लेख

विवाद धर्म, दर्शन या जाति का (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

04/12/2018

भारत देश वास्तव में भेड़िया धंसान होता जा रहा हैं। देश में पढ़े लिखे लोग बढ़ गए पर बुद्धिमान नहीं रहे या नहीं हैं। पता नहीं देश में इस समय बिना सिर पैर के विवाद पैदा किये जाते हैं या बनाये जाते हैं या करते हैं। आज राजनीति में कुछ प्रतिशत ही बुद्धिमान हैं पर पढ़े लिखे अधिक उन्हें भी निरक्षर की श्रेणी में रखा जा सकता हैं। अनुभवी तो बहुत कम बचे हैं। देश में बेरोजगारी बिलकुल नहीं हैं ,युवा वर्ग ,नाकारा लोग कुछ पैसों में नेताओंकी भीड़ बढ़ाते हैं और उन्हें खाना का पैकेट और यात्रा की सुविधाएं मिलने से उनकी रैली में भीड़ बढ़ाने लाखो लोग मिल जाते हैं वही दूसरी और धार्मिक आयोजनों में श्रद्धा के साथ जुड़ते हैं।
धर्म को अफीम जिसने भी कहा हैं सही कहा था.धर्म के नाम पर हजारो युध्य हुए जबकि युध्य होना चाहिए दर्शन पर हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई जैन, बुद्धआदि आदि धर्म नहीं हैं ये सब दर्शन हैं पर हम इन्हे धर्म नासमझी में कहते हैं। जी हाँ यदि यह बात बहुत बारीकी से समझ ले तो विवाद ख़तम हो जाये। दर्शन एक सोच हैं।
धर्म शब्द की निरुक्ति हैं "धरतीति धर्मः " जो संसार को दुखो को निकल कर उत्तम सुख में धारण करावे --पहुँचावे वह धर्म हैं,तथा शर्म शब्द का वाच्यार्थ सम्यग्दर्शन ,सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र ,कोई आचार्य कहते हैं --उत्तमक्षमा मार्जव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग अकिंचन्य ब्रह्मचर्य ये धर्म के अंग हैं। या धर्म हैं। कोई आचार्य चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति निद्दिट्ठो ! मोहखोहविहीनो परिणामो अप्पणो हि समो !अर्थात चारित्रधर्म को कहते हैं ,आत्मा का जो सम परिणाम हैं वह धर्म कहलाता हैं।
" जीवाणं रक्खणं धम्मो" अर्थात जीवों की रक्षा करना धर्म हैं। "सद्दृष्टि ज्ञान वृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदुः"इन शब्दों के द्वारा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र को धर्म कहते हैं। सर्वश्रेष्ठ परिभाषा -- वत्थु सहावो धम्मो यानि जिसका जो स्वाभाव की प्राप्ति में सहायक जीव को जो प्रवृत्ति एवं साधन है उन्हें भी उपचार से धर्म मन गया हैं।
"परहित सरस धर्म नहीं भाई" ."दया /करुणा धर्म का मूल हैं ".इस प्रकार धर्म की अलग अलग परिभाषाएं दी गयी हैं। अब हिन्दू शब्द की और ध्यान दे तो हिन् +दू यानी जो हिंसा से दूर हो वह हिन्दू .जैन यानि जिन +इन जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया हैं वे जैन .
धर्म का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता हैं जो ईश्वर को मानता हैं वह आस्तिक और नहीं मनाता वह नास्तिक। जैसा की राहुल गाँधी ने कहा की वे हिंदत्व को नहीं समझते तो वे कैसे हिन्दू और दूसरी ओर शूस्मा स्वराज्य बोलती हैं की क्या जनेऊ धारी ब्राह्मण का ज्ञान इतना बढ़ गया हैं की वे हिन्दू होने का मतलब उनसे पूछेंगे। राहुल गाँधी ने कहा हैं की वे हिन्दू हैं वही अमित शाह कहते हैं की कांग्रेस हमें हिंदुत्व पढ़ाएंगे और गीता की शिक्षा बताएँगे।
एक मान्यता यह हैं की जिसने इस देश भारत में जन्म लिया/हुआ वह भारतीय हैं.चाहे वह कोई भी जाति का हो या कोई धर्म को मानने वाला हो। दूसरा यह भी हैं जिनके धर्म का जन्म इस देश में हुआ हो वह भारतीय होगा। ऊपर बताएं तत्थों के आधार पर धर्म भावना प्रधान होता हैं ,जिसकी जैसी भावना होती हैं वह उस तरीके से धार्मिक क्रियाये करता हैं पर धर्म का यह एक रूप हैं। पर वास्तव में ये सब धर्म धर्म नहीं हैं ,ये सब दर्शन हैं। धर्म तो एक हैं जैसे अग्नि का स्वाभाव गर्मी देना। आप उसे सूर्य से ,चूल्हे से ,हीटर से ,गैस से ,लकड़ी जलाकर ले ताप मिलेगा। जैसे कोई व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा हैं और उसे उस स्थान से स्टेशन जाना हैं तो वह पैदल भी जा सकता हैं ,वाहन से जा सकता हैं या मार्ग अविरद्ध तो वह घूम कर जा सकता हैं पर लक्ष्य एक हैं स्टेशन जाना। विश्व वर्तमान में धर्म के नाम से व्यर्थ में लड़ा रहा हैं ,जो गलत हैं। वास्तविक लड़ाई दर्शन या फिलासफी पर हैं। जाति में भी सेंधमारी हो चुकी हैं। पहले जाति के हिसाब से कार्य और व्यापार होता था अब आर्थिक दौड़ के कारण कोई भी जाति का व्यक्ति नाइ या सैलून खोलता हैं ,कोई उच्च वर्ग के लोग सिलाई का काम करते हैं ,,कोई कोई जूता की दुकान खोले हैं अब उन्हें जातिगत पहचानेगे या व्यापार से और राजनीती में तो कॉकटेल हो गया।
धर्म पर लड़ना बेमानी हैं ,दर्शन पर विवाद करना उचित हैं और जाति का अब इस दौर में कोई अर्थ नहीं हैं ,यदि किसी की माँ विदेशी हैं और पिता भारतीय हैं तो उसकी औलाद भारतीय मानी जाएगी। हमारे कई देश भक्त नेता जो अन्य जाति के हैं और उन्होंने विजातीय शादी की हैं और उनकी संतान पिता के धर्म पर जाएगी या माँ के धर्म पर या जाति पर या दर्शन पर।
वर्तमान में चुनाव के माहोल में ऐसे प्रसंग लाकर मूल समस्याओं से जनता का मन विचलित करना/भटकाना और विवाद कर समय बर्बाद करना। जबकि चाहिए हम देश ,समाज ,परिवार और व्यक्ति के लिए क्या विकास का कार्यक्रम कर रहे हैं। उन्हें लाओ
इस देश में शिक्षा अधिक ,ज्ञानवान शून्य
पढ़े लिखे बहुत अनुभवहीन कम
जब तक मूल को नहीं समझोगे
पत्तों पर कितना भी सिंचन करो
निर्थक प्रयास
दर्शन पर चिंतन करे
धर्म और जाति बिखराव का मार्ग हैं और रहेगा
इससे नहीं होना हैं देश का /विश्व का उद्धार
सोच बदलो दृष्टि बदलो मति सुधारो
तब गति मिलेगी अच्छी।
04दिसम्बर/ईएमएस