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राजनीतिक उठापटक में क्यों अटक गया है देश? (लेखक-अजित वर्मा / ईएमएस)

12/02/2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की घोषणा की तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उनकी तुलना संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर से कर दी। बस इस पर बवाल मच गया। कहा गया कि एक तरफ महाराष्ट्र में आंबेडकर भवन गिराया गया। हरियाणा और गुजरात में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। तो ऐसे में मोदी की तुलना अम्बेडकर से कैसे हो सकती है?
महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने बयान दिया था कि अगर गठबंधन नहीं होता है तो वह पूर्व सहयोगियों को करारी शिकस्त देगी। इस पर शिवसेना भड़क गई और उसने जवाब दिया कि कोई अगर यहां आकर पटक देने की बात करेगा, तो हम पटक-पटक के गाड़ भी देने वाले हैं। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रामदास कदम ने केंद्र सरकार द्वारा सामान्य जाति को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस समय में जब मराठा आरक्षण जैसे मुद्दे पेंडिंग हैं, ये नया वादा करना गलत है। इससे पहले शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा था कि हम पिछले तीन साल से बीजेपी को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन वो ही हमारे साथ रोड रोमियो की तरह चिपकी हुई है, हम तो बीजेपी की तरफ देखते भी नहीं हैं। संजय राउत ने कहा था कि तीन राज्यों के चुनाव बता रहे हैं कि किसने किसे पटका है। शाह ने महाराष्ट्र के बीजेपी कार्यकर्ताओं को सभी 48 लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के तैयार रहने को कहा था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी बयान दे चुके हैं कि वह लोकसभा चुनाव में 48 लोकसभा सीटों में 40 से अधिक सीटों पर जीत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
राफेल मामले में निशाने पर लिए जाने के बाद से देखा जा रहा है कि शिवसेना बीजेपी को आंख दिखा रही है। शिवसेना प्रमुख ने राफेल पर जेपीसी बनाए जाने का समर्थन किया। इसके बाद भी बीजेपी ने नरम रुख अख्तियार करते हुए उद्धव ठाकरे के बयानों को नजरअंदाज किया। साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों से ठीक पहले शिवसेना ने बीजेपी के साथ अपना नाता समाप्त कर दिया था। विशेषज्ञों ने माना था कि करीब ढाई दशक से एक साथ काम कर रही शिवसेना के भीतर इतना आत्मविश्वास भर गया था कि वह प्रदेश की आधी सीटें आसानी से जीत सकती है। हालांकि चुनाव नतीजों में साफ हो गया और शिवसेना के खेमे में 18 सीटें आई।
उत्तरप्रदेश में भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो रहे विपक्ष के प्रयासों को धक्का देते हुए सपा बसपा के बीच गठबंधन लगभग तय हो गया है, तो कांग्रेस ने भी राज्य की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर का कहना है कि बिना कांग्रेस के सपा-बसपा के बीच महागठबंधन का सीधा-सीधा फायदा भाजपा को होगा।
बब्बर ने कहा कि इन दोनों पार्टियों ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ा था, लेकिन अगर यह कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव मैदान में होतीं तो बीजेपी को और भी ज्यादा सीटों का नुकसान होता।
पश्चिम बंगाल में भाजपा और ममता की तृमूकां के बीच रैलियों पर रस्साकशी हो रही है तो उत्तरप्रदेश में राममन्दिर की नूरा कुश्ती और अर्द्धकुम्भ के नाम पर कुम्भ-कुम्भ हो रहा है। लगता है 2019 के चुनावों के दौरान ही नहीं, पहले और बाद में भी जबर्दस्त हिंसा हो सकती है।
12फरवरी/ईएमएस