लेख

(विचार-मंथन) ...मानों फिर कानों में गुंजायमान हुई हिंदी-चीनी भाई-भाई की सदा! (डॉ हिदायत अहमद खान/ईएमएस)

15/03/2019

पुलवामा में हुए आतंकी हमले से बहुत पहले ही यूएन ने जैश-ए-मोहम्मद को आतंकी संगठन घोषित कर दिया था। वहीं दूसरी तरफ इस संगठन के प्रमुख 50 वर्षीय मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपनी हामी भर दी थी, लेकिन पिछले चार बार से चीन ही है जो वीटो का उपयोग करते हुए उसे बचाता चला आ रहा है। एक तरह से आतंकवादियों को संरक्षण देने के काम में वह पाकिस्तान का साथ देता चला आ रहा है। यहां कहना गलत नहीं होगा कि इसी के साथ आतंकवाद और आतंकी संगठनों के सरगनाओं के प्रति चीन की दोहरी नीति वाली धारणा भी स्पष्ट हो गई है। गौरतलब है कि मसूद अजहर भारत में कई आतंकवादी हमले कराए जाने का अपराधी है। वह संसद हमले से लेकर शैन्य शिविरों, पठानकोट वायुसेना स्टेशन, उरी, पुलवामा समेत जम्मू-कश्मीर में अनेक जगहों पर हमले का साजिशकर्ता करार दिया गया है। इन सब में सबसे संगीन और गंभीर हमला पुलवामा में हुए आतंकी हमले को माना जाता है, जो कि 14 फरवरी को किया गया और उसमें हमारे देश के 40 जवान शहीद हो गए, जिसकी जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली और अपने इरादों का भी खुलासा कर दिया। इसके बाद होना तो यह चाहिए था कि चीन खुद आगे आता और इस बात के लिए भारत का साथ देता कि आतंकवादियों को मुंह तोड़ जवाब देने में वह भी पीछे नहीं है। यहां केंद्र को भी चाहिए था कि पुलवामा हमले की सही तस्वीर चीन के सम्मुख रखते हुए अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में कोई रुकावट नहीं डालने का वचन ले लेता। ऐसा करने में हमारी सरकार विफल रही, जिस कारण इस विकट स्थिति में भी चीन ने 'हिंदी चीनी भाई-भाई' के बीच युद्ध लड़ने की याद दिलाने जैसा खंजर एक बार फिर हमारी पीठ पर घोंपने का काम कर दिखाया। आखिर यह कौन नहीं जानता है कि भारत-चीन युद्ध जो 1962 में हुआ था, उस समय भारतीय सेना पर हमला करने वाले चीनी सैनिक लगातार कहते देखे जा रहे थे कि हिंदी चीनी भाई-भाई। कहने को तो चीनी सेना ने लद्दाख और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले किए, लेकिन यह हमला जमीन से ज्यादा हमारी सहृदयता और विश्वास पर भी था। इससे सबक लेते हुए ही भारत ने कभी चीन के करीब जाने की इच्छा जाहिर नहीं की। वहीं दूसरी तरफ चीन अनावश्यक तौर पर सीमा पर विवाद खड़ा करता और लगातार भारत को एक बड़े बाजार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए अपने उत्पादों को खपाता रहा है। डोकलाम में सैन्य गतिविधियां चलाकर शंकाओं व आशंकाओं को भी जन्म देने का काम चीन लगातार करता दिखा है। इसमें दो राय नहीं कि तब के युद्ध में चीनी सेना भारतीय बलों पर भारी साबित हुई थी। नवंबर 1962 में चीन द्वारा युद्ध विराम की घोषणा हुई, लेकिन देश को खासा नुक्सान हो चुका था, अत: इसके बाद भारत सरकार ने भी हर मोर्चे पर फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ाने का काम किया। अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की दोस्ती के किस्से आम हो रहे थे तो पुलवामा आतंकी हमला हो गया, जिसकी जिम्मेदारी पाकिस्तान में मौजूद जैश ने ली और उसके सरगना को बचाने का काम चीन ने करके विश्वासघात करने जैसा काम फिर कर दिया। दोस्ती की डींगे हांकने के बीच यह समझ से परे है कि चीन ने मसूद अजहर को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित होने से बचाने के लिए चौथी बार वीटो पावर का इस्तेमाल किया। इस पर बेशर्म वाली बात यह कि तकनीकी कारणों से मामले को होल्ड पर डाला गया है। चीन कहता है कि इस मामले में अभी उन्हें और स्टडी करने की आवश्यकता है। ऐसे में भारत से चीन के बेहतर संबंध आखिर कैसे संभव हो सकते हैं, जिसकी वह दरकार बता रहा है। यहां तो उसने अमेरिकी नसीहतों को भी नजरअंदाज करने का काम किया है। आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने कम से कम यह तो कहा था कि आत्मसुरक्षा के लिए भारत बड़ा कदम उठा सकता है। इसके बाद ही भारतीय वायुसेना ने पीओके से आगे बढ़ते हुए बालाकोट स्थित आतंकी ठिकानों को अपने निशाने पर लिया था। यदि खबरें सच बोल रही हैं तो फिर अमेरिकी विदेश विभाग के आला अधिकारी ने चीन के इस रुख पर ऐतराज जताते हुए यहां तक कह दिया है कि अजहर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने पर चीन का विरोध क्षेत्रीय स्थिरता पर अमेरिका के साथ इसके पारस्परिक लक्ष्य के विपरीत है। एक तरह से अमेरिका भी मान रहा है कि चीन अपनी लीक से हट रहा है और इसका एक मुख्य कारण वह पाकिस्तान के बहुत करीब जा चुका है, जिस कारण वह पहले पाकिस्तान और उसके पाले हुए सपोलों का ध्यान रखना चाहता है, जबकि यह पड़ोसी देशों और दुनिया के लिए घातक है। बहरहाल इस मामले में भारत को ज्यादा सचेत रहने के साथ ही साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि चीन ने मसूद अजहर को बचाने का काम किया है तो वह और भी आतंकी हमले करने की जुगत भिड़ाएगा ही। ऐसे में देश के अंदर व सीमा के करीब आतंकी घुसपैठ और हमलों का सिलसिला भी शुरु हो सकता है, जिससे निपटने के लिए सदा तैयार रहने की आवश्यकता है। इसके साथ ही चीन से अपनी तरह से निपटने का रास्ता भी खोजना होगा, क्योंकि इसके बगैर वह अपनी ताकत का इस्तेमाल यूं ही हमारे खिलाफ करता चला जाएगा। अंतत: आतंक के मामले में चीन भूल कर रहा है क्योंकि अब उसके सामने 62 वाला भारत नहीं है, बल्कि यह अत्याधुनिक परमाणु शक्ति संपन्न देश है जो हर साजिश का माकूल जवाब देना जानता है।
ईएमएस/15/03/2019