लेख

(विचार-मंथन) वायु प्रदूषण पर सख्ती (लेखक-सिद्धार्थ शंकर/ईएमएस)

07/11/2019

दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट को बार-बार सख्ती दिखाने को मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसा इसलिए है कि जिन महकमों के पास इस काम की जिम्मेदारी है, वे ठीक से अपना काम नहीं कर रहे। सोमवार को शीर्ष अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी व्यक्त की कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है जो अपने काम में लापरवाही बरत रहे हैं और प्रदूषण से संबंधित शिकायतों की अनदेखी कर रहे हैं। यह काफी गंभीर मामला है। इसलिए अदालत को कड़ा रुख अपनाना पड़ा। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि अगर कोई भी अधिकारी या कर्मचारी प्रदूषण संबंधी शिकायत मिलने के बावजूद कदम नहीं उठाता है तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जाना चाहिए। दरअसल, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सोशल मीडिया पर एक से बाईस नवंबर के बीच सात सौ उनचास शिकायतें मिली थीं। इनमें से पांच सौ शिकायतों पर कार्रवाई की गई, लेकिन बाकी को संबंधित नोडल एजेंसियों को भेज दिया गया। अदालत की नाराजगी इस बात पर ज्यादा थी कि प्रदूषण से दिल्ली में जब लगातार हालात बिगड़ रहे हैं तो फिर संबंधित महकमे और अधिकारी लापरवाही क्यों बरत रहे हैं। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कह कि दिली का दम हर साल घुट रहा है और हम कुछ नहीं कर रहे हैं। हर साल 10-15 दिनों के लिए ऐसा होता है। सभ्य देश में ऐसा नहीं होता है। जीवन का अधिकार सबसे अहम है। वायु प्रदूषण जीवन के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। राज्य सरकारें और निकाय संस्था अपनी ड्यूटी निभाने में विफल हुए हैं। ग्राम प्रधान, स्थानीय अधिकारी और पुलिस में से जो भी पराली जलाने पर रोक नहीं लगा पाएगा, उसे नौकरी से निकाल दिया जाए। लोगों को दिल्ली न आने या दिल्ली छोडऩे की सलाह दी जा रही है। राज्य सरकारें इसके लिए जिम्मेदार हैं। हम हर चीज का मजाक बना रहे हैं। इसे और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम इस स्थिति में नहीं जी सकते। केंद्र सरकार को कुछ करना चाहिए दिल्ली सरकार को कुछ करना चाहिए। सिर्फ ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा। यह बहुत हो चुका है। कोर्ट की यह टिप्पणी सुनने में भले ही तल्ख हो, मगर पहली बार नहीं है। पिछले साल भी कोर्ट ने लगभग इसी लहजे में सरकारों और अफसरों को फटकार लगाई थी, नतीजा कुछ नहीं निकला। पिछले साल से इस बार दिल्ली समेत कई शहरों में प्रदूषण ज्यादा है।
दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण के कारण हालात गंभीर हैं। रोजाना ही ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल रही हैं कि आज हवा और खराब हुई। वायु गुणवत्ता मापने वाला पैमाना रोजाना हवा के जहरीली होने के जो भयावह संकेत दे रहा है, वह चौंकाने वाला है। देश के दूसरे शहरों का भी कमोबेश यही हाल होता जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण से संबंधित शिकायतों को फेसबुक, ट्विटर के जरिए भी दर्ज कराया जा सकता है। इन शिकायतों से निपटने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीमें भी बनी हुई हैं। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब इस काम में नोडल एजेंसियों की भूमिका भी आ जाती है। जाहिर है, यह प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही होता है और ऐसे मामलों में समय लग जाता होगा। लेकिन वायु प्रदूषण से जुड़े मामले अतिसंवेदनशील श्रेणी में आते हैं, इसलिए इनसे संबंधित शिकायतों के निपटान में कोई विलंब नहीं होना चाहिए। नोडल एजेंसियों के साथ ऐसा तालमेल बनना चाहिए कि गंभीर मामलों की शिकायतें किसी प्रशासनिक प्रक्रिया में उलझ कर न रह जाएं, क्योंकि ऐसे मामलों में निपटारे में देरी का खमियाजा लोगों को उठाना पड़ता है।
दिल्ली -एनसीआर और दूसरे शहरों में वायु प्रदूषण रोकने के लिए जिस स्तर की कवायद की जरूरत है वह दिखाई नहीं देती। सबसे बड़ी समस्या सड़कों पर अभी भी 15 साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों का दौडऩा है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक ऐसे वाहनों की संख्या दो लाख से ज्यादा है। लेकिन सरकार ऐसे वाहनों पर रोक लगाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। संबंधित महकमे ऐसे उपाय करने में एकदम लाचार नजर आ रहे हैं कि कैसे पुराने वाहनों को सड़कों पर उतरने से रोका जाए! इसके अलावा दिल्ली के कुछ खास इलाकों को छोड़ दें तो अनेक जगहों पर कचरा जलते देखा जा सकता है। इतना ही नहीं, कूड़े के पहाड़ों के निपटान की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया, जो लंबे समय से वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बने हुए हैं। नोएडा और गुरुग्राम में तो हवा की गुणवत्ता मापने के लिए पर्याप्त केंद्र भी नहीं हैं। रिहायशी इलाकों में उद्योग चल ही रहे हैं। जाहिर है, दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए जिस तरह के कार्यबल, मशीनरी, तत्परता और तालमेल की जरूरत है, उसका घोर अभाव है। इसी का नतीजा है कि हवा हर रोज ज्यादा जहरीली हो रही है।
06नवंबर/ईएमएस