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अमित शाह का हिंदी प्रेम कितना कारगर होगा ? (लेखक - डॉ. अरविन्द प्रेमचंद जैन/ईएमएस)

18/09/2019

भारत देश में सात वार और नौ त्यौहार होते हैं, त्यौहार पर्व उत्सव मैंने का अर्थ होता हैं उस दिन उसके महत्व को समझे और कुछ शिक्षा ग्रहण करे। वैसे आजकल त्यौहार मनाना एक औपचारिकता बन चुकी हैं। धार्मिक त्यौहार एक तरह की रस्मअदायगी, राष्ट्रीय पर्व पिकनिक मनाने का जरिया और कोई और दिवस एक प्रकार से खाना पूर्ती। भारत की मातृ भाषा हिंदी मानी जाती हैं, चूँकि देश अनेक भाषा संस्कृति को मानने वाला हैं और कहा जाता हैं दस मील में पानी और वाणी बदल जाती हैं। अनेक प्रांतों की अपनी अपनी भाषा प्रचलन में हैं और उनका गौरवशाली साहित्य, संस्कृति, परम्परा हैं, तो उनका स्वाभाविक प्रेम उनको अपनी भाषा से होना लाज़िमी हैं,
हिंदी बहुत ही बाहुल्य से प्रचलन में हैं और बहुत समृद्ध भाषा हैं और वह संस्कृत से उद्गमित हुई हैं, आज हिंदी भी कई भागों में बाँट गयी हैं, जैसे कश्मीरी, हरयाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, बिहारी, आदि इसके अलावा हर प्रान्त की अपनी अपनी भाषा हैं और वे उसको अपना स्वाभिमान मानते हैं।
आज हमारे देश में देश का नाम इंडिया हैं जबकि होना चाहिए भारत, हिन्दीकरण की शुरुआत इंडिया की जगह भारत, भारतवर्ष, हिंदुस्तान से हो तो ठीक हैं और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की डिक्शनरी में इंडियन शब्द यानी असभ्य, जाहिल अपढ़ और अपराधी बताया गया हैं जो हमारे लिए गौरव की बात हैं। सबसे पहले हिन्दीकरण की बात करना हैं तो पहले भारत का नामकरण करे, इंडिया नहीं,
दूसरा हिंदी की स्वीकारता का बढ़ाना इससे नहीं होता की हमारे नेता ने संयुक्त राष्ट्र में एक भाषण दिया और कहने के लिए १५० देशों की यूनिवर्सिटी में हिंदी पढाई जाने लगी हैं यह अच्छी उपलब्धता हैं पर हमारे देश में सर्वोच्च स्तर पर पूरा काम अंग्रेजी में होता हैं, शपथ ग्रहण से लेकर संसद में पूरा काम अंग्रेजी में होता हैं यहाँ तक की हिंदी राष्ट्रभाषा बने इसकी वकालत अंग्रेजी में होती हैं और विरोध भी। जब गंगोत्री ही अपवित्र हैं तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी।
अंग्रेजी भाषा और अन्य भाषा से कोई विरोध नहीं हैं पर अंग्रेजी को प्राथमिकता क्यों ? पहले अंग्रेजी को महत्व उतना मिले जितना जरूरी हैं पर हिंदी का विरोध करना एक मात्र लक्ष्य देश हित में नहीं हैं। सब भाषाएँ अतुल ज्ञान का भण्डार हैं और हिंदी संस्कृत उर्दू भी किसी से कम नहीं हैं। इस हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रयास १०० वर्ष पूर्व से हुआ था पर कोई लाभ नहीं हुआ। ज्यों समर्थन मिलता वैसे ही विरोध होता हैं, उसका कारण सब भाषायी अपनी भाषा को प्रमुखता देते हैं।
वर्तमान अंग्रेजी सशक्त संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी हैं की उससे मुक्ति संभव नहीं हैं और अन्य भाषाएँ हिंदी भाषी सीखना नहीं चाहते, इसी प्रकार अन्य भाषी हिंदी का विरोध करते हैं।
वर्तमान सरकार सबसे पहले सर्वोच्च स्तर पर हिंदी को प्राथमिकता देकर उससे काम करे, संसद कार्यालय में हिंदी का उपयोग हो और जिस प्रकार अन्य देश जैसे चीन, जापान। कोरिया, रशिया आदि देश अपनी भाषा को प्रमुखता से रखते हैं उसी प्रकार हमें भी प्राथमिकता देना होंगी अन्यथा हिंदी दिवस मनाना एक खाना पूर्ती होती जा रही हैं।
कल मारीशस में हिंदी दिवस मनाया गया और उसकी जानकारी अंग्रेजी में प्रसारित की गयी !
अमित शाह अपनी बात के धनी हैं, जो सोचते बोलते हैं उसे पूरा करते हैं, हम उनसे अपेक्षा रखते हैं की कितने भी झंझावात आये पर आपने दिया हुआ वचन पूरा करेगा, ऐसी देश वासियों की इच्छा हैं। आपकी दृढ इच्छा शक्ति के कारण ही देश ने बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिए जो अनुकरणीय हैं।
अगल वर्ष हम पूर्ण उत्साह से वास्तविक हिंदी दिवस के रूप में मंगाएंगे यह अभिलाषा हैं।
हमें पूर्ण विश्वास हैं की हम सफल होंगे।
.../राजेश/4.10/ 18 ‎सितंबर 2019