लेख

(विचार मंथन) भूखे पेट भजन ना होय गोपाला (लेखक-सनत जैन/ ईएमएस)

12/05/2022

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका में आम जनता सड़कों पर हिंसा पर उतारू हो गई है। जिस मंहिंद्रा राजपक्षे को जनता अपना भगवान मानती थी। उन्हीं राजपक्षे और उनके समर्थन सांसदों के खिलाफ श्रीलंका की जनता सड़कों पर आकर मरने-मारने पर उतारू है।
1917 की रूसी जार क्रांति की तरह श्रीलंका की जनता नेताओं के घरों में घुसकर घर जला रही है। सांसदों एवं सरकारी पदों पर बैठे लोगों को खोज-खोजकर उन पर हमले कर मार रही है। अभी तक श्रीलंका की हिंसा में 1 सांसद सहित 8 लोगों की हत्या हो गई। श्रीलंका के प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री सिहासन छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चले गए है। 1 दर्जन से अधिक मंत्रियों के बंगलों पर आम जनता ने आग लगा दी। 2 बार आपात काल लागू करने के बाद भी सेना और प्रशासन हिंसक प्रदर्शनकारियों को रोक नहीं पा रही है। राजपक्षे का बंग्ला प्रदर्शनकारियों ने जला दिए है। सत्ता से जुड़े लोगों के घरों पर प्रदर्शनकारी हमला कर उन्हें जला रहे है। राजनेता एवं शासन के प्रमुख पदों पर बैठे लोग अपनी जान बचाने के लिये भाग रहे है।
भूख और मुसीबत से बेहाल जनता का गुस्सा अपने चरम पर है। आम जनता, कर्फ्यू लगे होने के बाद भी सड़को पर बड़ी संख्या में आकर लूटपाट कर अपने भोजन का जुगाड़ कर रही है। सेना, पुलिस, शासन, प्रशासन आम जनता के जिम्मेदार नेता, अधिकारी भाग कर सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं। उधार की अर्थ- व्यवस्था ने श्रीलंका सहित दुनिया के लगभग सभी देशों में अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। भौतिक सूख - सुविधाओं के लिए कर्ज लेकर घी पीने की प्रवृति सरकारों के साथ - साथ घर - घर तक पहुंच गई थी। श्रीलंका सरकार ने भी भारी कर्ज ले रखा है। महिन्द्रा राजपक्षे उधार की अर्थ - व्यवस्था से जनता के चहेते और लोकप्रिय नेता बनकर राज कर रहे थे। भारी कर्ज के बोझ से दबी श्रीलंका की अर्थ - व्यवस्था ने सामान्य जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया है। आम जनता को 2 जून की रोटी नहीं मिल पा रही है। ऐसी स्थिति नंगी -भूखी जनता स्वंय का और अपने परिवार का पेट भरने के लिए हिंसा और लूट - पाट में लिप्त होकर किसी तरह जीवन को बचाने का संघर्ष कर रही है। विदेशी मुद्रा का संकट होने से रोजमर्रा की चीजें श्रीलंका से गायब है। बेरोजगारी, मंहगाई एवं भूख ने श्रीलंका में अराजक्ता की स्थिति पैदा कर दी है। भारत में कहावत है "भूखे पेट भजन न हो गोपाला"।
आमदनी अटन्नी और खर्चा रुपैया, कुछ समय के लिए ही संभव है। उधार की अर्थ - व्यवस्था किसी का भला नहीं कर सकती है। श्रीलंका सहित दुनिया के 50 से अधिक देशों में लगभग यही हालात हैं। इस स्थिति से अब निकलने की जरुरत है।
भारत के भी आर्थिक हालात लगातार चिंतनीय होते जा रहे हैं। कोरोनावायरस संकट के बाद देश के लगभग 9 करोड़ लोग निम्न मध्यम वर्ग से अति गरीब हो गए हैं। देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम होने लगा है। सार्वजनिक सेवा की बैंक ओएनजी बीमा जैसी नवरत्न कंपनियों को किसी क्षेत्रों को बेचा जा रहा है। सरकार लाभ देने वाली कंपनियों में हिस्सेदारी बेच रही है। श्रीलंका में प्रधानमंत्री 2050 तक सत्ता में बने रहने का दावा कर रहे थे। लेकिन आज उन्हें सत्ता छोड़ कर भागना पड़ा। पेट्रोल-डीजल, मंहगाई, बेरोजगारी के कारण श्रीलंका जैसे हालात भारत में भी हो सकते हैं। यदि समय रहते भारत की आर्थिक स्थिति को नहीं संभाला गया तो महंगाई बेकाबू हो जाएगी। बेतहाशा बढ़ती महंगाई ने मध्यम एवं निम्न वर्ग के परिवार की कमर तोड़ दी है। जनता में भयानक असंतोष है। सभी चीजों के बढ़ते दामों के कारण आर्थिक हालात बिगड़ चुकी हैं। भारत के ऊपर विदेशी कर्ज भी लगातार बढ़ रहा है। भारत के कई राज्यों ने अपने जीडीपी के अनुपात में अधिक कर्ज ले रखा है। श्रीलंका कर्ज के कारण दिवालिया हुआ है। भारत को समय रहते मंहगाई को नियंत्रित करने एवं विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए त्वरित निर्णय लेना होगा अन्यथा भारत में भी अराजक्ता की स्थिति पैदा हो सकती है।
ईएमएस / 12 मई 22