लेख

(लोहिया जयंती 23मार्च पर विशेष) समाज के सवालो से टकराने वाले एकमात्र नेता थे डाक्टर लोहिया (लेखक- रामस्वरूप मंत्री / ईएमएस)

22/03/2019


समानता और गैर बराबरी के खिलाफ निरंतर लड़ने वाले अथक योद्धा डॉ राम मनोहर लोहिया की आज जयंती है। गांधी और लोहिया भारतीय समाज को गहरे तक प्रभावित करने वाले दो राजनेता। गांधी अपने को राजनेता मानते या नहीं, पक्के से नहीं कहा जा सकता किन्तु थेवे राजनेता। दोनों अपरिग्रही। गांधी "साधन और साध्य"की पवित्रता के दृण आग्रही। अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। अपनी नैतिक शक्ति के सहारे राजकीयसत्ता के सामने सीना तान कर खड़े होते हैं। लोहिया, आजादी की लड़ाई तक गांधी के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के सदस्य के होकर कार्य करते हैं।अतः उनका असली रूप स्वतंत्र भारत में समाजवादी नेता के रूप सामने आता है। दोनों नए- नए शब्द गढ़ने में माहिर। दोनों नए तरह के समाज निर्माण को व्याकुल।गांधी का स-विनय अवज्ञा, लोहिया का सिविल नाफरमानी हो जाता है। गांधी के स- विनय अवज्ञा में ईश्वर में पूर्ण विश्वास अनिवार्य तत्व है ऐसे में नास्तिक लोहिया कोसिविल नाफरमानी शब्द गढ़ना पड़ता है।
लोहिया भारतीय समाज के सामने सदियों से खड़े सवालों से टकराते हैं। उनकी व्याख्या करते हैं। सोचने / देखने का नया नजरिया सामने रखते हैं। " हिन्दू बनाम हिन्दू " , "हिन्दू और मुसलमान ", "द्रोपदी या सावित्री" ऐसी ही व्याख्यायें हैं। वे बार बार हजार साल में सड़े दिमाग से उबरने की बात करते हैं। उसे बदलने की बात करते हैं। संभवसमानता की चाहत, उन्हें "अंग्रेजी हटाओ", "दाम बांधो" , विशेष अवसर की वकालत करवाती है। सौ में पावे पिछड़ा साठ के दायरे में सम्पूर्ण महिला और मुस्लमान वर्ग कोशामिल करते हैं। संसद में पहुँच कर उसे जीवंत करते हैं। एक गरीब समाज में फिजूल खर्ची और दिखावे को पाप घोषित कर सत्ताधारी वर्ग को बैकफुट पर लाते हैं।सांस्कृतिक पहचान राम -कृष्ण -शिव की नई व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। विदेश नीति को नई दिशा देने को हिमालय बचाओ, रामायण मेला आयोजित करने की जरुरतमहसूस करते हैं।
कई भाषाओं पर अधिकार रखने के बाद भी लोहिया आजाद हिन्दुस्तान में सिर्फ हिंदी में बोलते हैं और इसकी राजनीतिक कीमत चुकाते हैं, किन्तु वे राजनीतिक फायदे केलिए, सिद्धांत से समझौता नहीं करते। वे अपने कार्यकर्ताओं की कमियां पहचान कर ही -" पथ को देखो, पथिक को मत देखो " का आव्हान करते हैं। उन्हें "अनुपात कीसमझ" का सूत्र समझाते हैं।
1952 -1957 -1962 में मिली पराजय के कारण खोजते हुए एक नई थ्यौरी "गैर कांग्रेसवाद " सामने लाते हैं। यह शब्द राजनीति की दिशा -दशा बदल देता है। ये वोटविभाजन रोकने की रणनीति मात्र थी, कोई राजनीतिक सिद्धांत नहीं। उनके बाद कोई ऐसा अद्भुत शब्द नहीं गढ़ पाया। इसका विस्तार "गैर कांग्रेस -गैर भाजपावाद" के रूपमें आगे बढ़कर तीसरे मोर्चे के अस्तित्व को नैतिक आधार प्रदान करता है।
लोहिया ने अपरिग्रह को जीकर बताया। शादी नहीं की। उनका कोई घर नहीं था, किराए का भी नहीं। पार्टी कार्यालय, पार्टी के सांसदों का निवास और भ्रमण के दौरानकार्यकर्ताओं के घर उनका घर होता था। जबानी के दिनों में खूब सिगरेट पीते हैं। देर तक सोते हैं। फक्कड़ जीवन जीते हैं। लेकिन अपने विचारों से गहरे तक प्रभावितकरते है।
लोहिया के समाजवादी आंदोलन की संकल्पना के मूल में अनिवार्यत: विचार और कर्म की उभय उपस्थिति थी- जिसके मूर्तिमंत स्वरूप स्वयं डॉ॰ लोहिया थे और आजन्म उन्होंने‘कर्म और विचार’ की इस संयुक्ति को अपने आचरण से जीवन्त उदाहरण भी प्रस्तत किया।
अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले तमाम व्यक्तित्वों की भांति लोहिया प्रभावित भी थे। वे जेल भी गए और ऐसी यातनाएं भी सहीं। आजादी से पूर्वही कांग्रेस के भीतर उनका सोशलिस्ट ग्रुप था, लेकिन पंद्रह अगस्त सैंतालिस को अंग्रेजों से मुक्ति पाने पर वे उल्लसित तो थे लेकिन विभाजन की कीमत पर पाई गई इस स्वतंत्रताके कारण नेहरू और नेहरू की कांग्रेस से उनका रास्ता हमेशा के लिए अलग हो गया।
22मार्च/ईएमएस