लेख

इन चुनौतियों से कैसे बचेगा देश ! (लेखक-श्रीगोपाल नारसन / ईएमएस)

25/09/2020

लगता है देशहित जो सबसे पहले होना चाहिए वह सबसे पीछे चला गया।तभी तो देश के बर्बादी के कगार पर पहुंचने पर भी हमारी कुम्भकर्णी नींद नही खुल रही है।देश की प्रगति तो दूर आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता ही जा रहा है।देश की जीडीपी औंधे मुहं गिरी है तो बेरोजगारों की संख्या में चिंताजनक इजाफा हो रहा है।नए युवाओं को नोकरी क्या मिलेगी,जो पहले से बारोजगार थे,उनकी भी नोकरी जा रही है और वे सड़को पर आ गए है।रेलवे,उड्डयन विभाग, विद्युत विभाग, बैंक,सरकारी उपक्रमो की एक के बाद एक बिक्री ने देश की जनता को चिंता में डाल दिया है।उपलब्धि के नाम पर न भयमुक्त समाज है और न ही भ्र्ष्टाचार मुक्त शासन।ऐसे में जाये तो जाए कहा ,यही सवाल हर किसी के सामने है। देश को लोक डाउन की बजाए अनलॉक शब्द देकर फिर से बहलाने की कोशिश हो रही है।एक बार मे ही अनलॉक करना क्या काफी नही था। एक के बाद एक चार बार अनलॉक किया जा चुका है ।किन्तु कोरोना की रफ़्तार भी अनलॉक की तरह गतिमान है। जिस राहुल गांधी को उनकी जानबूझकर छवि खराब करने की रणनीति के चलते देशभर में पप्पू साबित करने की कोशिश की गई,वही कोशिश बर्बाद होते गुलिस्तां की तरफ से ध्यान हटवाने की भी की जा रही है।जबकि यथार्थ का कुछ भी अता पता नहीं है ।सच तो यह है कि उन्हीं राहुल गांधी जिन्हें कुछ लोगो ने गम्भीर न मानने की कसम खाई है,की भविष्यवाणी आज कोरोना संक्रमण के विषय में शत-प्रतिशत सही साबित हुई है ।याद कीजिए कोरोना संक्रमण की शुरुआत में ही या उससे भी पहले जब राहुल गांधी ने कहा था कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए सरकार को बहुत सजग और सतर्क होकर कदम उठाने होंगे। अन्य देशों से सबक सीखते हुए न केवल हमे एहतियाती कदम उठाने होंगे बल्कि कुछ ऐसी व्यवस्था भी करनी होगी कि कोरोना से होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके। लॉकडाउन लागू होने पर भी राहुल गांधी ने कहा था कि लॉकडाउन इस समस्या का कोई हल नहीं है बल्कि यह केवल इसकी प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। तब राहुल गांधी की जमकर खिल्ली उड़ाई गई थी मगर अब चार लोक डाउन एवं चार अनलॉक होने के बाद भी कोरोना से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार भारी संख्या में इजाफा हो रहा है। आज की तारीख में प्रतिदिन 75 से 85 हजार संक्रमण के केस देशभर में सामने आ रहे हैं और यह संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है ।आशाजनक बात यह जरूर है कि ठीक होने वालों की संख्या भी काफी अधिक है । चिंतनीय प्रश्न यह है कि संक्रमितों की संख्या तो जबरदस्त तरीके से बढ़ती ही जा रही है और यह बिल्कुल इटली ब्राजील या अमेरिका की तर्ज पर हो रहा है । यदि अभी भी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या हजारों से बढ़कर लाखों तक एवं लाखों से बढ़कर करोड़ों तक पहुंच सकती है । ऐसे में अस्पतालों में कितनी व्यवस्था हो पाएगी, कितने प्राइवेट अस्पताल मदद कर पांएगे। तब संक्रमित को भर्ती करने के लिए जगह नहीं मिलने वाली है और यदि ऐसे हालात हुए तो देशभर में हाहाकार की स्थिति होना अवश्यंभावी है । हम यहां सरकार की मंशा एवं उनके प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहे हैं लेकिन यह बताना और जानना आवश्यक है कि सरकार को अभी बहुत कुछ करना है और अभी तक किए गए प्रयास इस संक्रमण की स्थिति को देखते हुए केवल ऊंट के मुंह में जीरा जैसे ही कहे जा सकते है।
अभी तक एक आम धारणा यह थी कि कोविड-19 के संक्रमण की वजह से हम लोग घरों में बंद कर दिए गए हैं,लेकिन कोरोना का प्रकोप फिर भी थमने का नाम नहीं ले रहा है । दूर-दराज के गांव सीमावर्ती इलाकों पहाड़ों में भी हालत अच्छी नहीं है । इस बात का भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है कि कितने व्यक्ति लक्षण हीन तरीके से कोरोना से पीड़ित हुए एवं अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते ठीक भी हो गए। यदि इन सब आंकड़ों को अधिकारिक आंकड़ों में जोड़ दिया जाए तो इसमें दो राय नहीं कि अभी तक भारत में कोविड-19 से प्रभावित होने वाले व्यक्तियों की संख्या करोडो की पहुंच चुकी होगी। वह तो भला हो इस देश की जलवायु और यहां के मेहनती लोगों के शरीरों का, जिनकी इम्यूनिटी कम खा कर भी और गम सह कर भी पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं बहुत अधिक ज्यादा है।
लॉकडाउन एवं विभिन्न बंदिशों के चलते अर्थव्यवस्था पर कोरोना ने जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव डाला है। सरकार के विशेषज्ञों ने जब राज्यों के साथ मंत्रणा की तो वहां से अर्थव्यवस्था की बदहाली एवं जीडीपी के लगातार गिरने की जानकारी मिली है । औद्योगिक उत्पादन तो ठप्प सा हो चला था जो अनलॉक के बाद थोड़ा बहुत बहाल हुआ है। जिन उद्योगों में उत्पादन कार्य चल भी रहे हैं, वहां भी उत्पादित सामग्री को बाजार तक पहुंचाने का कार्य बड़ा मुश्किल हो रहा है ।साथ ही सरकार द्वारा ट्रेन एवं बसें बहुत कम संख्या मे चलाने से भी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पहुंचने में परेशानी हो रही है। व्यापारियों से बात करें उनके मुरझाए हुए और घाटे में व्यापार की पीड़ा आंखों से छलकते आंसू बनकर बाहर आ रही है।उनकी आर्थिक कमर टूट जाने के संकेत चिंता का एक बड़ा कारण बन गया है। अर्थशास्त्रियों ने भी इस बात को मान लिया है कि भारत की जीडीपी लगभग 23% गिर चुकी है जो एक बहुत बड़ी गिरावट है,जिसके ऊपर जाने के कोई खास संकेत नहीं मिल रहे हैं। ढहती अर्थव्यवस्था गहरी चिंता पैदा कर रही है ।
रही सही कमी बेरोजगारी की मार पूरी कर रही है ।लगभग लगभग हर निजी संस्थान ने अपने कर्मचारियों की संख्या आधी या उससे भी कम कर दी है जो कर्मचारी काम पर है अभी उन्हें भी पहले के मुकाबले आधा ही वेतन दिया जा रहा है यानी उद्योग 75% की गिरावट झेल रहे हैं । निजी कर्मचारियों की तनख्वाह आधी हो गई है या उनकी नौकरियां जा रही हैं सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोक दिया गया है । उनका मनमाने तरीके से एक दिन का वेतन काट लिया गया है और 28 अगस्त को जारी सरकारी परिपत्र के अनुसार सरकार 50 से 55 वर्ष के कर्मचारियों की सेवाओं का रिकॉर्ड हर समय तैयार रखने के लिए कह रही है । आशंका यहां तक उभर रही हैं कि संभवत सरकार खर्चा कम करने के लिए ऐसे कर्मचारियों को जबरदस्ती रिटायर करने का मन बना रही है जिनकी आयु 50 से 55 वर्ष के बीच या उससे ऊपर है अथवा में 30 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हैं। ईश्वर करें यह सच न हो, मगर अगर ऐसा हृदयहीन कदम उठा लिया जाता है तो निचले एवं मध्यम स्तर के कर्मचारियों के परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएंगे ।
चिंताजनक यह भी है कि केवल पड़ोसी देशों से ही नहीं,अपने से कहीं अधिक ताकतवर देशों के साथ बिना किसी खास मुद्दे के तनाव पैदा हो और युद्ध जैसे हालात पैदा हो,यह भी ठीक नही है।फिलहाल जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करने के बजाए हमें अपनी अर्थ एवं अन्य व्यवस्था को संभालना चाहिए, प्रशासन को चाक चौबंद करना चाहिए। जनता को बेहतर से बेहतर सुविधाएं देकर, उनकी आशंकाएं दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। हम
स्कूल-कॉलेज और शैक्षणिक संस्थान खोले जाने पर भी फैसला नहीं ले पा रहे है। संक्रमण के नाम पर शिक्षा कार्य कोमा में चला गया है। वर्तमान में मॉल खुले हैं ,, मेट्रो और , जिम, भी खुल गए ।अंतर्राज्यीय परिवहन पर भी रोक नहीं रही, राज्य चाहें तो इस परिवहन को नियंत्रित कर सकता है ।कुल मिलाकर अनलॉक का सीधा सीधा सा अर्थ यह है कि अब आपको अपने बंधनों के तहत सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सीधे-सीधे स्वयं आपकी ही होगी। मौजूदा समय मे सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय है, आइसोलेशन सेंटर्स में न गुणवत्ता का भोजन है, ना व्यवस्थाएं वहां जाने वाले बता रहे हैं कि यदि कोई पॉजिटिव न भी हो तो भी वहां से पॉजिटिव होकर लौटे और इस से भी ऊपर जरा सा बुखार होते ही सरकारी एजेंसियां जबरदस्ती लोगों को इन सेंटेंस में भेड़ बकरियों की तरह भेजने में जुटी है हालांकि जब से घर पर ही आइसोलेशन की व्यवस्था का फरमान आया है तब से थोड़ी राहत जरूर मिली है।लेकिन आरोप यह भी है कि सरकार से मिलने वाले बजट की बंदरबांट करने के लिए यह सब हो रहा है।अब तो खुद मंत्री,अधिकारी संक्रमित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के तो दो मंत्रियों की दुःखद मृत्यु तक हो चुकी है । खुद गृहमंत्री एम्स में भर्ती रहे, कितने ही डाक्टर, नर्स, पुलिस वाले संक्रमण का शिकार हो चुके हैं ।ऐसे में आमजन कैसे सुरक्षित रह पाएंगे,कोरोना वैक्सीन कब तक मिल पाएगी,देश की दम तोड़ती अर्थव्यवस्था कैसे ओर कब तक संभल पाएगी,अराजकता, भ्र्ष्टाचार कब तक रुक पाएगा, इस सब पर तो विचार करना ही होगा।फिलहाल तो भगवान ही हालात से निजात दिला सकते है।किसी ओर पर भरोसा करना गैर मुनासिब होगा।
25सितम्बर/ईएमएस