लेख

‘चाय’ जैसा होगा ‘चैकीदार’ का जादू ? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

22/03/2019


देश के आजाद होने के बाद शायद पहली बार देश के सत्तासीन सियासतदार आज तीन मुद्राओं में देश की जनता के सामने है, सत्ता में वे ‘राजा’ अपने दल में वे ‘सिपाही’ और वोट की सियासत में ‘चैकीदार’ ....और यह ‘चैकीदार’ की पदवी उन्हें किसी शौर्य या उपलब्धि के कारण नहीं, बल्कि देश के प्रधान चैकीदार की कृपा से निःशुल्क प्राप्त हुई है। अब जो राज्य सरकारों की नौकरी में ‘वास्तविक चैकीदार’ है, वह सोच नहीं पा रहा है कि वह क्या करें? अपना पदनाम बदल ले या अपने पदनाम के अधिकार की लड़ाई न्यायालय में लड़े? खैर राज्य सरकारों के सेवकों में सबसे गरीब व अल्पवेतन वाला शख्स ‘चैकीदार’ होता है, इसलिए वह महंगी न्यायिक लड़ाई तो नहीं लड़ सकता, किंतु उसे यह डर अवश्य है कि नकली चैकीदार कही असली चैकीदार पदनाम को बदनाम न कर दें?
वास्तव में ‘चैकीदार’ पद पर जबरन कब्जा करने वाले प्रथम शख्स हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी है, जिन्होंने आज से तीन साल पहले अपने आपको ‘चैकीदार’ बताया था, किंतु जब उनके कार्यकाल में प्रतिपक्षी दल कांग्रेस ने कथित राफैल घोटाले के बाद ‘चैकीदार’ पदनाम के साथ ‘चोर’ का विशेषण लगा दिया, जब जिद्दी व अपनी धुन के धनी प्रधानमंत्री जी ने इसी पदनाम को आधार बनाकर अगला लोकसभा चुनाव फतह करने की ठान ली और फिर क्या था, अपने नेता वाला पदनाम पूरे देश के भाजपाईयों का पर्याय हो गया और सभी ने अपने मूलनाम के आगे पद्मश्री या पद्मविभूषण की तरह ‘चैकीदार’ लिख लिया, प्रधानमंत्री के बाद इसकी शुरूआत केन्द्रीय मंत्रियों ने की और अब पूरे देश के भाजपाईयों ने।
....पर, अब अहम् सवाल यह है कि पांच साल पहले 2014 के लोकसभा चुनाव के समय तो मोदी जी ने अपने आपको ‘चाय बैचने वाला’ बताकर वोट बटौरे थे, फिर उस समय देश का आवाम् राजनीति में बरसों से सक्रिय नेताओं के घिसे-पिछे चेहरों को देखकर भी थक चुका था, इसलिए जब एक कथित आदर्श राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी का नया चेहरा प्रधानमंत्री के बतौर ‘धूमकेतु’ की तरह सामने लाया गया तो देश की जनता ने उन्हें हाथों-हाथ स्वीकार कर लिया और फलतः देश मोदीमय हो गया, क्योंकि मोदी जी के चुनावी वादे भी जनता की दुःखती रग पर हाथ रखने वाले थे, और इसी कारण मोदी जी उस समय प्रचण्ड बहुमत वाली सरकार कायम करने में सफलत रहे। किंतु इन पांच सालों में भारतीय राजनीति की गंगा में काफी पानी बह चुका है, देश का आम वोटर आज 2014 से भी अधिक खराब स्थिति में अपना जीवन यापन करने को मजबूर है, सपनों के सौदागर मोदी जी ने जनता को दिखाए गए सपनों में से एक भी सपने को साकार नहीं किया, उल्टे नोटबंदी व जीएसटी के माध्यम से लोगों को पीड़ा ही पहुंचाई, इसलिए अब देश के आम वोटर का मोदी जी के प्रति विश्वास डगमगाया नजर आ रहा है, फिर जनता के ‘मन की यह बात’ किसी से छुपी भी नहीं है, स्वयं मोदी व भाजपा के बड़े से लेकर छोटे नेता सब यह जानते है, इसीलिए मोदी से लेकर अदने से कार्यकर्ता तक के मन में भय समाहित है, जो भाजपा नेताओं की मुखाकृतियों में नजर आने लगा है।
संभवतः इसीलिए अब देश के आम वोटर को फिर से शब्दों व भाषणों की भूल-भूलैया के चक्रव्यूह में फंसाकर अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी की तैयारी की जा रही है कभी सैना के शौर्य को अपने खाते में डालकर राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करने की असफल कौशिश की जा रही है तो कभी ‘चैकीदार’ बनकर। अब सबसे बड़ा सवाल इस ‘चैकीदार’ के अधिकारों व कर्तव्यों को लेकर उठाया जा रहा है, देश का जो धन है वह तो चंद राजनेताओं के कृपा पात्र शख्स विदेश ले गए और वहां की बैंकों में जमा करा दिया, और जहां तक सरकार के पैसे का सवाल है, उसके लिए तो स्वयं सरकार रिजर्व बैंक से पैसा मांग रही है, देशका अवाम् वैसे ही गरीब व दो समय की रोट के लिए मोहताज है, तो फिर आखिर ये कथित ‘चैकीदा’ किसके व कौन से धन की रक्षा करेंगे? जहां तक जनता के अधिकारों की रक्षा का सवाल है, उनका तो पहले ही सत्ता ने अपहरण कर लिया है, तो फिर आखिर चैकीदारी किसकी व किसलिए होगी? हाँ, यह अवश्य है कि ‘चैकीदार’ यदि फिर से सत्ता दिला दे तो यह ‘शुभ’ होगा, वर्मा जो भाग्य में लिखा है, वह तो होकर ही रहेगा, उसे कोई भी रोक नही पाएगा।
22मार्च/ईएमएस