लेख

अगला कदम...समान नागरिक संहिता (लेखक-मुस्ताअली बोहरा / ईएमएस)

02/12/2019


अजेण्डे पर आगे बढती मोदी सरकार
तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और अयोध्या मंदिर के बाद अब आगे क्या होगा, इसकी तस्वीर धीरे धीरे सामने आ रही है। मोदी सरकार का अगला कदम यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करने का है। कॉमन सिविल कोड के बाद केन्द्र की भाजपा सरकार एनआसी को पूरे देश में लागू करेगी। समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट भी वक्त-वक्त पर टिप्पणी कर चुका है। हालांकि, पहले कार्यकाल से ही केंद्र की बीजेपी सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की कोशिश कर करती रही है। तीन तलाक और 370 की तरह यूनिफॉर्म सिविल कोड को भी विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा था लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दरअसल, राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं है। इसे भी राजनीति से प्रेरित इसलिए माना जा रहा है क्योंकि मोदी सरकार के अब तक फैसलों से यही परिदृश्य उभरकर सामने आ रहा है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370, नोटबंदी आदि की तरह ही समान नागरिक संहिता को भी छदम देशभक्ति से जोडकर देखा जाएगा। आपको बता दें कि देश में तमाम मामलों में यूनिफॉर्म कानून हैं, लेकिन शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर अभी भी फैसला पर्सनल लॉ के हिसाब से फैसला होता है। यह मसला ऐसे समय में उठा है जब केंद्र की मोदी सरकार तीन तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसला ले चुकी है। बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहले से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत करते आए हैं।
--एजेंडे पर आगे बढती मोदी सरकार
दरअसल, केन्द्र की सत्त्सीन सरकार अपने उस एजेण्डे पर आगे बढ रही है जिसका उसने वादा किया था। केन्द्र सरकार पूरे देश में एक संविधान लागू करना चाहती है यानि हर शख्स के लिए एक ही कानून फिर चाहे वह किसी भी मजहब का हो। तीन तलाक को खत्म कर केन्द्र सरकार ने समान नागरिक संहिता की ओर कदम बढा दिए हैं। इसके बाद राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानि एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा जो अभी असम में लागू है। समान नागरिक संहिता के लिए ठीक वैसा ही माहौल तैयार हो रहा है जैसा पहले तीन तलाक और फिर अनुच्छेद 370 को लेकर हुआ था।
--ये है समान नागरिक संहिता
समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है विवाह, तलाक, संपत्ति बटवारे, उत्तराधिकार और बच्चा गोद लेने जैसे मामलों में सभी लोगों के लिए एक जैसे ही नियम। यानि जाति-धर्म अथवा परंपरा के आधार पर किसी को कोई रियायत नहप मिलेगी। यहां बता दें कि देश में धर्म और परंपरा के नाम पर अलग नियमों का प्रचलन है। जैसे किसी समुदाय में पुरुषों को एक से ज्यादा शादी करने की इजाज़त है तो कहप-कहप विवाहित महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देने की परंपरा है। ऐसे मामलों में पर्सनल लॉ के हिसाब से निर्णय लिया जाता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रक्रिया के तहत तलाक के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है लेकिन महिला को 4 महीने 10 दिन तक यानी इद्दत पीरियड पूरा होने तक इंतजार करना होता है। हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत हिंदू कपल शादी के साल भर बाद तलाक की अजब आपसी सहमति से डाल सकते हैं। अगर पति को असाध्य रोग हो या वह संबंध बनाने में अक्षम हो तो शादी के तुरंत बाद तलाक की अजब दाखिल की जा सकती है। क्रिश्चियन कपल शादी के दो साल बाद तलाक की अजब दाखिल कर सकते है उससे पहले नहप। 1954-55 में विरोध के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हिन्दू कोड बिल लाए। इसके आधार पर हिन्दू विवाह कानून और उत्तराधिकार कानून बने। मतलब हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के लिए शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे नियम संसद ने तय कर दिए। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों को अपने-अपने धार्मिक कानून यानी पर्सनल लॉ के आधार पर चलने की रियायत दी गई। ऐसी छूट नगा सहित कई आदिवासी समुदायों को भी हासिल है, वो अपनी परंपरा के हिसाब से चलते हैं। यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद भी निकाह या विवाह की रस्म मौलवी या पंडित अदा करवाते रहेंगे, ये परंपराएं जारी रहेंगी।
--तर्क और वितर्क
यूनिफॉर्म सिविल कोड के विरोध में कहा जा रहा है कि ये सभी धर्म़ों पर हिंदू कानून को लागू करने की तरह है। मुस्लिम समुदाय के लोग तीन तलाक की तरह इस पर भी तर्क देते हैं कि वह अपने धार्मिक कानूनों के तहत ही मामले का निपटारा करेंगे। अभी कुछ धर्म़ों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। दूसरी तरफ कॉमन सिविल कोड के समर्थकों का कहना है कि सभी के लिए कानून एक समान होने से देश में एकता बढ़ेगी।
--मना कर चुका है लॉ कमीशन
शाह बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, विवादित विचार धाराओं से अलग एक कॉमन सिविल कोड होने से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा। सरला मुदगल केस में कोर्ट ने कहा था, जब 80 फीसदी लोग को पर्सनल लॉ के दायरे में लाया गया है कि तो सभी नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड न बनाने का कोई औचित्य नहप है। अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई तलाक कानून में बदलाव की मांग वाली याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था, देश में अलग अलग पर्सनल लॉ की वजह से भ्रम की स्थिति बनी रहती है। सरकार चाहे तो एक जैसा कानून बना कर इसे दूर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने लॉ कमीशन को मामले पर रिपोर्ट देने के लिए कहा था। लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यूनिफार्म सिविल कोड और पर्सनल लॉ में सुधार पर सुझाव दिए। लोगों से बात की और कानूनी, सामाजिक स्थितियों की समीक्षा के आधार पर लॉ कमीशन ने कहा कि अभी समान नागरिक संहिता लाना मुमकिन नहप है। इसकी बजाय मौजूदा पर्सनल लॉ में सुधार किया जाना चाहिए। मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता में संतुलन बनाया जाए। पारिवारिक मसलों से जुड़े पर्सनल लॉ को संसद कोडिफाई करने पर विचार करे। सभी समुदायों में समानता लाने से पहले एक समुदाय के भीतर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में समानता लाने की कोशिश हो।
बहरहाल, तीन तलाक, अयोध्या मंदिर, अनुच्छेद 370 के बीच देश से कई अहम मसले गायब हो गए जो लोकसभा चुनाव के दौरान चर्चाओं में थे। बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, शिक्षा-स्वास्थ्य, गरीबी आदि मुददों की बजाए कॉमन सिविल कोड, एनआरसी और जनसंख्या नियंत्रण कानून बडा मुददा बनकर उभरेगा।
02दिसम्बर/ईएमएस