लेख

करुणा की प्रतिमूर्ति:संत मदर टेरेसा (लेखक-प्रो.शरद नारायण खरे/ईएमएस)

25/08/2019

जन्म दिवस (26अगस्त )पर विशेष
"लेकर जो आगे बढ़ा,पर सेवा का भाव ।
सचमुच उसकी ज़िन्दगी,पाती प्रभुता,ताव ।।"
मदर टेरेसा का वास्तविक नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ था। गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी इनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद इनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी इनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। यह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। इनके जन्म के समय इनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। वह एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। पढ़ाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। व और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिकाएँ थीं। ऐसा माना जाता है कि जब वे मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी और 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया। तत्पश्चात वेआयरलैंड गयीं ,जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। अंग्रेजी सीखना इसलिए जरुरी था क्योंकि ‘लोरेटो’ की सिस्टर्स इसी माध्यम में बच्चों को भारत में पढ़ाती थीं।
मानव सेवा के पथ पर-
१९८१ ई में उन्होंने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और आजीवन सेवा का संकल्प ले लिया। उन्होंने स्वयं लिखा है - वह १० सितम्बर १९४० का दिन था जब मैं अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय मेरी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी,कि मुझे सब कुछ त्याग देना चाहिए और अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा कर के दुखी तन को समर्पित कर देना चाहिए।"
मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं थीं। उन्होंने सद्भाव बढ़ाने के लिए संसार का दौरा किया था। उनकी मान्यता थी कि 'प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बड़ी है।' उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वयं-सेवक भारत आये,और तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना था कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता होती है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं,जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें - भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें,और अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।
मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिये विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किय गया है। १९३१ में उन्हें शांति पुरस्कार और धर्म की प्रगति के टेम्पेलटन फाउण्डेशन पुरस्कार प्रदान किए गए। विश्व भारती विध्यालय ने उन्हें "देशिकोत्तम" पदवी दी जो कि उसकी ओर से दी जाने वाली सर्वोच्च पदवी है। अमेरिका के कैथोलिक विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टोरेट की उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार द्वारा १९६२ में उन्हें 'पद्म श्री' की उपाधि मिली। १९८८ में ब्रिटेन द्वारा 'आईर ओफ द ब्रिटिश इम्पायर' की उपाधि प्रदान की गयी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि से विभूषित किया। १९ दिसम्बर १९७९ को मदर टेरेसा को मानव-कल्याण कार्यों के हेतु नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वह तीसरी भारतीय नागरिक हैं,जो संसार में इस पुरस्कार से सम्मानित की गयी थीं। मदर टेरेसा के लिए नोबल पुरस्कार की घोषणा ने जहां विश्व की पीड़ित जनता में प्रसन्नता का संचार हुआ है, वही प्रत्येक भारतीय नागरिकों ने अपने को गौर्वान्वित अनुभव किया। स्थान स्थान पर उन्का भव्य स्वागत किया गया। नार्वेनियन नोबल पुरस्कार के अध्यक्ष प्रोफेसर जान सेनेस ने कलकत्ता में मदर टेरेसा को सम्मनित करते हुए सेवा के क्षेत्र में मदर टेरेसा से प्रेरणा लेने का आग्रह सभी नागरिकों से किया था। देश की प्रधान्मंत्री तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने मदर टेरेसा का भव्य स्वागत किया। अपने स्वागत में दिये भाषणों में मदर टेरेसा ने स्पष्ट कहा था कि "शब्दों से मानव-जाति की सेवा नहीं होती, उसके लिए पूरी लगन से कार्य में जुट जाने की आवश्यकता है।"
09 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि से विभूषित किया।
कई व्यक्तियों ,सरकारोंऔर संस्थाओं के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाती रही है, यद्यपि उन्होंने आलोचना का भी सामना किया है।पर वे मानव सेवा के पथ से कदापि भी विचलित नहीं हुईं ।
अपना सर्वस्व दीन दुखियों व पीड़ितों के लिए समर्पित कर देने वाली संत मदर टेरेसा के लिए बार बार सम्मानपूर्वक नमन् निवेदित करते हुए यही कहूंगा कि,--
"जो बनकर सचमुच रहा,जीवन भर इक संत ।
ऐसी मानव का कभी,हो सकता ना संत ।।"
25अगस्त/ईएमएस