लेख

कैसे बंद हो कर्ज का खाता; परेशन अन्नदाता.....? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता)

05/12/2018

देश की राजनीति के चक्रव्यूह में फंसा किसान इन दिनों काफी परेशान है, एक तरफ वह देश के राजनीतिक दलों की कर्जमाफी की घोषणाओं से परेशान है तो दूसरी ओर नोटबंदी के कारण न वह समय पर बीज खरीद पाया और न खाद्य, अब ऐसी स्थिति में वह जाए तो कहाँ? इसलिए देश के किसानों को दिल्ली आकर प्रदर्शन के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद हमारे अन्नदाता सरकार की उपेक्षा के शिकार ही रहे। अन्नदाता स्वयं अपने परिवार को अन्न मुहैय्या नहीं करा पा रहे है, कर्ज माफी की भी उम्मीद में उन्होंने बैंकों को कर्ज की किश्ते देना भी बंद कर दिया, इससे सहकारी बैंकों को आर्थिक संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है, अब आखिर वह अपना रोना किसके सामने रोय? ऐसे में उनके सामने आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, इसीलिए देश में इनकी आत्महत्याओं का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।
देश मंे दो साल पहले की गई नोटबंदी का हमारे अन्नदाताओं पर क्या असर हुआ? इसकी जांच व सर्वेक्षण रिपोर्ट अब कृषि मंत्रालय की संसदीय समिति ने सरकार को सौंपी है, जिसमें कहा गया है कि ‘‘नोटबंदी’’ ने देश के 26 करोड़ किसानों की कमर तोड़कर रख दी, ये किसान नोटबंदी के कारण न खाद्य खरीद पाए और न ही बीज। ये किसान नगदी पर निर्भर रहने वाले किसान है, नोटबंदी के कारण बाजार में नगदी का अकाल पड़ गया था, इसके कारण खेती-किसानी का पूरा ढांचा ही ध्वस्त हो गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नोटबंदी के समय ने भी काफी दिक्कतें पैदा की, खरीफ बैचने और रवी बोने के वक्त की गई नोटबंदी किसानों को काफी भारी पड़ी। फिर रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नोटबंदी का सीधा पहला असर फसलों और सब्जियों की कीमतों पर पड़ा, जिनकी कीमतें अचानक काफी नीचे स्तर पर आ गई।
पिछले एक साल से सत्तारूढ़ तथा प्रतिपक्षी दलों द्वारा जो किसान कर्जमाफी के वादें किए जा रहे है, उसके कारण कर्जदार किसानों ने कर्ज माफी की आस में बैंकों के कर्ज की किश्तें चुकाना बंद कर दिया जिसके कारण सहकारी बैंकों की नब्बे फीसदी तक वसूली गिर गई। खास करके जिन क्षेत्रों में किसान आंदोलन तेजी पर रहे, उन क्षेत्रों में तो कर्ज वसूली शत-प्रतिशत तक गिर गई। विशेष रूप से जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे है, उन राज्यों में तो कर्ज वसूली लगभग शून्य पर पहुंच गई है, क्योंकि चुनाव प्रचार व अपने घोषणा-पत्रों में राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने और सरकार बनने पर दस दिन में कर्ज माफी की घोषणाएँ की है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि एक साल पहले कर्ज माफी के राजनीतिक वादों के पहले अकेले मध्यप्रदेश में किसान हर महीनें तीन हजार करोड़ की कर्ज राशि चुकाते आ रहे थे, किंतु कर्ज माफी की राजनीतिक घोषणाओं के बाद छः महीने में ही कर्ज चुकाने का तीन हजार करोड़ रूपए प्रतिमाह का आंकड़ा घटकर 260 करोड़ हो गया, अब अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो वादे के अनुसार सरकार को शपथ के दस दिन के अंदर अठारह हजार करोड़ रूपयों की किसान कर्ज माफी हेतु व्यवस्था करनी पड़ेगी जबकि स्वयं प्रदेश सरकार पर पहले से ही डेढ़ लाख से भी अधिक करोड़ का कर्ज पहले से ही बाकी है। इस प्रकार मध्यप्रदेश में नई सरकार के सामने वित्तीय प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौति होगी। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने कर्ज वसूली बढ़ाने की गरज से ऋण समाधान योजना लागू की थी, इसमें सत्रह लाख डिफाॅल्टर किसानों का ब्याज माफ होना था, इन किसानों पर छः हजार करोड़ का कर्ज और करीब ढ़ाई हजार करोड़ का ब्याज बकाया है, इसके साथ ही पच्चीस हजार करोड़ पुराना कर्ज बाकी है, इस तरह प्रदेश में यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो उसे दस दिन में कर्ज माफी का वादा निभाने के लिए कम से कम पचास हजार करोड़ रूपए की जरूरत होगी अर्थात् स्वयं प्रदेश सरकार पचास हजार करोड़ का और कर्ज लेगी और कर्ज राशि बढ़कर दो लाख करोड़ हो जाएगी, तब प्रदेश की आर्थिक स्थिति आज के पाकिस्तान से भी बदत्तर हो जाएगी और फिर इतनी मशक्कत के बाद भी क्या हमारा अन्नदाता अपनी आर्थिक चिंताओं से मुक्त हो पाएगा और प्रदेश में किसानों की आत्म हत्याऐं थम पाएगी?
कुल मिलाकर हमारे अन्नदाता को राजनीति के चक्रव्यूह में इस कदर फंसा दिया गया है कि वह उससे बाहर निकल नहीं पा रहा और फिर उसके सामने जान देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता।
05 दिसंबर2018