लेख

क्या चुनाव, चुनाव हैं या प्रबंधन (लेखक- डॉक्टर अरविन्द जैन/ईएमएस)

07/12/2018


चुनाव पहले समाज द्वारा जो प्रतिष्ठित /योग्य होता था उसे स्वयं लोग चुनते थे पर आज ताकतवर असामाजिक व्यक्ति समाज में आकर कहता हैं की मैं अब तुम्हारा नेता हूँ। इसकी शुरुआत उस समय से शुरू हुई जबसे इन पदों पर आरूढ़ नेताओं को लाभ मिलना शुरू हुआ। पहले नेतागिरी यानी अपना पैसा खरच करो और कभी भी लाभ का सौदा नहीं रहा। ना उनको अपना नाम प्रतिष्ठा की चिंता रहती थी। कारण काम करेंगे तो नाम होगा ही। पर जबसे पैसा /भर्ष्टाचार का बोलबाला हुआ और पद प्रतिष्ठा के साथ गुंडागर्दी का प्रभाव होने से राजनीती की और झुकाव होना शुरू हो गया और विधायक /सांसद /मंत्री /मुख्य मंत्री /प्रधान मंत्री से लेकर सरपंच आदि को जो चस्का लगा की वे अब नरभक्षी शेर हो गए। जैसे ही चुनांव जीते ही सबसे पहले समाज की बेरोजगारी ख़तम और उनकी गरीबी हटना शुरू हो जाती हैं और उनका विकास दिन दूना होने लगता है, चुनाव में करोड़ों रूपए खरच करना मामूली बात हैं और उसके बाद चुनाव में प्रबंधन करना सबसे प्रमुख होता हैं।
ईश्वर के आभाव में प्रजा में मास्त्य न्याय प्रचलित हो जाता हैं इसिलए दण्डधर की आवश्यकता होती हैं -
दंड भीत्या ही लोकोयं पन्थम नानुधावत्ति !
युक्त दण्डं धारस्तस्मान पर्थिवाहः प्रथविनं जयेत!! (आदिपुराण १६/२५३)
जब संग्रह और लोभ की प्रवत्ति बढ़ती हैं तो संघर्ष की उतपत्ति बढ़ती होती हैं। यह संघर्ष ही चिंता और दीनता का कारण हैं। जब समाज में सभी व्यक्ति शक्ति के अनुसार कार्य और आवश्यकतानुसार पुरुस्कार प्राप्त करते हैं तो संघर्ष नहीं होता और न संचय की प्रवत्ति उतपन्न होती हैं। शारीरिक दोष का कारण असंयम और अनियंत्रित प्रवत्तियाँ हैं। पागलपन और उन्माद का मनोवैज्ञानिक कारण असंतोष मानाहैं
आज सब पार्टियां शासन और सेवा के लिए संघर्षरत हैं और एक दूसरे को सहयोग नहीं देते हैं।
स्वदुखे निर्घृणारम्भाः पर दुःखेषु दुःखिताः ! निष्यप्रे क्षं पराथ्रेशुः!
और अपने दुःख और कष्ट को दूर करने का प्रतिकार न कर दूसरे के दुःख को दूर करने के लिए प्रयत्नशीलहोना ही सहयोग का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। पर आज सब अपना हित सर्वोपरि मानते हैं। और दूसरे का नामोनिशान मिटाने तुले हैं। जब तक सत्ता में पक्ष और विपक्ष न होगा तब तक शासन नहीं चलेगा। क्या कोई भी पक्षी एक पंख से उड़ सकता हैं।
आज स्वयं मुख्य मंत्री कह रहे हैं की चुनाव आयोग बहुत मानवीयता का प्रदर्शन करता हैं और दूसरी ओर चुनाव जीतने किस प्रकार के कितने हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। इससे लगता हैं की चुनाव इस समय प्रबंधन पर जुड़ा हुआ हैं। आज चुनाव का पूरा खेल शुरू से आखिरी तक प्रबधन से जुड़ा हुआ हैं। चुनाव में धांधली का होना आम बात हैं और सत्ता धारी अपने मुकाम को पाने किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस चनाव में विकास की जगह व्यक्तिगत हमले किये गए। ऐसा लगता हैं की प्रदेश विकसित हो चूका हैं और अब सबको मलाई खाना हैं।
चुनाव परिणाम हकीकत सामने लाएगा। पर वर्तमान में वह ही जीतेगा जिसका प्रबधन सबसे बढ़िया और प्रबधित होगा। यदि यह सब होता रहेगा तो चुनाव कराने की अब जरुरत नहीं हैं कारण निष्पक्ष न होना ही चुनाव का महत्वहीन होना हैं।
07दिसम्बर/ईएमएस