लेख

बेरोजगारी भत्ता और कर्जमाफी का लॉलीपॉप कितने दिन और कब तक ? (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

03/12/2018

किसी भी देश को मानसिक आर्थिक सामाजिक पंगु बनाना हो तो उसे मुफ्त का खाना ,,मुफ्त का पैसा और जितना अधिक मुफ्त की सुविधाएँ देना शुरूकर दो वह मानसिक आर्थिक गु,एमी की और जाएँगी। इसके अलावा वहां की शिक्षा व्यवस्था ऐसी बना दो की युवाओं की सोच कुंठित हो जावे। इसके अलावा जन्म के बाद युवा अवस्था तक आने पर उसका भविष्य अंधकारमय हो। भारत देश स्वाबलम्वी तो नहीं बन पा रहा हैं पर वह परालावलम्बी जरूर होता जा रहा हैं यानि आर्थिक मानसिक गुलामी की और निरंतर बढ़ रहा हैं। हमारे देश का युवा विदेशों में जाकर वहां की कंपनियों को बढ़ावा दे रही हैं और आर्थिक सम्पन्नता ला रही हैं पर यहाँ विपरीत स्थिति हैं।
यह बात सही हैं की भारत एक लोक कल्याणकारी राष्ट्र हैं और हमारा देश लोकोपकार के लिए विख्यात हैं। स्व पर पर कल्याण करना आवश्यक हैं। तथा पहले अविकसित देश से अब विकासशील देश की ओर बढ़ रहे हैं विगत सत्तर वर्षों में देश की आबादी भी बहुत बढ़ी हैं और सरकार की योजनाएं भी बहुत बढ़ी पर रोजगार के अवसर पर्याप्त क्यों नहीं हो पा रहे हैं। रोजगार के समुचित अवसर न होने के कारण युवा वर्ग निराशा ,हताशा और मानसिक विकारों से ग्रस्त होकर अपराध की बढ़ रहे हैं याजो काम करना चाहिए वो नहीं कर रहे हैं और इस कारण युवा वर्ग का उपयोग देश नहीं कर पा रहा हैं.इसके अनेकों उदाहरण कभी कभी देखने मिलते हैं जैसे चपरासी की नौकरी के लिए आज पोस्ट ग्रेजुएट तक आवेदन देते हैं। ठीक हैं सरकार व्यवसाय या कौशल विकास करे पर व्यवसाय में गला -काट प्रतियोगिता होने के कारण सबका व्यवसाय नहीं चलता और सरकार की कुछ नीतियों के कारण रोजगार भी बेरोजगार की स्थिति में हैं। हम कब तक बेरोजगारी भत्ता का लालच देते रहेंगे। क्या यह स्थायी समाधान हैं ?
किसानों की कर्जमाफी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों का एक प्रमुख अजेंडा हुआ करती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों का कर्ज माफ नहीं करने का हवाला देकर मोदी सरकार को किसान विरोधी बताते रहते हैं। इसी क्रम में बेरोजगार युवाओं की बढ़ती आबादी भी राजनीतिक दलों के लिए सरदर्द साबित हो रही है। इसलिए, किसान कर्जमाफी के ढर्रे पर ही अब बेरोजगारी भत्ते का भी चुनावी वादा होने लगा है।
राजस्थान में बीजेपी ने सत्ता में वापस आने पर 21 वर्ष से ऊपर के शिक्षित बेरोजगारों को 5 हजार रुपये प्रति माह बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया है। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने भी तेलंगाना के चुनाव में 3 हजार रुपये प्रति माह के बेरोजगारी भत्ते का चुनावी वादा किया है। इधर, समाजवादी पार्टी ने भी मध्य प्रदेश के युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने का ऐलान किया। उधर, आंध्र प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले चुनाव को लेकर चंद्रबाबू नायडू ने 'युवा नेस्तम' योजना के तहत शिक्षित बेरोजगारों को 1 हजार रुपये प्रति माह देने का ऐलान किया है।
रोजगारी भत्ता प्राप्त करने के लिए राज्य का निवासी होना, उम्र की सीमा (कहीं 18 से 35 वर्ष तो कहीं 21 से 35 वर्ष), रोजगार केंद्रों में पंजीकरण, पारिवारिक आय (कहीं-कहीं सिर्फ गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित), माता-पिता पर पूरी निर्भरता जैसी शर्तें रखी जाती हैं। इससे बड़ी तादाद में बेरोजगार युवा इस दायरे में आने से वंचित रह जाते हैं।
इस महगाई के युग में एक हज़ार रुपये का क्या मूल्य हैं ?यह तो ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। हर बार चुनाव के समय बेरोजारी का मुद्दा घोषणा पत्र में रखा जाता हैं और उस दिशा में कोई काम नहीं किया जाता हैं। केंद्र और राज्य सरकारें अपनी अपनी प्रशंसा के लिए और भविष्य में वोट बैंक के लिए नए प्रयोग करते हैं। जैसे स्वछता अभियान के तहत हो या गरीबों के आवास योजनाओं में किसको कितना लाभ हुआ इसकी जमीनी हक़ीक़त अलग हैं.बिजली का बिला कम करना ,गरीबों को कम दाम में अन्न देनाआदि ,इसी प्रकार किसानों के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट लागु करना ,भवान्तर योजना लागु करना ,किसान बीमा योजना में बहुत घाल मेल हैं। इनका अपना महत्व होगा या हो सकता हैं पर नियमित आमदनी का जरिया न होने से उस व्यक्ति परिवार का लक्ष्य रोटी ही रहता हैं। वह सकारात्मक या रचनात्मक सोच से दूर होता जाता हैं और कुंठित होकर अकाल ही काल के गाल में समां जाता हैं। इसके लिए नए सिरे से रोजगार के नए अवसर खोजना होंगे। उद्योग धधे ही उचित मार्ग हैं इसके लिए शासकीय और प्राइवेट कंपनियां सब वर्गों के लिए अवसर मुहैय्या कराये बेरोजगार भत्ते कब तक बांटेगे और उसमे में भ्रष्टाचार के होने की पूरी उम्मीद रहती हैं।
जैसे अभी चुनाव हुए जिनको टिकिट नहीं मिली वे बेरोजगार हो गए ,जो हार जायेंगे वे बेरोजगार हो जायेंगे पर जो भूतपूर्व विधायक ,मंत्री, सांसद हारने के बाद भी पेंशन के हक़दार रहते हुए तब भी मौज करते हैं और उस पर भी दुखी होते हैं। तब उनकी ओर नजर दौड़ाएं जिनके पास कोई आजीविका का साधन नहीं हैं। किसानों के प्रति भी स्पष्ट निति बनाये जिससे उनका असंतोष ख़तम हो और उन्हें आत्महत्या न करना पड़े।
03दिसम्बर/ईएमएस