राज्य समाचार

(शाजापुर) अमर रचनाकार की याद आज भी दिलों में ताजा

07/12/2018

- आजादी के आंदोलन में 9 बार जेल यात्राएं की पं. नवीनजी ने
- 8 दिसम्बर पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन के जन्मदिन पर विशेष
शाजापुर (ईएमएस)। आजादी की लड़ाई के दौरान ऐसी अनेक काव्य रचनाओं के माध्यम से नौजवानो के दिलो में देशप्रेम की चिंगारी उत्पन्न करने वाले पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन हिन्दी के ऐसे राष्ट्रीय कवि थे, जिनका नाम मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर के साथ लिया जाता है। उन्होंने आजादी के आंदोलन में नौ बार जेल यात्राएं की तथा देश की जनता को अपनी कविताओं के माध्यम से आजादी के लिए प्रेरित किया।
नवीन जी का जन्म जिले के शुजालपुर तहसील के ग्राम भ्याना में 8 दिसम्बर 1897 को हुआ था। उन्हे बचपन में कायंकर गरीबी का सामना करना पड़ा तथा जवानी के दिनों देश की गुलामी और बड़े होने पर उन्हे अनेक बीमारियों ने जकड़ लिया, उनकी मां शाजापुर में चक्की पीसकर तथा पिता पौथी बांचकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। एक बहन थी जिसकी शादी बचपन में ही हो गई थी और आगे चलकर उसका निधन भी हो गया। नवीनजी ने 1913 में शाजापुर में मिडिल की परीक्षा पास की, इसके पश्चात उन्होंने उज्जैन माधव महाविद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। नवीनजी की मां वल्लभाचार्य के वैष्णव सम्प्रदाय की परम काक्त थी। 1916 में नवीनजी कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान गणेशशंकर विद्यार्थी तथा माखनलाल चतुर्वेदी के सम्पर्क में आए। गणेशशंकर विद्यार्थी ने नवीनजी को कानपुर में क्राइस्ट चर्च कॉलेज में भर्ती करा दिया जहां से उन्होंने 1917 में इंटर की परीक्षा पास की, लेकिन बीए के द्वितीय वर्ष में ही वह पढ़ाई छोड़ कर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 1920 में कानपुर से राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत प्रताप समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिसके प्रधान सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी थे। बाद में कानपुर में हुए हिन्दू मुस्लिम दंगे में विद्यार्थी जी के शहीद होने के पश्चात प्रताप के प्रकाशन का भार नवीनजी ने संभाला। 1936-37 में नवीनजी के नेतृत्व में कानपुर सूती मिलों के पचास हजार मजदूरों ने 32 दिनों तक हड़ताल की।
नवीन के नाम पर शाजापुर की उपलब्धि
पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन के कारण शाजापुर जिले को देशभर में ख्याति काले ही मिली हो, लेकिन हम अनिकेतन काव्य के इस अमर रचनाकार की याद को स्थाई बनाने के लिए राज्यशासन द्वारा जिले में कोई विशेष प्रयत्न नहीं किए गए। यहां तक कि स्थानीय शासकीय वाचनालय और नवीन महाविद्यालय की लायब्रेरियों में नवीनजी के समग्र साहित्य के बजाए इक्का-दुक्का किताबें ही मौजूद है। ज्ञात रहे कि नवीनजी के जीवन का बहुत-सा हिस्सा शाजापुर नगर में व्यतीत हुआ था। इसके बावजूद अकादमी द्वारा नवीन स्मृति समारोह शाजापुर के बजाए शुजालपुर में आयोजित किया जाता है। राज्य शासन को चाहिए कि स्वतंत्रता संग्राम के इस अमरयौद्धा की स्मृति को स्थाई बनाने के लिए नगर में नवीन शोध संस्थान की स्थापना की जाए और जिले के वाचनालयों में समग्र नवीन साहित्य रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके साहित्यिक अवदान से परिचित हो सके।
हर क्षेत्र में पारंगत थे नवीन
नवीनजी का व्यक्तित्व बहुमुखी आभामंडित था। वह कवि, पत्रकार, औजस्वी वक्ता, अपराजय यौद्धा के साथ कुशल राजनीतिज्ञ थे। दैनिक प्रताप तथा प्रकाा में प्रकाशित उनके राष्ट्रीय काावना से ओतप्रोत सम्पादकीय लेखों ने पाठकों के मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। उनके सम्पादकीय एक प्रकार से तत्कालीन राजनीति के दिशा निर्देशक काी हुआ करते थे। यही कारण था कि अंग्रेज शासन ने उन्हे अनेको बार जेल भेजा। आजादी के पश्चात नवीनजी ने अपनी सेवाओं को कभी भी भुनाने का प्रयत्न नहीं किया और हमेशा अनिकेतन रहने में ही अपनी कालाई समझी -
हम जो भटके अब तक दर-दर
अब क्या खाक बनाएंगे घर
हमने देखा सदन बने हैं
लोगों का अपना-पन लेकर
हम अनिकेतन हम अनिकेतन
ब्रिटिश शासन के क्रूर आचरण, अन्याय, अत्याचारों तथा सामाजिक विषमता के कारण नर को लपक चाटते झूठे पत्ते देख उनका मन सम्पूर्ण व्यवस्था से विद्रोह होकर चारों और विप्लवी उथल-पुथल मचा देने वाली तान सुनाने लगा। युग परिवर्तन करने वाले विद्रोही जन को अपने रास्ते में आने वाले कंटक दिखाई नहीं देते। समाज के शोषित लोगों की पीढ़ा को देखकर वह हमेशा द्रवित हो जाया करते थे -
अरे चाटते झूठे पत्ते जिस दिन
मेने देखा नर को
उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ
आज आग इस दुनिया कार को
नवीन जी का जीवन संघर्ष, आर्थिक अकााव और विपन्नता से भरा हुआ था। वह राजनीति से साहित्य और साहित्य से राजनीति में अपनी भूमिका अवश्य बदलते रहे लेकिन उन्हे साहित्य ने ही असल पहचान दी। विप्लव के अनेक गीत उन्होने गाए लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात उनके स्वप्न भंग हुए और राजनीति उनके लिए प्रसंगहीन हो गई। वह जन्मजात विद्रोही कवि थे। उनकी वाणी में अजीब आकर्षण था और उनका जीवन एक फक्कड़पन की दार्शनिकता से भरा हुआ था। भारतीय संस्कृति उनके लिए विकास की इमारत के समान थी। उनका कहना था कि -
जिनके हाथो में हल बक्खर
जिनके हाथो में घन है
जिनके हाथो में हँसिया है
वे काूखे है, निर्धन है
नवीनजी दो बार राज्य सकाा के सदस्य निर्वाचित हुए। 26 अप्रैल 1960 को उन्हे पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। पं. जवाहरलाल नेहरू से उनके प्रगाढ़ संबंध रहे। उन्होने आजीवन आसक्ति को अभिषाप और अनासक्ति को ही मुक्ति माना। मालवा का भोलापन एवं संकोची भावुकता की वजह से नवीनजी आजीवन सिंहासनों को ठुकराते रहे। स्वतंत्रता संग्राम के इस अथक यौद्धा का निधन 29 अप्रैल 1960 को हुआ। निश्चित ही नवीनजी ने अपने काव्य के माध्यम से राष्ट्र प्रेम की जो अलख जगाई उसे देशवासी हमेशा स्मरण रखेंगे। उनकी प्रमुख कृतियों में क्वासी, अपलक, विनोबा स्तवन, रश्मी रेखा, कुंकुम, उर्मिला है, उनकी अधिकांश कविताएं जीवन को सार्वभोम दृष्टि देखने का ही प्रतिफलन है।
ईएमएस/ चन्द्रबली सिंह / 07 दिसम्बर 2018