लेख

(विचार-मंथन) राजनीतिक चश्में वाली देशभक्ति से सावधान रहने की आवश्यकता (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान/ईएमएस)

14/03/2019

देश के राजनीतिक पटल पर पिछले कुछ सालों में जो अनावश्यक बदलाव देखने को मिले हैं उनमें अपने ही तरह की तथाकथित वाली देशभक्ति और व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष के पीछे चलने को बाध्य करने वाली सियासी सोच का दबदबा प्रमुख है। मुट्ठीभर लोगों ने इसे अपना कर्तव्य मान देशभर में कोहराम मचाने का काम किया। इसके चलते देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों, सम्मानित कलाकारों, इतिहासकारों व अन्य विभिन्न क्षेत्र की हस्तियों को देश में असहिष्णुता नजर आई। तब असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद करने का काम भी जोर-शोर से किया गया। वहीं इस पर सवाल उठाने वालों को अपनी तरह से खामोश करने का काम भी खूब हुआ, यहां तक कि उन्हें भी देशद्रोहियों की पंक्ति में खड़े करने वाले सर्टिफिकेट बांटे जाने लगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असफल प्रहार होते देखे गए। इसके साथ ही भीड़ द्वारा उन लोगों को भी निशाने पर लेने का काम बहुतायत में किया गया जो मौजूदा सरकार या सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ बयान देते नजर आए। इसमें कुछ मीडियाकर्मी भी चपेट में आते दिखे। एक प्रकार से देश में जिसका राज उसकी तूती बोलती नजर आई, जिसका माकूल विरोध विपक्ष भी नहीं कर पाया। हालात यहां तक पहुंचे कि जिन्होंने भी सरकार और उसके फैसले समेत योजनाओं की ओलोचना करने का दुस्साहस किया उन्हें देश विरोधी होने का प्रमाण-पत्र थमा दिया गया। इसी के चलते हिंसा पर उतारु भीड़ ने खान-पान, रहन-सहन, पहनावे और बोल-चाल समेत क्षेत्रवाद के नाम पर इंसानी खून बहाने से भी गुरेज नहीं किया। इसे देखकर अब कहा जा रहा है कि नफरत फैलाने वाली राजनीति से सतर्क रहें और प्रेम व आपसी भाईचारा बनाने वालों के हाथों को मजबूत करें, क्योंकि इससे देश मजबूत होता है, जबकि नफरतों से हमारी एकता में दरार आती है और देश कमजोर होता है। इन्हीं सब मुद्दों को लेकर जब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने गुजरात में रैली के दौरान अपनी राय रखी तो उपस्थित लोगों को उम्मीद बंधी कि अभी भी देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाली युवा पीढ़ी हमारे बीच मौजूद है, बस उसे आगे लाने की आवश्यकता है। यह पीढ़ी देश और दुनिया को बतला सकती है कि हमारी अनेकता में एकता वाली ताकत से कोई जीत नहीं सकता है। इसमें ही विकास की धारा भी छुपी हुई है। यह पीढ़ी बताती है कि वर्तमान समय में देश के लिए क्या सही है और क्या गलत है। इसी संदर्भ में प्रियंका गांधी ने देश के युवा वर्ग का आव्हान किया और उन्हें जागरुक होते हुए अन्य मतदाताओं को भी जागरुक करने का जो मंत्र दिया वह वाकई काबिले जिक्र हो गया है। बहुत ही कम लेकिन सारगर्भित शब्दों में प्रियंका ने मोदी शासनकाल की खामियों और उनकी पार्टी के इरादों को लोगों के सम्मुख रख कर बतला दिया कि वो वाकई राष्ट्रप्रेमी शहीद देशभक्त राजनीतिज्ञों के खानदान से हैं, जिन्हें अपने देश और देशवासियों की उतनी ही फिक्र है जितनी कि किसी लोकतांत्रिक देश के सफल नेता या नेत्री को होनी चाहिए। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2019 की तारीखों का ऐलान होने के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ गुजरात में एक बड़ी रैली करके उन्हें अपने ही घर में घेरने का काम किया है। चूंकि बतौर कांग्रेस महासचिव प्रियंका की यह पहली रैली थी अत: उन्हें भी सभा को संबोधित करने को कहा गया, जिस पर उन्होंने साफ कहा कि उनका इरादा भाषण देने का नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने दिल की बात लोगों के सामने रखी, जिसे सुनकर अहसास हुआ कि वाकई राजनीतिक बदलाव के इस दौर में ऐसे ही नेताओं की आवश्यकता है जो लोगों को लोकतंत्र को मजबूत करने की बात करते हों, बिना विरोधी का नाम लिए हुए अपनी बात रखते हों और देशहित में क्या हो सकता है, देशभक्ति क्या चीज होती है यह भी अच्छी तरह से समझा सकते हों। कुल मिलाकर यह वह समय है जबकि देश के तमाम मतदाताओं को राजनीतिक चश्में वाली देशभक्ति से सावधान रहना है, क्योंकि इससे वो अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश करेंगे। राष्ट्रभक्तों के नाम पर आपसी बैमनस्य फैलाने वालों को स्थापित कर दिया जाएगा जो किसी न किसी को अपने निशाने पर लेते रहेंगे। इससे होगा यह कि समाज में विघटन की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इस बंटे हुए समाज से कुछ पार्टियां लाभांवित हो सकती हैं, लेकिन इससे देशहित सधता हो ऐसा कतई नहीं है। इसलिए जो जहां है यदि वह अपना काम पूर्ण ईमानदारी से कर रहा है और वह कार्य कहीं से भी गैर कानूनी नहीं है तो उससे बड़ा देशभक्त तो कोई हो नहीं सकता। इसके लिए किसी और के सर्टिफिकेट की जरुरत भी नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक तौर पर भी इसे स्थापित करने की आवश्यकता है।
ईएमएस/14/03/2019