लेख

राजस्थान विधानसभा चुनाव और सत्ता विरोधी लहर (लेखक-डॉ. भरत मिश्र प्राची / ईएमएस)

03/12/2018

छत्तीसगढ़ ,मध्यप्रदेष, मिजोरम विधानसभा के चुनाव तो हो गये जहां वर्श 2013 के चुनाव से इस चुनाव में सर्वाधिक मत पड़े है जो सत्ता के प्रति उभरे जनाक्रोष को दर्षा रहे है। अब चुनाव 7 दिसम्बर को राजस्थान एवं तेलंगाना में होने है जहां राजस्थान में इस बार छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेष से ज्यादा जनाक्रोष सत्ता के प्रति उभरकर सामने नजर आ रहा है। जहां सरकार से असंतुश्ट भाजपा से जुड़े लोगों का ही प्रमुख नारा बना रहा कि मोदी से वैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं , आम लोगों के सरकार से नराज होने की बात तो अलग है। इस तरह के परिवेष में राजस्थान में पूर्व से ही सत्ता परिवर्तन के आंकलन किये जा रहे है। फिर भी इस हालात में भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व किस परिप्रेक्ष्य में सत्ता में भाजपा की वापसी की उम्मीद लगाये बैठा है।
राजस्थान एवं तेलंगाना विधानसभा चुनाव की तिथि जैसे -जैसे नजदीक आती जा रही है, राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चली है । भाजपा एवं कांग्रेस दोनों विषेश रूप से राजस्थान को चुनावी दंगल का अड्डा बना चुके है। जहां एक ओर भाजपा अपने वर्चस्व को बनाये रखने के प्रयास में सत्ता बरकरार रखने की दिषा में हर संभव कोषिष कर रही है तो कांग्रेस सत्ता में फिर से वापसी के प्रयास में पूरजोर कोषिष कर रही हे। इस दिषा में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष अमित साह सहित भाजपा के अनेक चर्चित नेता राजस्थान की धरती पर आमजन को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिये प्रेरित करने के अथक प्रयास कर रहे है तो कांग्रेस की ओर से कांग्रेस के राश्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, सहित कांग्रेस के पूर्व मुख्य मंत्री दिगविजय सिंह, अषोक गहलोत जैसे दिग्गज नेता सर्वाधिक जनमत को कांग्रेस के प़क्ष में लाने के अथक प्रयास करते नजर आ रहे है। इस तरह के प्रयास में एक दूसरे के ऊपर तीखे एवं अनर्गल बोल भी दोनों की ओर से षामिल है जो सत्ता पाने के लिये राजनीतिक गरिमा को भी काफी नीचे तक गिरा चुके है। तेलंगाना में कांग्रेस टीडीपी के साथ चुनाव लड़ रही तो भाजपा अपने दम पर चुनाव मैदान में खड़ी दिखाई दे रही है। वैसे भाजपा को उम्मीद है कि तेलंगाना में पूर्वोततर राज्यों की तरह सफलता मिल जाय पर ऐसा यहां होना दूर - दूर तक संभव नहीं ।
इन राज्यों में विषेश रूप से छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेष, में रोजगार को लेकर युवा वर्ग में सबसे ज्यादा आक्रेाष उभरता दिखाई दिया। किसानों को भी राहत नहीं मिलने से इस वर्ग में भी सरकार के प्रति उभरा जनाक्रोष नजर आया जो सत्ता परिवर्तन का कारण हो सकता है। अब 7 दिसम्बर को राजस्थान एवं तेलंगाना में विधानसभा के चुनाव होने वाले है राजस्थान प्रदेष की राजनीतिक पृश्ठिभूमि भी अभी तक कुछ ऐसी ही रही है जहां सर्वाधिक रूप से हर पांच वर्श के अंतराल में सरकार एक पार्टी की न होकर बदलती रही है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा । इस गणित के आधार पर भी इस बार राजस्थान में सरकार का बदलना तय तो माना जा रहा जिसे भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व न जाने किस आधार पर मिथक साबित करने का दावा ठोक रहा जहां छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेष से सत्ता के प्रति सर्वाधिक जनाक्रोष उभरता नजर आ रहा है।
भाजपा के षासनकाल में रोजगार के लिये बेरोजगारों को कौषल योजना के तहत धन तो दिये गये पर रोजगार देने वाले एक भी नये संसाधन उद्योग नहीं लगाये गये और न कोई नई भर्तिया की गई जिससे प्रदेष में बेरोजगारी बढ़ती गई। पेट्रोल, डीजल, रसोईगैस के बढ़े दाम तथा दवाई एवं जांच जैसी जीवनरक्षक पैमाने पर जीएसटी लगाने से भी आमजन में सरकार के प्रति उभरा जनाक्रोष सत्ता परिवर्तन का कारण बनता दिखाई दे रहा हे। वैसे भाजपा सरकार अपने कार्यकाल में उज्जवल योजना के तहत हर गरीब तक गैस चुल्हा मुहैया करने की बात तो कर रही है पर महंगी गैस से गरीबों के बंद पड़े चूल्हें जनाकेष के कारण बनते जा रहे है। खाली ख्याली पुलाव आमजनमानस में जनाक्रोष ही उभार सकता है। जहां इस बार जनता का सरकार से मोहभंग होता दिखाई दे रहा है।
राजस्थान में सत्ता का विरोध है , इस बात को भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व अच्छी तरह जानता है पर उसे अब भी उम्मीद है कि आम जन के पास फिलहाल मोदी का कोई विकल्प नहीं है जिसका लाभ चुनाव में उसे मिल जाय। इस विष्वास के साथ चुनाव पूर्व भाजपा अपनी पूरी ताकत राजस्थान में गुजरात चुनाव की भाति झोंक दी पर वसुंधरा सरकार के कार्यकाल से नराज जनता राज्य में इस बार सत्ता परिवर्तन चाह रही है। जिसका प्रभाव चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एवं भाजपा दोनों में टिकट नहीं मिलने से बागी हुये प्रत्याषियों ने विरोध का तेज बिगुल बजा दिया है। जिसे षांत करना दोनों के लिये अब टेढ़ी खीर बन चुका है। राजस्थान में सबसे ज्यादा विरोध उन प्रत्याषियों का हो रहा है जो टिकट नहीं मिलने से कांग्रेस छोड़ भाजपा एवं भाजपा छोड़ कांग्रेस में षामिल होकर प्रत्याषी बने हुये है। इस तरह से उभरे परिवेष से कई बागी निर्दलीय बनकर तो कई राजस्थान में गठित नई राजनीतिक पार्टी राश्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का दामन थामकर चुनावी मैदान में विरोध जता रहे है। सत्ता पक्ष के कई मंत्रियों का अपने चनावी क्षेत्र में आमजन का विरोध झेलना पड़ रहा है। इस कारण इस तरह के हालात के चलते इस बार राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर का विषेश प्रभाव रहेगा जो सत्ता परिवर्तन का कारण हो सकता है।।
03दिसम्बर/ईएमएस