लेख

खादी आज भी प्रासंगिक (लेखक-विवेक रंजन श्रीवास्तव / ईएमएस)

14/08/2019


भारतीय दर्शन सारे विश्व में विशिष्ट है , खादी के एक धागे से हम भाई बहन के अनमोल प्यार को रक्षा बंधन के पावन उत्सव में बदल देते हैं। हमारे पण्डित जी मंत्रोच्चार के साथ कलाई पर बांधे गये रक्षा सूत्र के लिये भी खादी के कच्चे धागे का ही उपयोग करते हैं । महात्मा कबीर ने तो
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया ॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥
दास कबीर जतन करि ओढी,
जस कीं तस धर दीनी चदरिया ॥
पंक्तियां कहकर जीवन जीने की फिलासफी ही समझा दी है।
इसी खादी को महात्मा गांधी ने अहिंसक हथियार बनाकर देश की आजादी के लिये उपयोग किया और ग्राम स्वावलंबन का अभूतपूर्व उदारहण दुनियां के सामने प्रस्तुत किया। खादी में यह ताकत कल भी थी , आज भी है। केवल बदले हुये समय और स्वरूप में खादी को पुनः वैश्विक स्तर पर विशेष रूप से युवाओ के बीच पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है। खादी मूवमेंट आज भी रोजगार , राष्ट्रीयता की भावना और खादी का उपयोग करने वालो और उसे बुनने वालो को परस्पर जोड़ने में कारगर है।
खादी एक ईको फ्रेँडली कपड़ा है। यह शुचिता व शुद्धता का प्रतीक है।खादी राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक है। कभी महात्मा गांधी ने कहा था "हर हाथ को काम और हर कारीगर को सम्मान " यह सूत्र वाक्य आज भी प्रेरणा है। लगातार लोगो के बीच खादी को लोकप्रिय बनाने के लिये काम होना चाहिए। खादी बाजार फिर से पुनर्जीवित हो । खादी बुनकरो का उत्थान ,युवाओ तथा नई पीढ़ी में खादी के साथ ही महात्मा गांधी के विचार तथा दृष्टिकोण का विस्तार कर और ग्रामीण विकास के लिये खादी के जरिये दीर्घकालिक रोजगार के अवसर बनाने के प्रयास जरूरी हैं। इन्ही उद्देश्यो से सरकार के वस्त्र मंत्रालय को कार्य दिशा बनाने की आवश्यकता है.
खादी एक ईको फ्रेँडली फेब्रिक।..
खादी एक ईको फ्रेँडली अर्थात पर्यावरण हितैषी कपड़ा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि प्रति मीटर खादी के उत्पादन में मात्र ३ लीटर पानी की खपत होती है , जबकि इतनी ही लम्बाई के टैक्सटाईल मिल के कपड़े के उत्पादन में जहां तरह तरह के केमिकल प्रयुक्त होते हैं , ५५ लिटर तक पानी लगता है। खादी हाथो से बुनी और बनाई जाती है , खादी लम्बी यांत्रिक गतिविधियो से मुक्त है अतः इसके उत्पादन में केमिकल्स व बिजली की खपत भी नगण्य होती है , इस तरह खादी पूरी तरह ईको फ्रेंडली है। जिसे अपनाकर हम पर्यावरण संरक्षण में अपना अपरोक्ष बड़ा योगदान सहज ही दे सकते हैं.
खादी शुद्धता का प्रतीक।..
चरखे से सूती , सिल्क या ऊनी धागा काता जाता है। फिर हथ करघे पर इस धागे से खादी का कपड़ा तैयार किया जाता है। खादी के कपड़े की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इसकी बुनाई में ताने बाने के बीच स्वतः ही हवा निकलने लायक छिद्र बन जाते हैं। इन छिद्रो में जो हवा होती है , उसके चलते खादी के वस्त्रो में गर्मी में ठंडक तथा ठंडियो के मौसम में गर्मी का अहसास होता है , जो खादी के वस्त्र पहनने वाले को सुखकर लगता है। खादी के वस्त्र मजबूत होते हैं व बिना पुराने पड़े अपेक्षाकृत अधिक चलते हैं।
खादी राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक।..
एक सदी पहले १९२० में जब देश को आजादी के लिये महात्मा गांधी संगठित कर रहे थे , उन्होने खादी को एक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त कर दिखाया था। खादी स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बन गई थी। दरअसल खादी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता व सम्मान को प्रदर्शित करती है। नये कलेवर में अब खादी में रंग , रूप , फैब्रिक , की विविधता भी शामिल हो चुकी है तथा अब खादी नये फैशन के सर्वथा अनुरूप है।
खादी सशक्तिकरण के लिये एक अस्त्र
लगभग नगण्य लागत व केवल श्रम से खादी के धागे और उससे वस्त्रो का उत्पादन संभव है। इसलिये सुदूर ग्रामीण अंचलो में भी रोजगार के लिये सहज ही खादी उत्पादन को व्यवसाय के रूप में अपनाया जा सकता है। महिलायें घर बैठे इस रोजगार को अपनी आय का साधन बना सकती हैं। खादी की लोकप्रियता बढ़ाई जावे , जिससे बाजार में खादी की मांग बढ़े और इस तरह अंततोगत्वा खादी के बुनकरो के आर्थिक हालात और भी बेहतर बन सकें
हम सब मिलकर खादी के ताने बाने इस तरह बुने कि नये फैशन , नये पहनावे के अनुरूप एक बार फिर से खादी दुनिया में नई लोकप्रियता प्राप्त करे और विश्व में भारत का झंडा सर्वोच्च स्थान पर लहरा सकें।
14अगस्त/ईएमएस