लेख

परिवार में नारी का आर्थिक योगदान ! (लेखक --डॉक्टर अरविन्द पी जैन)

10/07/2019

हर सिक्के के दो पहलु होते हैं। हर पहलु अपने आप में महत्वपूर्ण होता हैं या हैं।पहले के समय एक कमाता था और पूरा परिवार पलता था. समय के साथ परिवर्तन हुआ।शिक्षा का विकास हुआ ,लैंगिक भेदभाव ख़तम हुआ और सबको बराबरी का अवसर मिलना शुरू हुआ ,प्रगति के कारण महगाई बढ़ी।स्कूली शिक्षा और पढाई महंगी होने लगी ,सुविधा भोगी होने से आधुनिक सामान की खरीदी और फिर मकान कार ,बैंक बैलेंस विदेश यात्रा के कारण आमदनी कम पड़ने से महिलाओं को भी नौकरी की जरुरत आन पडी।इसके बाद स्वाबलंबन का भी भान होने लगा। आत्मनिर्भर होने से आर्थिक सम्पन्नता आयी जरूर पर --------
सभ्यता के प्रारम्भ में जब परिवार की अवधारणा साकार होने लगी और लोग खेती या पशुपालन करने लगे तब परिवार में श्रम-विभाजन होने लगा. धीरे-धीरे कालान्तर में परिवार के पुरुष सिर्फ कमाने का कार्य करने लगे जबकि खाना बनाने से लेकर घर सम्हालने का दायित्व महिलायें उठाने लगीं। धीरे-धीरे परिवार की स्थिति ऐसी हो गयी कि अगर परिवार की कोई महिला सदस्य बीमार पड़ जाय तो उसका कार्य करना दूसरों के लिये विशेषकर उस परिवार के पुरुष सदस्य के लिये कठिन हो जाता था. श्रम-विभाजन के मजबूत होने से परिवार भी मजबूत और खुशहाल होने लगा. इसी के विपरीत जिस परिवार में श्रम-विभाजन कमजोर रहा या परिवार का कोई सदस्य अपना दायित्व का निर्वहन ठीक से नहीं किया तो उस परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी. इसी तरह बड़ा परिवार होने पर संयुक्त परिवार का निर्माण हुआ. महिलाओं के काम करने के कारण हजारों साल तक परिवार कलहविहीन रहा; समाज में शान्ति रही.
दुनिया में सबसे ज्यादा लड़ाइयाँ लगभग डेढ़ सहस्त्राब्दी से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक हुई हैं. इन लड़ाइयों में बहुत ज्यादा पुरुषों के मारे जाने से बहुत दे देशों या समाजों में पुरुषों की घोर कमी हो गयी. इस स्थिति ने कहीं-कहीं पुरुषों में बहुविवाह प्रथा का जन्म दिया। लड़कियों और महिलाओं में शिक्षा और हुनर की कमी ने हमारे समाज को पुरुष प्रधान समाज बना दिया। अब के समय में युद्ध का स्थान मोटर दुर्घटनाओं ने ले लिया है. इन मोटर दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में कमाने वाले पुरुष मारे जा रहे हैं.
फिर संयुक्त परिवारों के टूटने से एकल परिवारों का दौर आया. अभी भी कुछ संयुक्त परिवार अपने संक्रमण काल से गुजर रहे हैं. आर्थिक मजबूती भी परिवार में महिलाओं से काम छीनने लगा. परिवार में गेहूं पिसाई, मसाला पिसाई आदि तो इतिहास की बात होने लगी. सप्ताह में एक-दो दिन घर से बाहर खाना फैशन होते जा रहा है. फ़ास्ट फ़ूड का भी प्रचलन घर और बाहर दोनों जगह बढ़ा. इन सब से अब घर में महिलाओं के लिये कोई ज्यादा काम ही नहीं बचा. कहा जाता है कि श्रम बहुत महान टॉनिक होता हैं अब टॉनिक ही नहीं रहा तो इनके अब कुछ दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं. अब ऐसे परिवार के भोजन स्वादिष्ट तो हो गये लेकिन पहले जैसा स्वास्थ्यवर्धक नहीं रहे. इससे तरह तरह की बीमारियां बढ़ने लगी. मधुमेह तो अब महामारी का रूप लेने को उतारू है. जब परिवार में महिलाओं का आर्थिक योगदान कम होने लगा तो पारिवारिक कलह भी बढ़ने लगे. बढ़ती हुई दहेज़ मृत्यु/प्रताड़ना और तलाक के मामलों के आंकड़े इनके सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण हैं.
अब बिजली की उपलब्धता बढ़ने और इन्टरनेट के तीव्र विस्तार से स्वचालन और मशीनीकरण का युग आ रहा है यानि इनके माध्यम से घर बैठे लड़कियां और महिलायें भी अब कुछ काम करने लगेंगी और अपने परिवार में अपना आर्थिक योगदान बढ़ायेंगी। यह निम्न प्रकार से हो सकता है.
(1) अब इन्टरनेट के माध्यम से अच्छी सलाह प्राप्त करना और अपने पूर्व के ज्ञान में वृद्धि करना आसान होते जा रहा है. लोग कहते हैं कि इन्टनेट से लोग विशेषकर युवा पीढ़ी गुमराह हो रही है. यह बात सही है कि इन्टरनेट पर बिगड़ने वाली सामग्री ज्ञान-वर्द्धन वाली सामग्री से कई गुना ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है. यानि अब इन्टरनेट उपयोग करने वालों पर निर्भर करता है कि वे अपने लिये बिगड़ने का रास्ता चुनते हैं या अपना भविष्य संवारने का. अभिभावक इस सम्बन्ध में अपने बच्चों का उचित मार्गदर्शन बेहतर तरीके से कर सकते हैं.
(2) उषा कम्पनी किसानों को सिम के माध्यम से इन्टरनेट द्वारा संचालित घरेलु और खेतों की सिंचाई दोनों हेतु मोटर पम्प की विक्री बढ़ा रही है. इसे लड़कियां और महिलायें भी आसानी से घर बैठे अपने परिवार के कृषि कार्य में अपना योगदान कर सकती हैं. भविष्य में अन्य कई तरह के स्वचालित उपकरण आने वाले हैं जिनका सञ्चालन लड़कियां और महिलायें भी अपनी पूरी दक्षता के साथ कर पायेंगी।
(3) टेलीमेडिसिन, टेलीप्रिंटिंग और डिस्टैंट लर्निंग आदि जल्दी ही साकार होने लगेंगे। इनसे लड़कियां और महिलायें भी घर बैठे ही कुछ कमाकर अपने परिवार में अपना आर्थिक योगदान देने में सफल होंगी।
हमारे लोकप्रिय प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदीजी की "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" योजना तेजी से आगे बढ़ रही है. जब लड़कियां और महिलायें अपने परिवार में अपना आर्थिक योगदान देंगी तो निश्चित रूप से "कार्य" नामक उक्त टौनिक पुनः घर में आने लगेगा, परिवार के सभी सदस्यों का स्वास्थ्य में सुधार होगा और तब पारिवारिक कलह अपने आप कम होने लगेंगे। इन सब से परिवार में खुशहाली भी बढ़ेगी और दहेज़ मृत्यु/प्रताड़ना तथा तलाक़ के मामले कम होते जायेंगे। इस तरह लड़कियों और महिलाओं के द्वारा अपने परिवार में अपना आर्थिक योगदान देने से हमारा समाज और फिर राष्ट्र उन्नत और पहले से अधिक मजबूत होगा।
इसके साथ जितना समय परिवार को देना चाहिए उतना समय नहीं दे पा रही हैं इसके साथ ही पालना घर संस्कृति के कारण बच्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ने से भविष्य सुखद नहीं रहता।न बच्चों का और न परिवार का ,आर्थिक सम्पन्नता के साथ संस्कारों का स्थान कभी कभी और कहीं कहीं शून्य होने लगता हैं।
परिवार सम्हल गया तो सब सम्हल गया
संतान यदि हुई संस्कार विहीन तब
कमाया गया धन किस काम का
और किसके लिए कमा रहे
अपने लिए या संतानों के लिए
कितना कष्ट उठाकर धन कमाते है
और मौज़ और कोई करे !
ईएमएस/10 जुलाई19