लेख

(विचार मंथन) हेट स्पीच पर लगाम (लेखक/ईएमएस-सिद्धार्थ शंकर)

06/08/2022

केंद्र सरकार ने 5 साल के लंबे परामर्श के बाद सोशल मीडिया पर नफरती कंटेंट रोकने के लिए एंटी हेटस्पीच कानून बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। हेटस्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों, अन्य देशों के कानूनों और अभिव्यक्ति की आजादी के तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कानून का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। इसे जल्द ही सार्वजनिक राय के लिए पेश किया जाएगा। इसमें हेटस्पीच की परिभाषा स्पष्ट होगी, ताकि लोगों को भी यह पता रहे कि जो बात वे बोल या लिख रहे हैं, वह कानून के दायरे में आती है या नहीं। सरकार ने प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारतीय संघ जैसे कुछ अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को इस ड्राफ्ट का आधार बनाया है। विधि आयोग ने हेटस्पीच पर अपने परामर्श पत्र में साफ किया है कि यह जरूरी नहीं कि सिर्फ हिंसा फैलाने वाली स्पीच को हेटस्पीच माना जाए। इंटरनेट पर पहचान छिपाकर झूठ और आक्रामक विचार आसानी से फैलाए जा रहे हैं। ऐसे में भेदभाव बढ़ाने वाली भाषा को भी हेटस्पीच के दायरे में रखा जाना चाहिए। हेट स्पीच की परिभाषा साफ होने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूजर्स द्वारा फैलाई गईं फेक न्यूज या नफरत भरी बातों से पल्ला नहीं झाड़ सकेंगे। देश में सबसे ज्यादा भ्रामक जानकारियां फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप, कू जैसे प्लेटफॉम्र्स के जरिए फैलाई जाती हैं। अब इनके खिलाफ सख्त कानून बनने से कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल जाएगा। दूसरी ओर, देश में फ्री स्पीच के पैरोकार वर्ग को यह भी लगता है कि एंटी हेटस्पीच कानून को इस्तेमाल लोगों या समूहों की आवाज दबाने के लिए भी हो सकता है। देश में हेटस्पीच से निपटने के लिए 7 तरह के कानून इस्तेमाल किया जाते हैं, लेकिन इनमें से किसी में भी हेटस्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है। इसीलिए, सोशल मीडिया प्लेटफार्म अपने यूजर्स को मनमानी भाषा बोलने से नहीं रोक रहे हैं। एक ही बयान, किसी के लिए नफरत फैलाने वाली बात हो जाता है और किसी के लिए बोलने की आजादी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसी उलझन में फंसा रहता है। अपनी बात कहने की आजादी से जुड़े कई कानून हमारे देश में मौजूद हैं और एकता व शांति भंग करने वाले बयानों पर पाबंदी भी है। इन कानूनों का उपयोग और दुरुपयोग दोनों की ही चर्चा होती रहती है। परिभाषा के मुताबिक किसी भी ऐसी बात, हरकत या भाव को, बोलकर, लिखकर या दृश्य माध्यम से प्रसारित करना, जिससे हिंसा भड़कने, धार्मिक भावना आहत होने या किसी समूह या समुदाय के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थान और भाषा के आधार पर विद्वेष पैदा होने की आशंका हो, वह हेट स्पीच के अंतर्गत आती है। हेट स्पीच से जुड़े कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों में दखल देते हैं। इनका इस्तेमाल अपनी राय जाहिर करने वाले लोगों के खिलाफ हो रहा है। वर्तमान कानूनों की वजह से कोई शख्स लोगों की सोच बदलने के लिए पब्लिक डिबेट नहीं कर सकता क्योंकि इन कानूनों से उसे चुप करा दिया जाएगा। हेट स्पीच से जुड़े कानूनों के सख्त पालन के पक्षधर मानते हैं कि कई मौकों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग होता है। ऐसे बयान दिए जाते हैं जिनसे आक्रोश बढ़ता है और फिर फ्री स्पीच के नाम पर इनसे कन्नी काट ली जाती है। ऐसे में हेट स्पीच पर सख्ती से लगाम लगाना जरूरी है। कानून अब भी मौजूद हैं, लेकिन कितनी मर्तबा उनका सख्ती से पालन हो पाता है?
ईएमएस/06अगस्त2022