क्षेत्रीय

निजी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा कमाई पर फोकस

18/05/2019

सरकारी स्कूलों के बच्चों का मेरिट में दबदबा, प्राईवेट के खाली हाथ
अशोकनगर(ईएमएस)। निजी स्कूलों में आधुनिकता शिक्षा की चकाचौंध की वजह से फीस तो भारी-भरकम ली जाती है, पर पढ़ाई का स्तर निम्न होने से इनकी तुलना में सरकारी स्कूल के बच्चे अच्छी स्थिति बना रहे हैं। हालात यह है कि निजी स्कूलों की बजाए सरकारी स्कूल के बच्चे ही मेरिट में आ रहे हैं। इन स्कूलों में अत्याधुनिक सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद निजी स्कूल के बच्चों को मात दे रहे हैं। इस साल माशिमं द्वारा घोषित 12वीं व 10वीं बोर्ड परीक्षा परिणाम में सरकारी स्कूल के 6 बच्चों ने ही अपना नाम मेरिट सूची में शुमार किया है। ऐसे में शिक्षा से जुड़े लोग निजी स्कूल को केवल दिखावा की बात कह रहे हैं।
निजी स्कूलों में आधुनिकता की चकाचौंध तो होती है, लेकिन पढ़ाई के नाम पर नाम बड़े और दर्शन थोड़े वाली कहावत चरितार्थ होती है। भारी-भरकम फीस लेकर भी पढ़ाई का स्तर निम्न होने के कारण इन स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूल के बच्चों की स्थिति अच्छी होती है। हालात यह है कि हाल ही में माध्यमिक शिक्षा मण्डल द्वारा कक्षा 10वीं और 12वीं के परीक्षा परिणाम घोषित किये गए हैं। जिसमें जिले के कई नामी व अधिक फीस बसूलने के लिए चर्चित रहने वाले स्कूलों के छात्रों का नाम जिले की प्रावीण्य सूची में तक नहीं है। जाहिर है कि स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा कमाई पर फोकस रहता है। इसी कारण इन स्कूलों में पढऩे वाले छात्र परिणामों मेें फिसड्डी नजर आते हैं। बड़ी बात यह है कि इनमें से अधिकांश स्कूल आरटीई के तहत किये गए प्रावधानों का पालन नहीं करते हैं फिर भी शिक्षा विभाग द्वारा इन्हें मान्यता दे दी जाती है। कई स्कूल संचालक जिन्हें अभी तक मान्यता नहीं मिली है वे अधिकारियों को दोषारोपण कर रहे हैं कि वे जानबूझकर मान्यता अटका रहे हैं। यानि की मान्यता सेटिंग से मिल रही है। जो स्कूल संचालक पैसा देते हैं उनकी मान्यता जारी हो जाती है। आरटीई के प्रावधानों के तहत प्राईवेट स्कूल संचालकों के पास करीब पांच एकड़ जमीन खेल मैदान के रूप में होनी चाहिए लेकिन पूरे जिले में इस प्रावधान पर खरे उतरने वाले स्कूलों की संख्या बमुश्किल उंगलियों पर गिनी जा सकती है। जबकि जिले में करीब दो-ढाई सौ निजी स्कूल संचालित किये जा रहे हैं। जिला मुख्यालय पर ही अधिकांश स्कूलों के पास खेल मैदान तो दूर पर्याप्त कक्ष तक नहीं है। दड़बेनुमा कमरों में ठूस-ठूस कर बच्चों को बैठाया जा रहा है। कई पब्लिक स्कूलों में एक कक्षा में 50 से 80 बच्चे तक बैठाए जा रहे हैं। इसके अलावा शौचालय, प्रकाश और साफ पेयजल जैसी सुविधाओं का भी अभाव है। स्कूलों को मान्यता जारी करने से पहले इनका सत्यापन भी किया जाता है। ऐसे में सबाल उठता है कि कहीं सत्यापन में लापरवाही तो नहीं बरती जा रही है। कई स्कूल ऐसे में जिन्होंने मान्यता तो प्राईमरी की ली है लेकिन वह मिडिल व हाई स्कूल तक संचालित कर रह हैं। इसी तरह मिडिल स्कूल वाले हाई स्कूल व हायर सेकेण्ड्री की कक्षा लगा रहे हैं। इन स्कूलों के संचालक अभिभावकों से मौटी रकम बसूलते हैं एवं बाद में छात्रों को परीक्षा दूसरे स्कूलों में देने जाना पड़ता है। पिछले साल भी ऐसे मामले सामने आए थे। कुछ स्कूल संचालक एक ही मान्यता पर कई स्कूल संचालित कर रहे हैं। प्राईवेट स्कूलों में कई सारी अनियमित्ताएं बरती जा रहीं हैं। अगर इन्हें पटरी पर लाना है तो शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को मान्यता देते समय गंभीरता से फाइलों की जांच करनी चाहिए। प्रशासन को भी चाहिए कि जिलेभर में चल रहे प्राईवेट स्कूलों को भौतिक सत्यापन किया जाए।
धर्मेन्द्र 18 मई 2019