लेख

(विचार-मंथन) पश्चिम बंगाल में हिंसा वाली गंदी सियासत की हिस्सेदारी (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

12/06/2019

पश्चिम बंगाल में हिंसा का अपना एक अलग इतिहास है, जो कि कहीं न कहीं सियासी गलियारे से निकलता है और सत्ता के ईद-गिर्द घूमता नजर आता है। इसमें दो राय नहीं कि हिंसा को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए और न ही इसे सही ठहराया जाना चाहिए। बावजूद इसके क्या किया जाए क्योंकि गंदी राजनीति जहां होगी वहां हिंसा को भी सही ठहराने वाले लोग मिल जाएंगे। फिलहाल हिंसा को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जिसमें भाजपा के लोग कहते हैं कि हिंसा सत्तारुढ़ तृणमूल के कारण फैल रही है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि यह हिंसा भाजपा के लोग फैला रहे हैं, ताकि लाशों पर राजनीति कर सकें। बहरहाल पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा के इस दौर को किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। यह वाकई निरा राजनीतिक हिंसा है, जिसके लिए सीधे तौर पर राजनीतिक दलों और कथित नेताओं पर कानूनी शिकंजा कसा जाना चाहिए। हिंसा के लिए गंदी राजनीति को जिम्मेदार ठहराने का एक मात्र कारण यही है कि इन नेताओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर जिस तरह के बयान दिए जाते हैं उससे हिंसा भड़कने का खतरा सदा बना रहता है। राजनीति की खातिर वर्ग विशेष को भावनात्मक तौर पर भड़काया जाता है, वहीं धर्म और आस्था के नाम पर भी लोगों को भड़काने का काम बहुतायत में किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ गृह मंत्रालय इस हिंसा पर गहरी चिंता जाहिर करता है और एडवाइजरी जारी करते हुए कहता है कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार नागरिकों में विश्वास बनाए रखने में विफल रही है। इस एडवाइजरी का जवाब देते हुए पश्चिम बंगाल के प्रमुख सचिव गृह मंत्रालय को पत्र लिखते हैं और दावा करते हैं कि राज्य में हालात नियंत्रण में हैं, लोगों के विश्वास खोने जैसी कोई बात नहीं है। इस पर भी राजनीति शुरु हो जाती है और बयान आने लग जाते हैं कि हिंसा के बहाने केंद्र राज्य सरकार को बर्खास्त करना चाहती है। इस कयास के पीछे जो कारण काम कर रहा है वो है पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी का सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करना और राज्य के हालात पर 48 पेज की लंबी रिपोर्ट सौंपा जाना। यह अलग बात है कि खुद राज्यपाल इस भेंट को शिष्टाचार वाली मुलाकात बताते हैं, लेकिन राजनीतिज्ञ तो इसे विशेष मायने में देख रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस घटनाक्रम से भी घबराई हुई प्रतीत हो रही हैं, इसलिए वो कहती हैं कि वो किसी भी कीमत पर अपनी सरकार को गिराने नहीं देंगी। यह तो सभी जानते हैं कि अब उनके कहने से क्या होगा, क्योंकि केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार जो है। उनके लिए राष्ट्रपति शासन लगाना कोई बड़ी बात नहीं होगी और एक माकूल वजह भी इस समय मौजूद है और वह यह कि पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ चुकी है, इस कारण यह कदम उठाया जाना जरुरी हो गया है। विचारणीय है कि गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आंतरिक सुरक्षा को लेकर उच्चस्तरीय बैठक कर चुके हैं, इसलिए अब जो भी निर्णय लिया जाएगा वह किन्तु-परन्तु से पूरी तरह परे होगा। इस समय पश्चिम बंगाल की ममता सरकार को भी इस बात का एहसास हो चुका है कि उसके पैरों तले की जमीन खिसक चुकी है और वह कभी भी धराशायी हो सकती है। इसलिए तमाम लोगों को अनावश्यक लग रहे बयान भी ममता बनर्जी द्वारा दिए जा रहे हैं। ममता सरकार की पूरी कोशिश है कि जो साख लोकसभा चुनाव में गिर गई है उसे विधानसभा चुनाव में वापस पाया जाए, इसलिए इस तरह की हिंसा पर वो न तो ज्यादा ध्यान देना चाहती हैं और न ही उस पर बयान देती हैं। वहीं पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी मलय कुमार कहते दिखते हैं कि 'चुनाव बाद जरुर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा हिंसा की गई, लेकिन इसे रोकने के लिए अधिकारियों द्वारा बिना किसी देरी के कार्रवाई की गई।' एक तरह से प्रदेश सरकार को सही ठहराने और प्रदेश के हालात काबू में होने व कानून व्यवस्था दुरुस्त होने का दावा भी कर दिया जाता है। यहां हिंसा से पहले के दृष्य को भी देखा जाना चाहिए जो कि लोकसभा चुनाव को साधने की गरज से तैयार किया गया था। यह वही समय था जबकि भाजपा खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पश्चिम बंगाल को अपने हक में करने के लिए किसी भी कीमत पर मथना चाहते थे। तब इसके लिए भाजपा ने चुनावी सभाएं करने और रैली निकालने की इजाजत राज्य सरकार से मांगी थी, लेकिन तब यह कहते हुए मांग नहीं मानी गई कि इससे राज्य की कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है। मामला अदालत ले जाया गया, जहां से बीच का रास्ता निकाला गया और शर्तों के साथ रैली और सभाएं करने का भाजपा को मौका मिल गया। कुल मिलाकर पूरी तरह न सही लेकिन अंतत: भाजपा को पश्चिम बंगाल में अपने पैर जमाने और पसारने का उचित अवसर भी मिल ही गया। इसी के साथ हिंसा की घटनाएं भी सामने आने लग गईं। इसलिए विचारणीय हो जाता है कि जिन्होंने सियासी हिंसा नहीं होने का दावा किया था क्या उन पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? जिन्होंने शांति व्यवस्था और कानून का पालन करते हुए चुनाव प्रचार करने और जीत के लिए कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं करने का वचन दिया था, क्या वो भी कानून के दायरे में नहीं लाए जाने चाहिए? आखिर यह हिंसा राजनीति प्रेरित क्यों नहीं है, जबकि मरने वाला कोई न कोई पार्टी का सदस्य या कार्यकर्ता बतलाया जा रहा हो? कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल की हिंसा भले ही सियासी दांव-पेंच का हिस्सा हो, लेकिन यदि इस समय ममता सरकार को बर्खास्त कर दिया गया तो इसका कहीं न कहीं फायदा तृणमूल को ही अगले विधानसभा चुनाव में होगा, क्योंकि तब वो एक शहीद की तरह जनता के बीच में जाएंगी और तब जनता की सहानुभूति उनके साथ होगी। इसलिए राजनीति से हिंसा को अलग किया जाना चाहिए और फिर कोई कदम उठाया जाना चाहिए, क्योंकि सरकारें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन नुक्सान तो अंतत: आमजन का ही होना है।
12जून/ईएमएस