेता है अब जिसकी कृपा दृष्टि से अफसर को "मलाईदार पोस्टिंग" मिली हो वो किसी से क्यों डरेगा, जब " सैंया भये कोतवाल तो डर कहे का" l मुख्यमंत्री जी आप कितनी ही कड़ाई बरत लो, कितनी ही चेतावनी दे दो ये अफसर शाही अपनी गति से चलती है और चलती रहेगी, इसे बदलना हर किसी के बस की बात नहीं है नेताओ का क्या है वे तो आते जाते रहते हैं iपर ये तो "तीस पेंतीस साल का पट्टा" लिखवा कर लाये है इनका कौन क्या बिगाड़ लेगा lभृष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की बात आपने भले ही कही हो लेकिन किसी दिन आम आदमी बन कर "खसरे" में अपना नाम चढ़वा कर दिखा दो, जमीन का "नामांतरण" करवा कर दिखा दो यदि बिना चढ़ावे के इस काम में आप सफलता पा लो तो समझ लेना की "राम राज्य" आ गया है लेकिन अपने को मालूम है की ये कठिन ही नहीं बल्कि नामुमकिन है l मामाजी चेतवानी से कुछ नहीं होने वाला ऐसा एक्शन लो जिससे अफसरशाही को पता लग सके कि वे किसी "सिंह" के राज में नौकरी कर रहे हैं

नगद दो भैया

अमेडिका में एक नया ट्रेंड शुरू हो गया है जितनी भी शदियां हो रही है उनके शादी के कार्ड में आजकल ये इबारत लिखी जाने लगी है "आइये आका स्वागत है भोजन कीजिये मिठाई भी खाइये और गिफ्ट की बजाय नगद पैसे दीजिये तो आपका आभार होगा" एक हिसाब से ये तरीका ठीक है गिफ्ट के नाम पर आजकल आदमी शादी में देता ही क्या है एक "अटेची" दे देगा ज्यादा करीबी हुआ तो "सूटकेस" दे देता है वरना कूलकेस, कैसरोल, कटलरी सेट, डिनर सेट, लेमन सेट,, ओटीजी, मिक्सी, प्रेस, बेडशीट चीजे तो आम हो गयी हैं अब जब शादी के बाद गिफ्ट के पैकेट खोले जाते है तो जाते है तो पता लगता है की बीस डिनर सेट, अस्सी लेमन सेट, पचास कटलरी सेट, सौ बैड शीट, पचास कैसरोल आ गये हैं हाल ये होता है कि इनका करे भी तो क्या करे आदमीं सो बेचारा एक कोने में उन्हें रख कर राह तकता है कि जैसे ही किसी शादी का कार्ड आये सो इनमें से एक सेट उठाकर नाम की पर्ची बदल कर उन्हें टिका दें यानि ये सारे सेट इधर से उधर होते रहते हैं है खुलते कभी नहींl पैक के पैक इस घर से उस घर उस घर और न कहो उस घर से फिर इस घर लौटकर आ जाएँ इसलिए अमेरिका वालों ने सही किया साफ़ साफ़ कह दिया कि भैया ये प्लास्टिक और कांच की चीजों से हमें कोई लेना देना नहीं है आप तो नगद नारायण दो ताकि हमारे काम आये, हमें रिसेप्शन वाले का, घोड़ीवाले का, होटल वाले का, बेंड वाले का, सबका पेमेंट करना है नगद दोगे तो हमारे सर का बोझा हल्का हो जाएगा lअपना तो मानना है कि अपने देश में भी ये ही सिस्टम हो जाना चाहिए बड़े बडे रंग बिरंगे कागज में लिपटे बड़े बड़े गिफ्ट पैक दिखते तो ऊपर से भारी भरकम हैं लेकिन जब खोलो तो उनमें प्लास्टिक के आधा दर्जन ग्लास निकलते हैं इसलिए बेहतर यही है कि नगढ़ दो झंझट ख़तम न पैक करने की चिकल्लस न लेने वाले को कोई परेशानी l
चिंतन शिविर
कांग्रेस ने अपना चिंतन शिविर निबटा दिया, उदयपुर की वादियों में तीन दिन तक कांग्रेस के लोगों ने भयानक चिन्तन किया कि उनकी पार्टी की गत ऐसी क्यों हुई है, लोगों ने अपने आने सुझाव भी दिए ही होंगे, बताता जा रहा है कि अब एक परिवार से एक ही व्यक्ति को चुनाव का टिकिट दिया जायेगा इसके अलावा जिसने पार्टी की पांच साल तक सेवा की हो उसे टिकिट की लाइन में लगने का हक़ होगा लेकिन इन तमाम शर्तों से "गाँधी परिवार" को छूट दी गयी है बीजेपी वाले सवाल उठा रहे है और मजा भी ले रहे है कि ये शर्तें गाँधी परिवार पर लागू क्यों नहीं होती तो बीजेपी वालों को ये मालूम नहीं है कि कांग्रेस का वजूद यदि बचा है तो वो गांधी परिवार के बल पर ही बचा हुआ है जिस दिन गाँधी परिवार पार्टी से पल्ला झाड़ लेगा उस दिन कांग्रेस भूतकाल की बात हो जाएगी और इसके पीछे कारण भी तो है हर नेता अपने आप को बड़ा नेता मानता है, जिसकी जो मर्जी हो बोल देता है सिर्फ गाँधी परिवार ही है जिसकी बात सब सुनते है इसलिए इस पर न तो तंज कसो और ना ही प्रश्न उठाओ "कांग्रेस यानि गांधी परिवार और गांधी परिवार यानि कांग्रेस"
सुपर हिट ऑफ़ द वीक
श्रीमान जी ने श्रीमती जी से कहा
"पुरुष के जीवन में दो समय ऐसे होते है जब वो स्त्री को समझ नहीं पाता"
"कौन से" श्रीमती जी ने पूछा
"शादी से पहले और शादी के बाद" श्रीमान जी ने उत्तर दिया

.../ 16 मई 2022