लेख

(पुस्तक चर्चा) सठियाने की दहलीज पर उपयोगी व्यंग्य संग्रह (लेखक-विवेक रंजन / ईएमएस)

13/04/2019

जो भी पाठक व्यंग्य प्रेमी है , उनके लिये प्रदीप उपाध्याय जाना पहचाना नाम है। उन्होने मंत्रालय की सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर व्यंग्य को धर्म के रूप में अपना लिया है। उनके पास अभिव्यक्त करने के लिये प्रवाहमान सरल भाषा , विषय वस्तु से संबंधित ढ़ेर से संदर्भ और हर छोटी बड़ी घटना या समाचार को लेकर उनके स्वयं की मौलिक सोच है। वे नियमित रूप से व्यंग्य शैली में अपने परिवेश में घटती विसंगतियो पर कलम चला रहे हैं। साठ वर्ष की उम्र मतलब सीनियर सिटीजन हो जाना। प्राचीन समय में वानप्रस्थ या आज सेवानिवृति , के रूप में समाज में साठ साला व्यक्ति की बुजुर्गियत को सम्मान भी दिया जाता है और दूसरी तरह से अपरोक्ष ही सही उसे नाकारा भी करार दिया जाता है। एक राजनैतिक दल ने पचहत्तर साल से बड़े लोगो को चुनावी टीकिट तक नही दिये। किताब का पहला ही व्यंग्य शीर्षक सठियाने की दहलीज पर है। इसके ही नाम पर किताब का नामकरण भी है। लेखक के ऐसे ही साठा सो पाठा वाले आब्जरवेशन इस व्यंग्य में पढ़ने मिलते हैं। पुस्तक में कुल ६१ व्यंग्य हैं। सभी मजेदार हैं। समाज , सरकार , राजनीति के तटस्थ निरीक्षण की अभिव्यक्ति ही प्रदीप जी की विशेषता है। फिल्में समाज का आईना होती हैं , अनेक रचनाओ में लेखक फिल्मो के पापुलर गानो या डायलाग को अपने व्यंग्य की विषय वस्तु बनाता दिखता है। कई मुहावरो और कहावतो को भी व्यंग्य को रोचक बनाने हेतु उपयोग किया गया है। विशेषता यह है कि हर व्यग्य केवल मनोरंजन नही है , उसमें गूढ़ निहितार्थ शामिल है , समस्या का समाधान बताने का लेखकीय प्रयास भी है। यह अलग बात है कि समाज इन व्यंग्य लेखों से केवल टाइम पास मनोरंजन करता हैं या पाठक कुछ शिक्षा भी लेते हैं ? किताब मजेदार , उपयोगी पैसा वसूल है।
13अप्रैल/ईएमएस