लेख

असम का सन्देश अब पूरे देश के लिए एन.आर.सी. जरूरी......? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

09/09/2019

अब धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा है कि भारत में जो जनसंख्या विस्फोट की समस्या पैदा हुई है, वह जन्मदर बढ़ने से नहीं बल्कि अनचाहे अतिथियों (घुसपैठियों) के कारण भी पैदा हुई है, अभी-अभी असम को लेकर आई एन.आर.सी. रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब असम जैसे छोटे से राज्य में करीब बीस लाख घुसपैठियें हो सकते है, तो फिर पूरे देश के शेष उन्तीस राज्यों में कितने होंगे? इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि केन्द्र सरकार अब व्यक्तिशः सर्वेक्षण का ज्यादा से ज्यादा अमला बढ़ाकर अगले एक-दो साल में पूरे देश के राज्यों का सर्वेक्षण करवाले जिससे कि घुसपैठियों को अगले लोकसभा चुनाव से पूर्व भारत से बाहर भगया जा सके, क्योंकि असम की इस रिपोर्ट ने यह सनसनी फैला दी है कि जब असम जैसे छोटे से राज्य में घुसपैठ की यह स्थिति है तो फिर पश्चिम बंगाल, बिहार तथा अन्य सीमावर्ती राज्यों की क्या स्थिति होगी? दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने तो दिल्ली राज्य में सबसे पहले सर्वेक्षण कराकर एनआरसी रिपोर्ट तैयार करवाने की मांगकर डाली, क्योंकि दिल्ली घुसपैठियें रोहिंग्याओं से सर्वाधिक पीड़ित है।
इसी संदर्भ मंे सरकार का वह फैसला एकदम स्वागत योग्य है, जिसमें कहा जा रहा है कि अगले एक साल अर्थात् सितम्बर 2020 तक सरकार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार करवा रही है, जिसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अपना पंजीकरण कराना आवश्यक घोषित होगा। इसके लिए पूरे देश में घर-घर जाकर भी जानकारियां एकत्र की जाएगी। असम से आई एनआरसी रिपोर्ट ने अकेले सरकार को ही नहीं, देश के सभी जागरूक बुद्धिजीवियों को चैका दिया है। इसलिए प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति जी ने भी पूरे देश का सर्वेक्षण करवाने की आवश्यकता महसूस की।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि असम में जो जनसंख्या सर्वेक्षण कराया गया, उसमें साढ़े चाल साल में 1288 करोड रूपया खर्च हुआ और यह कार्य 62 हजार कर्मियों ने पूरा किया, रिपोर्ट में पाया गया कि अकेले असम में ही 19 लाख छः हजार 567 ऐसे लोग रह रहे है जो वहां के नागरिक नही है। अब यह तो होता है कि इतने बड़े सर्वेक्षण में कुछ गड़बड़ियां भी हो सकती है, जैसे भारत के पूर्व राष्ट्रपति और कुछ सेना से सेवानिवृत्त लोगों को घुसपैठिया बता दिया गया, तो उनके लिए सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल किसी को भी गैर असमी समझ वहां से बाहर नहीं निकाला जा रहा है, ऐसे लोगों से अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है, वे चाहे तो अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में भी जा सकते है, किंतु ऐसे लोग दो या तीन फीसदी से ज्यादा नहीं होंगे, इतने कम जायज नागरिकों के लिए सभी उन्नीस लाख को तो माफ नहीं किया जा सकता। यद्यपि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा को असम में काफी नाराजी झेलनी पड़ रही है, क्योंकि लोगों में इसे लेकर काफी असंतोष व नाराजी है। किंतु भाजपा भी जानती है कि राष्ट्रहित में जो काम किए जाते है, इन्हें लेकर देशव्यापी खुशी नाराजी तो चलती रहती है।
भारत में हर दस साल में एक बार जनगणना करवाई जाती है और पिछली तीन जनगणनाओं में आश्चर्यजनक रूप से जनसंख्या में वृद्धि नजर आई, पहले यह माना गया कि यह जन्मदर बढ़ने से वृृद्धि हुई होगी किंतु जब घुसपैठियों के प्रकरण सामने आए तब पता चला कि जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण जन्मदर वृद्धि नहीं बल्कि पड़ौसी देशों से आने वाले घुसपैठियें है, जो भारत के सीमावर्ती इलाकों मंे अपने स्थायी डेरे स्थापित कर रहे है, पिछले कुछ ही वर्षों में करोड़ो बंग्लादेशियों व रोहिंग्याओं ने असम व पश्चिम बंगाल ही नहीं दिल्ली तक में अपने स्थायी डेरे डाल दिए है और अब ये भारत की नागरिकता प्राप्त करने की कोशिशों में जुटे है, लाखों ने तो अपने आधार कार्ड तक तैयार करवा लिए है और वहां की मतदाता सूची में अपने नाम दर्ज करवा लिये है।
जब इस तरह की काफी संख्या में शिकायतें केन्द्र सरकार को मिलने लगी तब केन्द्र की मौजूदा सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ‘‘घुसपैठियें खोजों अभियान’’ शुरू किया, जिसकी चैकाने वाली रिपोर्ट अभी सामने आई है।
अब असम की इस रिपोर्ट ने सरकार को पूरे देश के राज्यों में ऐसा सर्वेक्षण कराकर राष्ट्रीय स्तर पर ‘‘नागरिक पंजी’’ तैयार करने को मजबूर कर दिया और इसी कारण सरकार ने अपनी पहल प्रारंभ भी कर दी। सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है।
09सितम्बर/ईएमएस