लेख

("दोहे") दिवंगत मनोहर परिर्कर जी के प्रति

19/03/2019

-प्रो.शरद नारायण खरे
बहुत मनोहर थे "शरद",भारत माँ के पूत।
त्याग,सत्य का पथ वरा,बन मानवता दूत।।

ईमाँ का अवतार थे, पूर्ण किया निज धर्म।
जनसेवा में था बसा,करुणा का ही मर्म।।

उच्च ज्ञान औ' दक्षता,का था तुम में वास।
जनहित का देते रहे,हम सबको आभास।।

मन हरने की थी कला,था तुम में आवेग।
कर्तव्यों से जुड़ सतत,दिया कर्म का नेग।।

गोवा की सेवा दिखे,दिखता रक्षा काम।
कर्मयोग का पथ लिया,नहीं किया आराम।।

तज विलास,वैभव रहे,बनकर के इक संत।
ऐसे योगी का कभी, हो सकता ना अंत।।

सदा आचरण शुध्द था,मन नित रहा पवित्र।
हर कोई उनका रहा, बनकर नेहिल मित्र।।

नमन करूं, वंदन करूं,श्रध्दा के हैं भाव।
हे साधक युग-युग खले,तेरा बहुत अभाव।।

बीमारी से ना डरे,रक्खा तेज सँभाल।
रहा जूझताअंत तक,लालों का वह लाल।।

पुष्प समर्पित मान के,झुका रहा मैं शीश।
परम पिता देना सदा,"मनहर" को आशीष।।
ईएमएस/19/03/2019