लेख

(कटाक्ष ) क्या जैन समाज की राजनैतिक पकड़ कमजोर हैं ! (लेखक- विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

22/06/2022

जैन समाज की स्थिति राजनीति को छोड़कर बहुत अच्छी हैं। सामाजिक ,आर्थिक ,व्यापारिक आदि क्षेत्रो में जैन समाज का परचम फैला हुआ हैं। यहाँ तक कि यह समाज शांति प्रिय ,धर्म- भीरु और अपराधी प्रवत्ति से रहित हैं सात्विक आहार को अपनाती हैं। .सभी वर्ग जैन समाज को बहुत सम्मान से देखती हैं। जैन समाज में अपने जो भी कार्य होते हैं वह अन्य जैनेतर समाज से आर्थिक सहयोग की कभी भी अपेक्षा नहीं रखती। जैन समाज की समृद्धि का मुख्य कारण व्यापारिक मानसिकता के साथ बहुत कम प्रतिशत व्यसनी हैं जिससे उनका पैसा गलत स्थान में नहीं जाता। धर्म भीरु होने से धर्म में आस्था होने से वह जल्दी बहकती नहीं हैं। धर्म से वृद्धि होती हैं।
देश की आर्थिक उन्नति में २४ % योगदान कर के रूप में जैन समाज देती हैं। हर स्तर पर जैन समाज की मन से बहुत प्रशंसा की जाती हैं पर व्यवहारिक धरातल में सभी अन्य लोग ईर्ष्या करते हैं। कारण समृद्ध होने से ,आर्थिक स्वाबलंबन होने से वह अन्य पर अधिक आश्रित नहीं हैं ,इस कारण जैन अपने आपको श्रेष्ठ जरूर मानते हैं पर उनकी सामाजिक स्थिति दयनीय हैं। जब सामाजिक सरोकार की बात होती हैं तब वह नगण्य स्थिति में हैं।
वैसे जैन समाज की संख्या देश के अनुपात में १% कम हैं । पर स्थानीय स्तर पर दिखावा अधिक होने से लगता हैं की वह बहुतायत में हैं। आज समाज की स्थिति राजनैतिक क्षेत्र में लगभग शून्य सी हैं।
भोपाल राजधानी के अलावा जैन समाज का स्थान स्तरीय हैं पर राजनीति में उसकी स्थिति शून्य हैं। इसका उदाहरण आज प्रकाशित पार्षदों की सूची में भारतीय जनता पार्टी द्वारा भोपाल में एक जैन महिला और कांग्रेस ने भी एक महिला को उम्मीदवार बनाया हैं। जिससे सिद्ध होता हैं की हम कितने बड़बोले हैं ,इसका मतलब समाज के तथाकथित स्वयभू नेता मात्र समाज में भाषणों की लफ्फाजी में अग्रणी हैं पर धरातल में धूल भी नहीं हैं। क्या यह चिंता का विषय नहीं हैं। ?
इसका मतलब स्थानीय स्तर पर जैन समाज मात्र कागजों की शेर हैं ,राजनैतिक स्तर पर उसका प्रभाव शून्य ही समझा जाय जिस कारण समाज का कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं हैं। इसके लिए प्रभाव बनाना होगा जिससे पार्टियों से टिकिट मिले। यदि नहीं मिलती हैं तो स्थानीय स्तर पर जहाँ समाज की बहुलता हैं वहां समाज का प्रभावशाली व्यक्ति उम्मीदवार बनकर अन्य लोग सहयोग देकर विजयी बनाये।
राजधानी जैसे महत्वपूर्ण शहर में समाज की कोई महत्वपूर्ण योगदान न होना अत्यंत दुखद अध्याय हैं। हमारा सम्पन्न ,प्रतिष्ठित होना कोई मायने नहीं रखता और नहीं हो जो पार्टी का योग्य प्रतिनिधि हो चाहे वह निर्दलीय हो उसे जिताएं। हमारा पूरे देश और प्रान्त स्तर पर नगण्य प्रतिशत हैं ,इसका पुर्नवालोकन होना चाहिए। हम लोग मात्र करदाता ,प्रतिष्ठित ,धर्मभीरु मानकर संतोष करे यह भविष्य के लिए शुभ सन्देश नहीं हैं।
जब तक शासन ,प्रशासन में समाज की भागीदारी नहीं होगी ,तब तक हम आचार्यों द्वारा उद्घोषित योजनाओं को क्रियान्वित नहीं करा पाएंगे। धर्म भीरु का अर्थ कायरता नहीं। अहिंसा का मतलब हारना नहीं बल्कि शत्रु के ऊपर विजय प्राप्त करो ,अन्यथा हम भावहिंसा के भागीदार होंगे। वोट देने का अधिकार हमारा हैं तब हम ऐसे उम्मीदवार को विजयी बनाये जो हमारे कार्यों में सहयोग दे अन्यथा बहिष्कार करे या उसको हराएँ। यह हमारे लिए स्वर्णिम अवसर होगा
एकता में ही ताकत हैं। .
मत चूको जैन समाजियों ,अब चुके तो कब जागोगे
अपना प्रभाव दिखाओ ,अन्यथा चूहे के बिल में घुस जाओ।
ईएमएस / 22 जून 22