लेख

(कविता) आदमी आदमी को करे प्यार जो (प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘‘विदग्ध‘‘)

01/12/2018

आदमी आदमी को करे प्यार जो, तो धरा स्वर्ग हो मनुज भगवान हो
घुल रहा पर हवा में जहर इस तरह , भूल बैठा मनुज धर्म ईमान को
राह पर चल सके विश्व यह इसलिये , दृष्टि को दीौप्ति दो प्रीति को प्राण दो

रोज दुनियां बदलती चली जा रही, और बदलता चला जा रहा आदमी
आदमी तो बढ़े जा रहे सब तरफ , किन्तु होती चली आदमियत कीकमी
आदमी आदमी बन सके इसलिये , ज्ञान के दीप को नेह का दान दो

हर जगह भर रही गंध बारूद की , नाच हिंसा का चलता खुला हर गली
देती बढ़ती सुनाई बमो की धमक , सीधी दुनियां बिगड़ हो रही मनचली
द्वार विश्वास के खुल सकें इसलिये , मन को सद्भाव दो सच की पहचान दो

फैलती दिख रही नई चमक और दमक , फूटती सी दिखती सुनहरी किरण
बढ़ रहा साथ ही किंतु भटकाव भी , प्रदूषण घुटन से भरा सारा वातावरण
जिन्दगी जिन्दगी जी सके इसलिये स्वार्थ को त्याग दो नीति को मान दो

प्यास इतनी बढ़ी है अचानक कि सब चाहते सारी गंगा पे अधिकार हो
भूख ऐसी कि मन चाहता है यही हिमालय से बड़ा खुद का भण्डार हो
जी सकें साथ हिल मिल सभी इसलिये मन को संतोष दो त्रस्त हो त्राण दो

देश है ये महावीर का बुद्ध का, त्याग तप का जहां पै रहा मान है
बाह्य भौतिक सुखो से अधिक आंतरिक शांति आनंद का नित रहा ध्यान है
रह सकें चैन से सब सदा इसलिये त्याग अभिमान दो त्याग अज्ञान दो

आदमी के ही हाथों में दुनियां है ये आदमी के ही हाथो में है उसका कल
जैसा चाहे बने औ बनाये इसे स्वर्ग सा सुख सदन या नरक सा विकल
आने वालो और कल की खुशी के लिये युग को मुस्कान का मधुर वरदान दो!
01दिसम्बर/ईएमएस