लेख

मध्यप्रदेश में जबरन थोपे गये उपचुनाव 2020 (लेखक - - रहीम खान/ईएमएस)

17/10/2020


- ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर टिका सिंधिया का भविष्य
- महल से कांग्रेस हुई आजाद और भाजपा हुई कैद
मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में बड़े षडयंत्र के साथ विधानसभा में जनता के द्वारा चुनी गई सरकार को गिराने से उत्पन्न राजनीतिक संकट से बाहर निकलने के लिये होने वाले आगामी 03 नवम्बर को 28 विधानसभा सीट में से 25 सीटें ऐसी है जहां कि वर्तमान कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने 6 माह पूर्व पार्टी से त्यागपत्र देकर भाजपा में शामिल हो गये। वर्ष 2018 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने वाले बड़ी सौदेबाजी के शिकार 25 पूर्व विधायक अब भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतर कर फिर से विधायक बनने के लिये प्रयासरत है।
मध्यप्रदेश में हुई बगावत के जनक कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के इशारे पर पहले ग्वालियर चंबल संभाग के निर्णय कांग्रेस को लेने पड़ते थे। भोपाल एवं दिल्ली से वही होता था जो सिंधिया चाहते थे। अब यह हालत भाजपा के साथ होगी। सिंधिया के जाने से जहां कांग्रेस महल से आजाद हो गई वहीं अब भाजपा महल में जाकर कैद हो गई। इसका प्रमाण है कि ग्वालियर चंबल संभाग की 16 सीटें पर वहीं उम्मीदवार भाजपा ने उतारें जिसे सिंधिया चाहते थे। इन सीटों का चुनाव परिणाम ही इनके राजनीतिक भविष्य और प्रभाव को निर्धारित करेगा।
कांग्रेस ने बहुत दिया
सिंधिया और उनके चेले चपाटी 22 विधायकों ने कांग्रेस से बगावत करने के जो तर्क दिये उसमें दूरे दूर तक कोई मजबूत आधार नहीं है। क्योंकि सिंधिया परिवार की विरासत की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनके परिवार की प्रतिष्ठा के अनुरूप वह सब दिया जो एक सामान्य कांग्रेस नेता को बर्षो तक दरी फट्टा उठाने के बाद भी नहीं मिल पाता। कांग्रेस से चार बार सांसद बने फिर केन्द्र में मंत्री भी रहे, साथ ही कांग्रेस पार्टी की सबसे बडी समिति सीडब्लूसी के सदस्य होने के साथ इनकी बातों को पार्टी ने कभी उपेक्षित नहीं किया। किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने ही जूनियर से गुना लोकसभा सीट पर चुनाव पराजय का सामना करने के बाद इनके भीतर अपने भविष्य को लेकरजो राजनीतिक भय उत्पन्न हुआ शायद उसमें ही इनको भाजपा को जाने के लिये मजबूर कर दिया। पराजय की पीड़ा को ये सहन नहीं कर पाये। ये कहना कि कांग्रेस के भीतर उनकी उपेक्षा हो रही थी यह एक प्लांटेंड खबर है। कमलनाथ, दिग्विजय के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव पार्टी के भीतर उनका ही था।
सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत करके अपने परिवार के पूर्वजों के नियमों को ही आगे बढ़ाया है। क्योंकि उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया ने भी कांग्रेस सरकार गिराने में योगदान दिया था। उसके बाद उनके पिता ने भी एक समय कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनायी थी। इसलिये ज्योतिरादित्य सिंधिया ने नया कुछ नहीं किया सिवाय इसके कि वह अपने साथ कांग्रेस के 22 विधायकों को लेकर चले गये। जिसके कारण 5 साल के लिये चुनी गई कांग्रेस सरकार को 15 माह में ही सत्ता से बाहर होना पड़ा। सत्ता के लालची के रूप में उभरी भाजपा ने प्रदेश में सरकार तो बना ली परन्तु आगे का रास्ता उनका कोरोना महामारी एवं अन्य कारणों से जितना जटिल है यह सब देख रहे है। इतना ही नहीं भाजपा की इस बगावत को जनता में भी शतप्रतिशत प्रतिसाद नहीं मिल रहा है। ये अलग बात है कि भाजपा अपनी बात को रखने के लिये अनाप शनाप तर्क दे पर जनमानस में वह प्रभावी नहीं है।
क्षेत्रीय नेता से ऊपर नहीं
सिंधिया को भले ही प्रदेश स्तर का नेता उनके लोग बोलते रहे हो पर वास्तविकता यह है कि वह ग्वालियर चंबल संभाग के क्षेत्रीय नेता ही बने रहे प्रदेश के दूसरे जिलों में उनका कोई प्रभाव नहीं रहा। मुट्ठी भर समर्थक हर बड़े राजनेता के प्रदेश के कोने कोने पर होते है उस आधार पर उनको प्रदेश का नेता कहना उचित नहीं है। 2018 के विधानसभा चुनाव में ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलने की वजह तत्कालिन भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। सिंधिया परिवार की राजनीतिक पकड़ ग्वालियर जिले में ही कमजोर होने का कारण था कि पहले उनके पिता फिर उसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी लोकसभा में अपनी सीट बदलनी पड़ी। सिंधिया का अगर प्रभावी राजनीतिक व्यक्तित्व होता तो कांग्रेस को 2003, 2008 व 2013 में ग्वालियर संभाग में निराशाजनक चुनावी परिणाम का सामना नहीं करना पड़ता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्वालियर शहर के भाजपा नेता जयभानसिंह पवैया, प्रभात झा एवं खुद शिवराज सिंह चैहान पानी पीकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोसते रहे और अनेक तरह के गंभीर आरोप भी लगाये अब जब यही लोग सिंधिया के साथ मंच साझा कर रहे है तो जनता भी अचरज में है और 2018 में इन कल के कांग्रेसी और आज के भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ कार्यकर्ताओं को भी चुनाव प्रचार कार्य में संकोच का सामना करना पड़ रहा है।
वो 16 सीटें -
सिंधिया ने भाजपा के साथ मिलकर ग्वालियर चंबल संभाग की जिन 16 सीटों पर बगावत कराया और वहां के तत्कालीन विधायकों को एक बड़े सौदेबाजी के साथ त्यागपत्र देने के लिये मजबूर किया वह सब एक योजनाबद्ध कार्ययोजना का हिस्सा लगता है। जिसको तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री कमलनाथ या पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह समझ नहीं पाये या फिर यू कहे कमलनाथ को किसी ने इतना विश्वास दिला दिया कि उन्होंने बड़ी बगावत की तरफ ध्यान ही नहीं दिया।
16 सीटों पर 2018 के चुनाव परिणाम कुछ इस तरह से थे सीटे क्र. 12 मेहेगांव में कांग्रेस उम्मीदवार, सीट क्रमांक 13 गोहद (एससी) यहां पर कांग्रेस के गनवीर जाटव को 62981, भाजपा के लालसिंह आर्य को 38992, बसपा के डाॅ. जगदीप सिंह सागर को 15477 मत मिले। सीट क्रमांक 32 अशोक नगर में कांग्रेस के जसपालसिंह जज्जी को 65750, भाजपा के इंजी. लड्डुराम कोरी को 56020, बसपा के बालकृष्ण को 9549 मत मिले। सीट क्रमांक 34 मुंगावली में कंाग्रेस के वृजेन्द्र सिंह यादव को 55346, भाजपा के डाॅ. कृष्णपाल सिंह को 53210, बसपा के कमलसिंह डांगी को 14202 मत मिले। सीट क्रमांक 28 बमोरी में कांग्रेस के महेन्द्र सिंह सिसोदिया 64598, भाजपा के बृजमोहन सिंह आजाद 36678, बसपा के डाॅ. ओमप्रकाश त्रिपाठी 7176 एवं निर्दलीय कन्हैया लाल अग्रवाल 28428 मत मिले। सीट क्रमांक 4 जौरा में कांग्रेस के बनवारीलाल शर्मा को 55339, बसपा के मनीराम धाकड़ को 41014, भाजपा के शुभेन्द्र सिंह राजोधा को 37998, सीट क्रमांक 5 सुमावली में कंाग्रेस के अदलसिंह कंसाना को 65455, भाजपा के अजाबसिंह कुशवाह को 52145, बसपा के मानवेन्द्र सिंह गांधी को 31331, सीट क्रमांक 8 मुरैना में कांग्रेस के रघुराज सिंह कंसाना को 68965, भाजपा के रूस्तम सिंह को 48116, बसपा के बलवीर सिह दनौतिया को 21149, सीट क्रमांक 7 दीमानी में कांग्रेस के गिर्राज सिंह दंडोतिया 69597, भाजपा के शिवमंगल सिंह तोमर को 51120, बसपा के छतरसिंह तोमर को 14401, सीट क्रमांक 8 अंबाह (एससी) से कांग्रेस के कमलेश जाटव को 37343, निर्दलीय नेहा किन्नर को 29796, भाजपा के गब्बर सिखरवार को 29715, बसपा के सत्यप्रकाश सकरवार को 22179, सीट क्रमांक 15 ग्वालियर में कांग्रेस के प्रद्युम्नसिंह तोमर को 92055, भाजपा के जयभानसिंह पवैया को 71011, बसपा के इंजीनियर सावित्री कटारिया को 4596, सीट क्रमांक 16 ग्वालियर पूर्व में कांग्रेस पूर्व के मुन्नालाल गोयल को 90133, सतीश सिंह सिकरवार भाजपा को 72214, बसपा के भूरिया सिंह को 5446, सी क्रमांक 19 डबरा (एससी) पर कांग्रेस की इमरती देवी को 90598, भाजपा के कप्तान सिंह सहसारी को 35152, बसपा के पी.एस. मंडलई को 13155, सीट क्रमांक 21 भांडेर (एससी) पर कांग्रेस के राकेश संतराम सरोनिया को 73578, भाजपा की रजनी प्रजापति को 33682, एवं बसपा की किरण बाला को 2642, सीट क्रमांक 23 करेरा (एससी) में कांग्रेस के जसवंत जाटव को 64201, राजकुमार ओमप्रकाश खटिक को 49377, बसपा के प्रगतिलाल जाटव को 40026 मत मिले, सीट क्रमांक 24 गोहारी में कांग्रेस के सुरेश धाकड़ को 60654, बसपा के कैलाश कुशवाह को 52737, भाजपा के प्रहलाद भारती को 37268 मत मिले। सीट क्रमांक 12 मेहगांव में कांग्रेस के ओपीएस भदौरिया को 61560, भाजपा के राकेश शुक्ला को 35746, बसपा के रणजीत सिंह 28160 मत लेने में सफल रहे थे।
बहरहाल 2018 की ये 16 सीटे जहां कांग्रेस के उम्मीदवारों ने सफलता अर्जित की थी। इन सीटों पर बसपा ने भी चुनाव लड़ा पर 2-3 सीटों को छोडकर वह ज्यादा प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पायी। यहां की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कांग्रेस ने नये रणनीति के साथ यहां पर कुछ सीटों पर भाजपा से आये नेताओं को ही उम्मीदवार बनाया है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा पूरी तरह कांग्रेस से भाजपा में आये पूर्व विधायकों को सिंधिया के कहने पर निर्भर हो गई है। 10 नवम्बर को चुनाव परिणाम में पता लगेगा इन 16 सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन कितना प्रभावी रहा और उस पर ही सिंधिया के आगे का भविष्य निर्धारित होगा। यह सही है कि पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के लिये जितने निकट भाजपा है उतनी कांग्रेस नहीं। इसके बावजूद कांग्रेस इन 16 सीटों पर बसपा के चुनाव लड़ने से उत्पन्न राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान मे ंरखकर हर सीट पर कड़ी टक्कर देने के लिये प्रयासरत है। जहां तक भीतरघात का प्रश्न है इसकी संभावनाएं कांग्रेस भाजपा दोनों में बनी हुई है।
.../राजेश/ 17 अक्टूबर 2020