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(विचार-मंथन) चुनावी सभाओं में नेताओं से संयम बरतने की दरकार (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

11/01/2019

आमचुनाव 2019 का समय करीब आता देख तमाम राजनीतिक पार्टियों के कद्दावर नेताओं ने मुखर होना शुरु कर दिया है। इसके साथ ही एक-दूसरे की टांग खींचना और विवादित बयान देने का सिलसिला भी शुरु हो गया है। यहां चुनावी अखाड़े में बयानवाज नेता ताल ठोंक रहे हैं तो वहीं सत्ता पक्ष कहीं से भी अपने-आप को कमजोर होने नहीं देना चाहता है। यही वजह है कि ऐसे तमाम नेताओं को वह अपनी ही शैली में जवाब देता दिख रहा है। मजेदार बात यह है कि अब तो इस खेल में सरकार की मातहत एजेंसियां भी इस तरह से मुस्तैद नजर आ रही हैं मानों किसी ने कुछ कहा नहीं कि उसकी जुबान ही खींच ली जाएगी। यह अलग बात है कि सत्ता पक्ष के नेता पहले से यह सब करते आ रहे हैं और आगे भी वही करते देखे जाएंगे, जिसके लिए विपक्षी नेताओं की खिंचाई हो रही है। ऐसे तमाम नेताओं को जुबान पर लगाम कसने की हिदायतें दी जा रही हैं। मतलब साफ है कि आमचुनाव करीब आ रहा है अत: विपक्ष सत्ता पक्ष के कार्यों और नीतियों के खिलाफ मुखर होगा ही होगा, जबकि सत्ताधारी पार्टी इससे होने वाले डेमेज कंट्रोल के लिए भी वो सब करेगी, जिसकी कि सामान्यतौर पर उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। एक-दूसरे पर झूठ बोलने और राजनीतिक तौर पर बदनाम करने के आरोप भी बेहद सफाई के साथ लगाए जाते हैं। इससे नुक्सान यह होता है कि जो बात सच कही जाती है और जिससे सीधा देशहित व आमजन का हित जुड़ा होता है, उसे भी चुनावी जुमले समझ संज्ञान में नहीं लिया जाता है। दरअसल सत्तापक्ष नहीं चाहेगा कि उसके किए गए गढ्ढों पर भी कोई नजर दौड़ाए या फिर उनकी कमजोरियों को कोई गिनाए। इसलिए विपक्ष पर सदा हमले होते रहते हैं, जबकि पहले सत्ता में रह चुकी पार्टियां बीती बात बिसार दे पर यकीन करती और मतदाताओं को इसी के तहत फैसला लेने के लिए उनका मन बनाती नजर आ जाती हैं। फिलहाल बात यहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के उस बयान की हो रही है जिसे माध्यम बनाकर राष्ट्रीय महिला अयोग ने उन्हें नोटिस जारी कर पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करने का काम किया है! कहा जा रहा है कि राहुल को इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था, जिससे पुरुष प्रधान वाली मानसिकता उजागर होती हो। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष ने एक सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोलते हुए कह दिया था कि वो खुद तो छुप गए और महिला को आगे कर दिया। अब यदि कहा जाए तो इस बयान को अलग-अलग तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा सकता है, जिससे यह आभासित होने लगे कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की नहीं बल्कि महिलाओं के सम्मान पर कुठाराघात किया है। यही राजनीति का अहम पहलू भी है। दरअसल राहुल कहना चाहते थे कि लोकसभा चल रही है और अनेक लोकहित व देशहित के मामले उठाए जा रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जी के पास समय ही नहीं रहा कि वो आकर जवाब देते या चर्चा में शामिल होते। अब चूंकि मामला राफेल सौदे से जुड़ा हुआ था और सदन में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण लगातार विरोधियों को शानदार तरीके से जवाब दे रहीं थीं, अत: यही समझा गया कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने उन्हें आगे करके खुद जवाबतलबी से अपने आपको बचा लिया है। विरोधी कह सकते हैं कि यहां यह भी विचारणीय है कि यदि इस बात को लेकर किसी के मान-सम्मान को ठेस पहुंचती है तो फिर उन बयानों के लिए क्या कहेंगे जो कि सीधे-सीधे किसी को ठग, चोर, लुटेरे या फिर पप्पू साबित करते हैं। बहरहाल सवाल यही है कि राजस्थान की रैली में राहुल ने यह क्यों कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे डर गए हैं और अपने बचाव के लिए महिला मंत्री को आगे कर दिया है। अब चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसा कहा इसलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बयान की निंदा की और वहीं दूसरी तरफ महिला आयोग ने भी नोटिस जारी कर दिया। इसलिए यह विषय गंभीर हो गया है। आयोग ने इसे पुरुषवादी मानसिकता की उपज बताया है, तभी यह कहना उचित होगा कि नारी का सम्मान होना चाहिए और हर स्थिति में होना चाहिए। क्योंकि हम जैसे तमाम बुद्धिजीवी महिला को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं, ताकि समाज का विकास दिन दूना और रात चौगुना हो सके। देश हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके और किसी के सामने कातर नजरों से देखने और अपनी बारी आने का इंतजार भी न करना पड़े। इसके लिए जरुरी हो गया है कि संसद और विधानमंडलों में भी नारी को बराबरी का हक मिले और हो सके तो जल्द से जल्द महिला आरक्षण बहाली पर भी फैसला लिया जाए, जिसकी कि मांग कांग्रेस खासतौर पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी करती रही हैं। अब वह समय आ गया है जबकि महिलाओं को अपने फैसले खुद करने के लिए आगे लाया जाना चाहिए और आर्थिक तौर पर उन्हें और सबल होने की आवश्यक्ता है। व्यवसाय ही नहीं बल्कि शासन-प्रशासन में भी महिलाओं को सम्मान के साथ बराबरी का दर्जा तो होना ही चाहिए। इसलिए जब राहुल के बयान पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं तो उम्मीद बंधी कि अब आगे कोई भी किसी भी प्रकार से किसी भी नेता पर व्यक्तिगत हमले नहीं करेगा। वैसे भी चुनावी सभाओं में होश खोते नेताओं का लंबा इतिहास है, जिस पर रोक तो लगनी ही चाहिए, लेकिन तब यह एक पक्षीय नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी के लिए एक ही तरह की कानूनी कार्रवाई की भी दरकार रहेगी।
11जनवरी/ईएमएस