लेख

मतदाताओं के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ की घड़ी (लेखक - ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

13/03/2019

आजाद भारत के अस्सी करोड़ मतदाताओं के लिए फिर एक बार ‘अग्निपरीक्षा’ से अपना ‘भाग्यविधाता’ चुनने की घड़ी आ गई है, हर पांच साल में देश का मतदाता बड़ी आकांक्षाओं और सुखद भविष्य की कामना से चुनावी महायज्ञ में अपने वोट की आहूति डालता है, इस आशा व उम्मीद से कि अगले पांच वर्षों में देश विकास की बुलंदियों तक पहुंच जाएगा और देश का हर मतदाता अपने आपको सुखी-सम्पन्न और खुश मानेगा, किंतु पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद आम मतदाता की स्थिति उस मयूर जैसी जो जाती है, जो काली घटाएँ आसमान में देखकर रातभर नाचता है और सुबह अपने पैरों की ओर देखकर आँसू बहाता है। आज देश के आम मतदाता की स्थिति उसी मोर जैसी है, चुनाव प्रचार के दौरान आधुनिक भाग्यविधाता (राजनेता) जनता को सुखी सम्पन्न होने के सतरंगी सपने दिखाते है और चुनाव अर्थात् अपनी गरज निकलने के बाद ये ही वादे ‘‘जुमलों’’ के रूप में परिवर्तित हो जाते है और आम वोटर की उम्मीद हवा-हवाई हो जाती है। क्या किया जाए? लोकतंत्र का अब यही चलन बन गया, साढ़े चार साल आम वोटर अपने आधुनिक ‘भाग्यविधाता’ के चरणस्पर्श करता है और सिर्फ छः महीनें ‘भाग्यविधाता’ को अपनी गरज पूरी करने के लिए आम मतदाता की याद आती है और वह चरण छूने की मुद्रा में आ जाता है।
यद्यपि पिछले सत्तर सालों से हमारे देश में चलन यही चल रहा है, किंतु अब इस चलन में कुछ बदलाव परिलक्षित होने लगा है, क्योंकि इक्कीसवीं सदी का मतदाता अब थोड़ा जागरूक हो रहा है, ज्यादा नहीं पिछले पांच सालों में उसके साथ जो जो गुजरा वह आज भी उसके दिल-दिमाग में अंकित है और वह अब उसका प्रतिशोध लेने का साहस जुटा रहा है, पिछले पांच साल पहले आज के सत्तारूढ़ दल व उसके नेताओं ने जो सतरंगी सपने दिखाए थे, वह उन्हें भुला नही है, और उनमें से कितने सपने साकार हो पाए यह भी उसे अच्छी तरह याद है, इसलिए वह इसका प्रतिशोध लेने से चूकेगा नहीं और उसका गिन-गिन कर बदला लेगा, शायद इसी आशंका से सत्ताधारी दल व उसके नेता कुछ डरे-सहमे से दिखाई दे रहे है और वे अपने संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व अनुशंगी हिन्दूवादी संगठनों के मूंह ताकने को मजबूर हो गए है, यद्यपि पिछले पांच सालों में अपने सपने पूरे नहीं होने से हिन्दूवादी संगठन भी काफी निराश व नाराज है, किंतु विकल्प के अभाव में वे अधूरे मन से उन्ही वादा खिलाफी करने वाले दल व नेता का साथ देने को मजबूर है, ठीक यही स्थिति संघ की भी है।
शायद इसी राजनीतिक परिदृष्य और स्थिति के कारण इस बार चुनावों के बाद देश में ‘त्रिशंकु’ सरकार बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है, किंतु यहां यह भी उल्लेखनीय है कि देश का आम मतदाता भी दिग्भ्रमित है, वह अपने अन्र्तमन से मौजूदा सरकार को पुनः सत्ता नही सौंपना चाहता, किंतु उसकी मुख्य परेशानी यह है कि उसके सामने जो प्रतिपक्षी दलों का विकल्प है, वह भी इस काबिल नहीं है कि उसे आंखें बंद करके समर्थन दे दिया जाए, क्योंकि एक तो ये दल संगठित व एक सूत्र में बंधे दिखाई नहीं दे रहे है, वहीं प्रतिपक्ष में कोई ऐसा सक्षम व विश्वसनीय नेता नजर नहीं आ रहा, जिसे प्रधानमंत्री पद का दायित्व सौंपा जाए, इस चुनाव से पहले के चुनावों में यह दुविधा की स्थिति नहीं थी, विकल्प के रूप में कांग्रेस थी, जिसके प्रधानमंत्री ने एक दशक तक सकुशल राजपाट चलाया था, किंतु राजनीति के आकाश पर चमके एक नए ‘धूमकेतु’ (नरेन्द्र भाई मोदी) ने देश के वोटरों में उम्मीद की किरण जगाई और वे सत्ता पर काबिज हो गए, अब इस बार यही धूमकेतु स्वयं अपनी चमक खोकर सेना की चमक को चमका कर अपनी स्वार्थ सिद्धी करने को उतारू है और पूरा देश यह सब भली प्रकार सोच समझ रहा है।
इस प्रकार कुल मिलाकर इस बार होने वाले लोकसभा चुनाव पिछले चुनावों से कई दृष्टि से अलग है, पिछले सत्तर सालों में देश का आम मतदाता के सामने कभी भी ऐसी दुविधा की स्थिति पैदा नहीं हुई, जितनी की आज है, और इसमें कोई दो राय नहीं कि योग्य विकल्प के अभाव में मतदाता ‘नोटा’ की ओर आकर्षित होकर उसका बटन दबाने को मजबूर हो सकते है, और यह आश्चर्य भी हो सकता है कि राजनीतिक प्रत्याशियों से ज्यादा वोट ‘नोटा’ को प्राप्त हो? इसलिए कई दुविधाजनक परिस्थितियों के कारण ही राजनीतितक दल व देश का आम मतदाता स्वयं ‘त्रिशंकु’ बनाने को मजबूर हो गया है।
13मार्च/ईएमएस